सबसे पहले ये आंकड़े देखिये. 70 सीटों वाली उत्तराखंड विधान सभा में बहुमत का आंकड़ा 36 सीटों पर पार होता है. अब तक राज्य में कुल चार विधान सभा चुनाव हुए हैं. इनमें से पहले तीनों ही विधानसभा चुनावों में जिस भी पार्टी ने यहां सरकार बनाई है, उसने गिरते-पड़ते ही बहुमत के इस आंकड़े को छुआ है.

2002 में कांग्रेस ने 36 सीटें जीतकर बहुमत के न्यूनतम आंकड़े को छुआ था और पहली सरकार बनाई थी. 2007 के चुनावों में भाजपा मात्र एक सीट से बहुमत के इस आंकड़े से पीछे रह गई थी. इसलिए सरकार बनाने के लिए उसे ‘उत्तराखंड क्रांति दल’ और निर्दलीय विधायकों का समर्थन लेना पड़ा था. 2012 के चुनावों में भी कोई पार्टी बहुमत के इस आंकड़े को पार नहीं कर सकी थी. तब कांग्रेस को 32 सीटें मिली थी और भाजपा को 31. ऐसे में कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी, उत्तराखंड क्रांति दल और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई थी.

यह पहली बार है जब प्रदेश में किसी पार्टी को इतना प्रचंड बहुमत मिला है. इसलिए इन नतीजों से प्रदेश की राजनीति में कई तरह के बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

पहली मजबूत सरकार

ऊपर दिए आंकड़ों से साफ़ है कि इस बार बनने जा रही भाजपा सरकार अब तक की सबसे मजबूत सरकार होगी. हालांकि चुनावों से पहले कहा जा रहा था कि भाजपा ने जिन एक दर्जन से भी ज्यादा कांग्रेस के बागियों को टिकट दिए हैं वे चुनावों के बाद भाजपा के लिए मुसीबत बन सकते हैं. कहा जा रहा था कि चुनावों के बाद ये बागी सरकार को अपनी शर्तों पर चला सकते हैं और शर्तें पूरी न होने पर पार्टी से अलग भी हो सकते हैं. लेकिन जिस तरह का व्यापक जनमत भाजपा को इन चुनावों में मिला है उसने ऐसी सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया है. अब इन बागियों को मंत्री पद सौंपना भी भाजपा की मजबूरी नहीं रह गई है. क्योंकि अब ये लोग अगर अब भाजपा से अलग होते हैं तो दल-बदल कानून के चलते अपनी विधायकी भी गंवा बैठेंगे और भाजपा की सरकार इनके जाने से भी बहुमत में बनी ही रहेगी.

दूसरा स्थिर मुख्यमंत्री

17 साल की उम्र पूरी कर चुके उत्तराखंड में अब तक सात लोग मुख्यमंत्री बन चुके हैं. लेकिन इनमें से एक मात्र नारायण दत्त तिवारी ही ऐसे हैं जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया है. उनके अलावा जितने भी मुख्यमंत्री यहां हुए वे किसी भी तरह अपनी कुर्सी और अपनी सरकार को बचाए और बनाए रखने के फेर में ही उलझे दिखे. लेकिन इस बार समीकरण ऐसे बनते दिख रहे हैं कि जिस भी व्यक्ति के नाम पर भाजपा एक बार मुख्यमंत्री के लिए मुहर लगा देगी, वह पूरे पांच के लिए मुख्यमंत्री बन जाएगा. इसके कई कारण हैं.

पहला कारण तो यही है कि इस बार मुख्यमंत्री पद का फैसला राज्य में नहीं बल्कि केंद्र से होना है. उत्तराखंड का पूरा चुनाव भाजपा ने बिना किसी स्थानीय चेहरे के सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा है. यह भी हकीकत है कि भाजपा को इतना व्यापक जन समर्थन भी नरेंद्र मोदी के नाम पर ही मिला है. इसलिए स्वाभाविक है कि मुख्यमंत्री पद पर फैसला भी केंद्र से ही लिया जाएगा. साथ ही केंद्र में भाजपा की इन दिनों जो मजबूत स्थिति है, उसे देखते हुए इस बात की संभावनाएं भी ख़त्म हो जाती हैं कि केंद्रीय फैसले को मानने से स्थानीय नेता इनकार कर सकें या उसके खिलाफ बगावत कर सकें.

उत्तराखंड को एक मजबूत मुख्यमंत्री मिलने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण इन चुनावों के समीकरण ही बन रहे हैं. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा था लेकिन उनके नाम पर पार्टी में कई असहमतियां भी थीं. लेकिन अब अजय भट्ट अपनी ही सीट हार गए हैं और इसलिए मुख्यमंत्री की दौड़ से भी बाहर हो गए हैं. इसके अलावा कांग्रेस से आए बागियों में से भी किसी के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाएं अब काफी कम हो गई हैं क्योंकि अब ये पार्टी को ब्लैकमेल करने की स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में जिस भी नाम को मुख्यमंत्री के लिए केंद्र फाइनल करता है, उसकी पूरे पांच साल तक के लिए स्वीकार्यता काफी आसान हो गई है.

निर्दलीय और छोटी पार्टी के नेताओं की पूछ ख़त्म

उत्तराखंड की पिछली तीनों सरकारों में निर्दलीय और छोटी पार्टियों के नेताओं ने जमकर चांदी काटी है. पिछली सभी सरकारें ऐसे ही नेताओं के दम पर बनी और टिकी रही हैं, इसलिए इन नेताओं की अब तक यहां खूब पूछ होती रही है. इनमें कुछ तो ऐसे थे जो पहली बार चुनाव जीतते ही कैबिनेट मंत्री बन गए थे और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही सरकारों में मंत्री पद झटक लिया था. इन चुनावों में प्रीतम पंवार ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत जरूर दर्ज की है लेकिन, पिछली बार की तरह इस बार उन्हें मंत्री पद मिलने की कोई संभावनाएं नहीं हैं. अब तक की सरकारों में अहम भूमिका निभाने वाली बीएसपी या यूकेडी इस बार खाता खोलती भी नज़र नहीं आ रही है. यदि एक या दो सीटों पर इनमें से किसी पार्टी की जीत होती भी है तो भी इनकी सरकार में अब वैसी पूछ नहीं होगी जैसी अब तक होती रही थी.