सियासी तौर पर सबसे अहम माने जाने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिलेगी, इसकी उम्मीद कम ही लोगों को थी. खुद भाजपा में भी लोग यह मानकर चल रहे थे कि उन्हें बहुमत तो मिल सकता है लेकिन इतना बड़ा नहीं. हालांकि इसके बारे में भी वे निजी बातचीत में पक्के तौर पर कुछ नहीं कह रहे थे. लेकिन इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला.

उत्तर प्रदेश के अलावा भाजपा उत्तराखंड में भी जीत गई. पंजाब में जहां भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन का प्रदर्शन बुरा होकर भी उतना बुरा नहीं दिख रहा जितना माना जा रहा था. मणिपुर में भी भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन किया है. लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा को इतना भारी बहुमत मिलना राष्ट्रीय राजनीति के लिए बहुत कुछ कह रहा है. इसे एक-एक करके समझने की कोशिश करते हैं.

नरेंद्र मोदी

26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक कम से कम तीन मौके ऐसे आए जब लगा कि मोदी लहर फीकी पड़ने लगी है. पहला मौका 2015 में तब आया जब दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा को 70 में से सिर्फ तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा और आम आदमी पार्टी 67 सीट जीतने में कामयाब हुई. दूसरा मौका 2015 के नवंबर में आया जब बिहार विधानसभा चुनावों के नतीजे आए और भाजपा को नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी ने धूल चटा दिया. आठ नवंबर, 2016 को जब नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री ने की तब भी यह कहा गया कि इससे आम लोगों में मोदी के प्रति गुस्सा बढ़ेगा और नरेद्र मोदी की बची-खुची लहर का भी अंत हो जाएगा. लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए बगैर भाजपा को मिली भारी जीत यह साबित कर रही है कि मोदी लहर अभी बरकरार है और आने वाले दिनों में भाजपा की रणनीति इसी लहर पर सवार होकर चुनावी राजनीति करने की रहेगी.

2019 लोकसभा चुनाव

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को लोकसभा का सेमीफाइनल कहा जाता है. इसमें भाजपा को मिली भारी कामयाबी यह संकेत दे रही है कि 2019 में भाजपा को मुकाबला करना विपक्षी दलों के लिए आसान नहीं होने जा रहा है. उत्तर प्रदेश के नतीजों से उत्साहित भाजपा आने वाले दिनों में और आक्रामक दिख सकती है और अपने चिर-परिचित अंदाज में विपक्षियों को चित करने की कोशिश कर सकती है. अगर विपक्ष सही मायने में मोदी और भाजपा को 2019 में घेरना चाहता है तो उसे इसके लिए नए और बहुत ज्यादा प्रभावी तरीके तलाशने होंगे.

क्षेत्रीय दल

उत्तर प्रदेश के नतीजे बता रहे हैं कि जिस राज्य में भी भाजपा थोड़ी मजबूत है, वहां वह क्षेत्रीय दलों को हाशिये पर धकेलने में कामयाब हो रही है. यह 2014 में झारखंड और महाराष्ट्र में दिखा. फिर हरियाणा और 2016 में असम में भी. हाल में महाराष्ट्र में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भी यही देखा गया. अब उत्तर प्रदेश में भी यही दिख रहा है. यहां पिछले दो दशक से तीसरे और चौथे स्थान के लिए लड़ने वाली भाजपा आज पहले स्थान पर है. वहीं पहले और दूसरे स्थान के लिए जिस सपा औा बसपा में मुकाबला होता था, वे दोनों पार्टियां बहुत बुरी स्थिति में हैं. सपा तो जैसे-तैसे सम्मानजनक आंकड़ा पा गई है लेकिन बसपा के आंकड़े उसे और अन्य क्षेत्रीय दलों को हतोत्साहित करने के लिए काफी हैं.

राष्ट्रपति चुनाव

उत्तर प्रदेश में जीत के बाद अब बिल्कुल साफ हो गया है कि भाजपा या यों कहें कि नरेंद्र मोदी 2017 में अपनी पसंद का राष्ट्रपति बना पाएंगे. इसके पहले जो स्थिति थी, उसमें भाजपा को अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए अन्य क्षेत्रीय दलों की मदद की जरूरत पड़ती. अब राष्ट्रपति चुनावों के लिए भाजपा की अपने समर्थकों के अलावा अन्य दलों पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी.

कांग्रेस और राहुल

इन विधानसभा चुनावों में भले ही पंजाब में कांग्रेस को कामयाबी मिली हो लेकिन इसका श्रेय न तो कांग्रेस पार्टी को मिल रहा है और न ही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को. बल्कि इसका सबसे अधिक श्रेय कैप्टन अमरिंदर सिंह को और भाजपा-अकाली दल की 10 साल की सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को दिया जा रहा है. उत्तर प्रदेश में सपा के साथ जाने के बावजूद कांग्रेस की दुर्गति यह साबित कर रही है 2014 में करारी हार मिलने के बावजूद वह अब तक जिस सियासी रास्ते पर चलती दिख रही है, वह उसे और पीछे ले जाने का ही काम कर रही है. उत्तर प्रदेश के नतीजे यह बता रहे हैं कि अब कांग्रेस को अपनी रणनीति में बदलाव करने की जरूरत है. लेकिन यह बदलाव क्या होगा, इसे देखना दिलचस्प होगा.

अमित शाह

उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली भारी कामयाबी का श्रेय भले ही पूरी तरह नरेंद्र मोदी को दिया जा रहा है लेकिन इसमें अमित शाह के योगदान को भी कम करके नहीं देखा जाना चाहिए. हालांकि, खुद अमित शाह भी इसका श्रेय मोदी को देंगे लेकिन पिछले डेढ़ साल में उन्होंने जिस तरह से भाजपा को पारंपरिक समर्थक वर्ग से बाहर ले जाने और नया समर्थक वर्ग तैयार करने में मेहनत की है, सही मायने में उसी ने भाजपा की इस भारी जीत की पटकथा लिखी है. अब यहां से साफ हो गया है कि अगर भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव जीतती भी है तो भी अमित शाह गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे बल्कि बतौर पार्टी अध्यक्ष ही काम करते रहेंगे. यह भी तय है कि भाजपा 2019 का लोकसभा चुनावा उन्हीं की अध्यक्षता में लड़ने जा रही है.

अखिलेश यादव और मायावती

उत्तर प्रदेश में करारी हार के बाद अखिलेश यादव के लिए आगे की राजनीति बेहद मुश्किल हो गई है. इसका संकेत उनकी सौतेली मां साधना गुप्ता ने आखिरी चरण के चुनाव के ठीक पहले दे दिया था. अब एक बार फिर से सपा में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो सकती है. फिर से एक बार सपा में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व की वापसी की मांग उठ सकती है. चुनावों के पहले भले ही सपा पर अखिलेश और उनके समर्थकों का कब्जा दिख रहा था, लेकिन आने वाले दिनों में अखिलेश के लिए इसे बरकरार रखना मुश्किल होगा.

मायावती के लिए अब आगे की राह बेहद मुश्किल होने जा रही है. कई राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक मानते हैं कि उनकी बहुजन समाज पार्टी आज उस वक्त से थोड़ा ही आगे खड़ी है जहां से उसने राजनीति की शुरुआत की थी. विश्लेषकों को लगता है कि मायावती में आज के समय के हिसाब से जमीनी नेता वाली वे विशेषताएं भी नहीं दिखतीं जो उनके भविष्य को लेकर किसी भी तरह की संभावनाएं जगा सकती थीं.