यह किस्सा 1992 का है. मध्य प्रदेश में सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री थे. दो साल पहले - मार्च 1990 में - हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों से सत्ता छिटककर भाजपा के पास चली गई थी. और कांग्रेस, जो इससे पहले दस साल लगातार सत्ता में रह चुकी थी, उसे वापिस हासिल करने को बेचैन थी. संयुक्त मध्य प्रदेश के उस जमाने में कांग्रेस में इतने बड़े-बड़े दिग्गज नेता हुआ करते थे जो खुद में ही पार्टी सरीखे थे. इनमें तीन तो पूर्व मुख्यमंत्री थे - अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और श्यामाचरण शुक्ल. साथ ही, शुक्ल के छोटे भाई विद्याचरण शुक्ल के अलावा कमलनाथ, दिग्विजय सिंह जैसे करीब आठ-दस दिग्गज और. उन्हें देखकर सहज यकीन नहीं होता था कि ये सभी किसी वक्त एक ही मंच पर समान उद्देश्य के लिए जुटेंगे और पार्टी की जीत के लिए साथ मिलकर काम करेंगे.

इन्हीं दिग्गजों में से एक माधवराव सिंधिया भी थे जो ‘अनहोनी’ सी लगने वाली इस संभावना को भी ‘होनी’ में बदलने का माद्दा रखते थे. प्रदेश कांग्रेस के मौजूदा प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी उस घटना को याद करते हुए कहते हैं, ‘सबको अच्छी तरह पता था कि पार्टी तभी सत्ता में लौट सकती है जब सभी दिग्गज कांग्रेसी नेता एक मंच पर आएं. मिलकर पार्टी की जीत के लिए काम करें. लेकिन उन्हें एक मंच पर लाए कौन? तब इस काम का बीड़ा सिंधिया ने उठाया. उन्होंने दतिया जिले के डबरा में खुद पहल करते हुए एक सम्मेलन आयोजित किया. इसमें कांग्रेस के सभी नेताओं को बुलाया और सभी वहां जुटे भी. उस सम्मेलन के दौरान उन्होंने सभी को एक ही संदेश दिया कि अपनी लड़ाई बाद में भी लड़ी जा सकती है, अभी तो मिलकर लड़ने का अवसर है. उनके कहे का असर ऐसा था कि कोई भी दिग्गज उनकी बात को टाल नहीं सका.’

चतुर्वेदी आगे बताते हैं, ‘जिस वक्त डबरा में सम्मेलन हुआ, तब तक सभी स्थितियां सामान्य थीं और इस हिसाब से राज्य में 1995 में चुनाव होने थे. कांग्रेस को तब तक काम करने का पर्याप्त मौका था. रणनीति भी इसी के अनुसार बनी थी. लेकिन इसी बीच छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई. केंद्र की पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार को भी बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया. चुनाव अगले कुछ महीनों में ही सिर पर आन पड़े. हालांकि सिंधिया तब तक सबको एक सूत्र में पिरो चुके थे. सभी ने मिलकर काम किया और 1993 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौट आई. सबने इस जीत का श्रेय डबरा सम्मेलन को दिया. तब सिंधिया चाहते तो मुख्यमंत्री के पद पर भी दावेदारी जता सकते थे. पार्टी हाईकमान पर भी उनका इतना प्रभाव था कि उन्हें मुख्यमंत्री बनाने से शायद ही इनकार किया जाता. लेकिन उन्होंने न तो जीत का श्रेय लिया और न मुख्यमंत्री पद. दिग्वियज सिंह मुख्यमंत्री चुने गए.’

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महामंत्री मानक अग्रवाल भी कुछ ऐसी ही यादें ताजा करते हुए बताते हैं, ‘डबरा सम्मेलन तो पार्टी के लिए एक मिसाल बन चुका है. आज भी जब कभी-कहीं पार्टी में सभी दिग्गज एक मंच पर जुटते हैं, तो डबरा सम्मेलन की याद आ आती है. ये अलग बात है कि अब इन आयोजनों का नतीजा उस तरह का नहीं आ पाता.’ फिर इस वर्तमान प्रसंग को बीच में छोड़ते हुए वे सिंधिया के साथ अपने अनुभव ताजा करने लगते हैं, ‘मैंने उनके साथ काम किया है. एक बार दिल्ली के मौर्या शेरेटन होटल में पार्टी के काम से तीन दिन तक मैं उनके साथ था. वहां मैंने उन्हें देखा कि राजनीति में होने के बावजूद उन्हें किसी को ‘हां’ और ‘न’ दोनों ही कहना आता था. मतलब जो कर सकते थे, उसी की हामी भरते थे. नहीं तो साफ मना कर देते थे. ऐसा अमूमन कहां होता है? राजनीति में लोग आश्वासनों पर ही टिके और टिकाए रहते हैं.’

प्रदेश कांग्रेस के एक अन्य पूर्व महासचिव गोविंद गोयल तो साफ शब्दों में कहते हैं, ‘अगर माधवराव होते तो पार्टी बीते 15 साल तक सत्ता से बाहर नहीं रहती. वे करिश्माई नेता थे, जो मुद्दों और मूल्यों पर राजनीति करते थे.’ वे याद करते हैं, ‘केंद्र में 1991 में जब पीवी नरसिंम्हा राव की सरकार बनी तो सिंधिया को नागरिक उड्‌डयन मंत्री बनाया गया. लेकिन साल भर बाद ही एक रूसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपना पद छोड़ दिया. जबकि इस घटना में एक भी जनहानि नहीं हुई थी. ऐसी नैतिकता आज कहां मिलती है? रही बात मुद्दों की तो उन्होंने हमेशा मध्यप्रदेश के विकास के बारे में सोचा. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में रेल मंत्री थे तो भोपाल को रेल कोच फैक्ट्री दिलवाई. दिल्ली-भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस भी उन्हीं की देन है, जो आज भी मध्य प्रदेश के लोगों के लिए एक बड़ी सौगात है.’

माधवराव सिंधिया के बेहद ही नजदीक रहे दो लोगों में एक हैं महेंद्र सिंह कालूखेड़ा और दूसरे बालेंदु शुक्ल. लगभग हर चुनाव में सिंधिया के डमी प्रत्याशी कालूखेड़ा ही हुआ करते थे. कालूखेड़ा 1984 की घटना याद करते हैं, ‘वे (सिंधिया) चुनौतियों का सामना करने से घबराते नहीं थे. उस वक्त उन्हें राजीव गांधी ने ग्वालियर से चुनाव लड़ने के लिए कहा था, जहां से भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी अटलबिहारी वाजपेयी थे. वाजपेयी ग्वालियर में ही खेले-खाए थे और इस सीट पर तो क्या, पूरे देश में खासे लोकप्रिय थे. तिस पर उन्हें राजमाता विजयाराजे सिंधिया (माधवराव की माताजी) का समर्थन अलग. इन स्थितियों में माधवराव की जगह कोई और होता तो चुनाव मैदान में उतरने से ही मना कर देता. लेकिन उन्होंने न सिर्फ इस चुनौती का सामना किया बल्कि काफी बड़े अंतर से वाजपेयी को चुनाव में शिकस्त भी दी.’

सिंधिया के बचपन के मित्रों में से एक बालेंदु शुक्ल उनके व्यक्तित्व के एक और खास पहलू की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनके मुताबिक, ‘जीवन में कभी उन्होंने निजी आक्षेपों की राजनीति नहीं की. अपनी मां के दिखाए रास्ते पर चलते हुए उन्होंने 26 साल की उम्र में जनसंघ के टिकट पर 1971 में गुना से पहला चुनाव लड़ा और जीते भी. लेकिन छह साल बाद ही 1977 में वे राजमाता की इच्छा के खिलाफ जाते हुए कांग्रेस में शामिल हो गए. दोनों के रास्ते अलग होने की वजह क्या थी, यह तो मैं आपको नहीं बताऊंगा लेकिन एक बात जरूर बताऊंगा. राजनीतिक रूप से अलग ध्रुवों पर होने के बावजूद उन्होंने राजमाता के खिलाफ तो छोड़िए, उनके किसी सहयोगी के विरुद्ध भी हल्की टिप्पणी नहीं की. ग्वालियर से वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़े तब भी उन्होंने भाषायी मर्यादा का हमेशा ध्यान रखा.’

शुक्ल आगे बताते हैं, ‘कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 1999 में उन्हें लोकसभा में उपनेता प्रतिपक्ष बनाया. तब भी उन्होंने कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी या उनकी सरकार के खिलाफ हल्के शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया, अलबत्ता सरकार की गलत नीतियों की आलोचना भरपूर की. संभवत: इन्हीं वजहों से वाजपेयी सहित दूसरे दलों के सभी राजनेता उनका सम्मान किया करते थे. सिंधिया जमीन से जुड़े और आम जनता के नेता थे. मैंने देखा है, उन्हें. अपने एक-एक कार्यकर्ता को वे नाम से जानते थे. सबसे बेहद सम्मान से मिला करते थे. राजा होने के बावजूद कभी इसका दंभ उन पर हावी नहीं हुआ. राजनीति में उन्होंने जो भी हासिल किया, वह रियासत या विरासत की वजह से नहीं, बल्कि जमीनी मेहनत से हासिल किया. इसीलिए उनकी पहचान, उनका कद, आज के कई-कई नेताओं से एकदम अलग ठहरता है.’

शुक्ल 1996 का एक वाकया याद करते हैं. उस वक्त कांग्रेस से नाराज तीन बड़े नेताओं- नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया ने पार्टी छोड़ दी थी. इनमें मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस के टिकट पर सतना लोकसभा सीट से पर्चा भरा. जबकि सिंधिया ने मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस के प्रत्याशी के रूप में ग्वालियर से. अर्जुन सिंह उस चुनाव में तीसरे नंबर पर आए थे. जबकि सिंधिया ने अपनी सीट आसानी से जीत ली थी. इस घटना को याद करते हुए शुक्ल सवाल करते हैं, ‘क्या प्रदेश कांग्रेस में आज है, कोई नेता इस तरह के कद, करिश्मा या माद्दे वाला?’ शुक्ल का सवाल सत्याग्रह ने प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओं से पूछा. यकीन मानिए कुछ ने तो सवाल ही झटक दिया और जिन्होंने जवाब देने की कोशिश भी की तो वह गोलमोल ही ज्यादा नजर आया. ऐसे में, अगर प्रदेश कांग्रेस में माधवराव सिंधिया की कमी महसूस की जा रही है तो इसमें आश्चर्य कैसा!