मुलायम सिंह यादव की पत्नी और अखिलेश यादव की सौतली मां साधना यादव का चुप्पी तोड़ना कुछ लोगों के लिए बेहद चौंकाने वाला हो सकता है, लेकिन अखिलेश यादव शायद इससे नहीं चौंके होंगे. चुनाव के आखिरी चरण से चौबीस घंटे पहले साधना गुप्ता ने एक समाचार एजेंसी को अपना पहला इंटरव्यू दिया. इसमें उन्होंने इशारों-इशारों में बता दिया कि उन्हें भी उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों का बेसब्री से इंतजार है. उनकी बातों को सुनकर लगा कि परिवार में ही कुछ ऐसे लोग हैं जो दिल से चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी चुनाव हार जाए.

साधना ने अपने इंटरव्यू में जो बातें कही उससे लगा जैसे उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत अपने ‘आज्ञाकारी’ बेटे अखिलेश से ही है. उन्होंने कहा, ‘अखिलेश ने हमेशा मेरा सम्मान किया. उसने कभी मुझे जवाब तक नहीं दिया. एक जनवरी से अखिलेश के साथ मेरी इतनी बातचीत हुई जितनी पिछले पांच सालों में नहीं हुई.’

अखिलेश यादव के करीबी बताते हैं कि ये बात सही है कि पिछले पांच साल में अखिलेश और उनकी सौतेली मां के बीच बातचीत करीब-करीब बंद हो चुकी थी. जब एक जनवरी को अखिलेश यादव ने अपना रास्ता अलग कर लिया तो साधना यादव ने सौतेले बेटे से घर वापस लौटने की अपील की. इसके बाद अखिलेश घर आए ज़रूर लेकिन डटे अपने रास्ते पर ही रहे.

मुख्यमंत्री रहते हुए अखिलेश मुलायम सिंह के सरकारी बंगले में ही रहते थे, घर एक होने के बावजूद सौतेली मां साधना, सौतेला भाई प्रतीक, प्रतीक की पत्नी अपर्णा का संसार अलग था और अखिलेश, डिंपल और उनके तीन बच्चों की दुनिया अलग थी. मुलायम परिवार के एक बेहद करीबी नेता जो अब बसपा में चले गए हैं, बताते हैं कि परिवार में पिता-पुत्र के बीच सब ठीक ही था. इस झगड़े की शुरुआत दरअसल सास-बहू के झगड़े से ही हुई थी जो बाद में परिवार के बंटवारे की वजह बनी. साधना ने भी साक्षात्कार में कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अखिलेश नेताजी के जीते जी अलग हो जाएगा. साधना ने बातों-बातों में यह भी बता दिया कि ‘घर में अखिलेश और डिंपल अपने बच्चों के साथ अलग ही रहते थे. उनके घर छोड़ने के बाद अब उनके कमरे बंद ही रहते हैं.’

अखिलेश यादव ने ठीक ही कहा था कि उत्तर प्रदेश का ये चुनाव उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान है. अगर वे हार गए तो सबसे पहला विरोध उनके परिवार से ही शुरू होगा. नतीजे आने से पहले ही सौतेली मां साधना यादव ने इसके संकेत दे दिए हैं. उन्होंने कह दिया है कि उनके अपने बेटे प्रतीक यादव को सियासत में जाना चाहिए. अब तक प्रतीक यादव खुलेआम कहते आए हैं कि उनकी सियासत में कोई दिलचस्पी नहीं है. बड़े भैया अखिलेश ही सियासत करें. लेकिन अब साधना दो भाइयों को आमने-सामने लाने की बात कह रही हैं.

परिवार के करीबी एक नेता बताते हैं, ‘करीब दस साल पहले ये फैसला हुआ था कि अखिलेश यादव सियासत करेंगे और प्रतीक यादव कारोबार देखेंगे. परिवार पिछले एक दशक से इसी रास्ते पर आगे बढ़ा. लेकिन अब नेताजी की बात परिवार में नहीं सुनी जा रही है. इसलिए दोनों बेटे स्वतंत्र हैं. अखिलेश ने अपना रास्ता चुना तो प्रतीक भी अपना अलग रास्ता चुनने के लिए आज़ाद हो गए हैं. अखिलेश के एक करीबी कहते हैं अखिलेश नहीं चाहते कि प्रतीक सियासत में आएं. पहले प्रतीक भी यही बात कह रहे थे, लेकिन अब प्रतीक की मां ने नई बात शुरू कर दी है.

सुनी-सुनाई है कि साधना यादव ने अपना साक्षात्कार बहुत सोच-विचारकर दिया. उन्होंने दिल्ली में मौजूद परिवार और पार्टी से बाहर के नेताओं से सलाह ली. अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव से भी राय मांगी गई. इसके बाद मैदान में उतरीं. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने पति मुलायम सिंह यादव को भी कह दिया है कि अब वो चुप नहीं बैठेंगी. जरूरत पड़ी तो नेताजी की भी बात नहीं सुनेंगी.

सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि मुलायम परिवार के कुछ नेता मानते हैं कि अखिलेश यादव दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगे. इसलिए साधना ने अपने इंटरव्यू में कहा कि नेताजी के अपमान का असर चुनाव पर पड़ेगा. अगर अखिलेश चुनाव हारे तो एक बार फिर से उन्हें अपने घर में ही अग्निपरीक्षा देनी होगी. ,