उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को पिछले 40 सालों की सबसे बड़ी जीत मिली है. भाजपा की यह कामयाबी इसलिए भी बहुत बड़ी है क्योंकि उसने यह कारनामा राज्य के बंटवारे के बाद किया है. भाजपा की इस प्रचंड जीत के बावजूद यह तय नहीं है कि देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री कौन होगा.

भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए नाम तो कई चल रहे हैं लेकिन इनमें तीन नाम सबसे प्रमुख हैं.

मनोज सिन्हा

उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदारों में मनोज सिन्हा का नाम भी लिया जा रहा है. वे अभी भारत के संचार मंत्री हैं. संचार मंत्रालय के स्वतंत्र प्रभार के अलावा वे रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री भी हैं. उनके संसदीय क्षेत्र गाजीपुर की अधिकांश विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की है. मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उनके सबसे आगे होने की और भी कई वजहें हैं. इनमें सबसे बड़ी तो यही है कि उन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी भरोसा करते हैं. पूर्वांचल में टिकटों के बंटवारे से लेकर चुनाव प्रबंधन तक में मनोज सिन्हा की अहम भूमिका बतायी जाती है. भाजपा में भी सिन्हा की पहचान एक पढ़े-लिखे और काम पूरा करने वाले नेता की है. विवादों से उनकी दूरी भी उनकी दावेदारी को मजबूत कर देती है.

मनोज सिन्हा को बड़े जनाधार वाला नेता नहीं माना जाता है. सामान्यत: यह राजनीति में एक नकारात्मक बात होती है. लेकिन नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई वाली भाजपा में इसे योग्यता माना जाता है. जानकार महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस, झारखंड में रघुबर दास और हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पीछे यही वजह बताते हैं.

भाजपा की इस जीत का श्रेय पिछड़े मतदाताओं को दिया जा रहा हो. ऐसे में मनोज सिन्हा के खिलाफ जो एक बात जा सकती है, वह है उनका अगड़ी जाति से होना. लेकिन फिर भी उनकी दावेदारी ज्यादा कमजोर इसलिए नहीं होती क्योंकि वे ठाकुर या ब्राह्मण होने के बजाय भूमिहार हैं. इस जाति की संख्या उत्तर प्रदेश में काफी कम है. इसलिए उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने का विरोध उस तरह से नहीं होगा जिस तरह से किसी ब्राह्मण या ठाकुर को मुख्यमंत्री बनाने पर होता.

केशव प्रसाद मौर्य

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के बारे में यह साफ-साफ कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में वे किसी से भी पीछे नहीं हैं. उनके पक्ष में दो बातें हैं - पहली यह कि वे अन्य पिछड़ा वर्ग से हैं. भाजपा को मिली इस प्रचंड जीत के लिए गैर यादव अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं की बड़ी भूमिका बताई जा रही है. केशव प्रसाद मौर्य की दावेदारी यह हो सकती है कि इस वर्ग को भाजपा के साथ लाने में उनकी भी भूमिका रही है. उन्हें प्रदेश अध्यक्ष भी अन्य पिछड़ा वर्ग को भाजपा के साथ लाने की रणनीति के तहत ही बनाया गया था.

ऐसे में भाजपा में यह मांग उठना स्वाभाविक है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के ही किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाए. लेकिन नरेंद्र मोदी खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं. ऐसे में अगर उत्तर प्रदेश में इस वर्ग का मुख्यमंत्री नहीं भी बनाया जाता है तो भी राजनीतिक तौर पर कोई खास दिक्कत वाली बात नहीं होगी.

केशव प्रसाद मौर्य के पक्ष में दूसरी बात यह है कि इस जीत का मामूली ही सही लेकिन कुछ श्रेय उन्हें इसलिए भी मिलना चाहिए कि वे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. सांगठनिक ढांचे में प्रदेश अध्यक्ष की अहम भूमिका होती है. लेकिन इसके बावजूद अब भी यह कहना मुश्किल है कि अंतिम बाजी उनके हाथ लगेगी.

योगी आदित्यनाथ

गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ भी उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं. उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि उनकी पहचान हिंदुत्व की बात करने वाले नेता की है. उनके पक्ष में दूसरी बात है उनके साथ कार्यकर्ताओं का होना. कहा जाता है कि भाजपा में कार्यकर्ता स्तर पर सबसे अधिक समर्थन योगी आदित्यनाथ को है. भाजपा में कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि अगर योगी को नई व्यवस्था में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला तो पार्टी में आंतरिक विरोध हो सकता है. हालांकि, नरेंद्र मोदी और अमित शाह भाजपा में अभी जिस स्थिति में हैं, उसमें इन दोनों के खिलाफ कोई आंतरिक विरोध हो, इसकी संभावना काफी कम लगती है.

योगी के विरोध में जो बात जाती है, वह है एक निश्चित इलाके में उनका जनाधार होना. गोरखपुर और उसके आसपास के इलाके में उनका अपना एक सियासी आधार है. ऐसे में अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो वे एक क्षत्रप के तौर पर उत्तर प्रदेश में स्थापित हो सकते हैं. मोदी और शाह के नेतृत्व वाली भाजपा कभी भी ऐसा नहीं होने देना चाहेगी. योगी के विरोध में यह बात भी जा सकती है कि पार्टी के अंदर उनकी प्रशासनिक क्षमताओं को लेकर नकारात्मक माहौल है.

इनके अलावा और भी कुछ नाम भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिए चल रहे हैं. इनमें दिनेश शर्मा, राजनाथ सिंह और कृष्णा राज प्रमुख हैं. वैसे नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कार्यशैली को देखा जाए तो वे किसी अन्य अपरिचित से नाम को भी देश के सबसे बड़े सूबे की बागडोर सौंप सकते हैं.