खाने-पीने की चीजें कुछ रचनाओं में मुख्य किरदार सरीखा महत्व रखती हैं. इतना कि इनके बिना वे ‘बेस्वादी’ सी हो जाएं. हिंदी साहित्य में इसका सबसे अच्छा उदाहरण कालजयी व्यंग्य उपन्यास ‘रागदरबारी’ को माना जा सकता है. श्रीलाल शुक्ल के इस उपन्यास की पृष्ठभूमि 1970 के दशक का उत्तर प्रदेश है. इसमें भांग की ऐसी व्यापक उपस्थिति है कि गांव का कोई गरीब बच्चा जिसे गाय-भैंस के दूध का स्वाद भी न पता हो, भांग के स्वाद से अनजान नहीं है.

इस उपन्यास में भांग बनाने-छानने को एक ऊंचे दर्जे की कला बताया गया है. शुक्ल जी के शब्दों में , ‘भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है. वैसे टके की पत्ती को चबाकर ऊपर से पानी पी लिया जाए, तो अच्छा-खासा नशा आ जाएगा, पर यहां नशेबाजी सस्ती है. आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकन्द, दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाए. भंग को इतना पीसा जाए कि लोढ़ा और सिल चिपककर एक हो जाएं, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ़ में छन्द सुनाए जाएं और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बनाकर उसे सामूहिक रूप दिया जाए.’

‘राग दरबारी’ जिस पृष्ठभूमि में लिखी गई, तब उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में भांग उतनी ही रची-बसी थी, जैसी उपन्यास में दिखती है. श्रीलाल शुक्ला के मुताबिक ठाकुरों में शराब पीने की परंपरा रही है लेकिन ब्राह्मण और बनियों में यह वर्जित थी. इस तरह भांग एक बड़े तबके लिए सामाजिकरूप से स्वीकार्य नशा बन चुका था.

हालांकि बाद में शहरीकरण बढ़ने और जगह देसी-विदेशी शराब के ठेके खुलने से लोगों का रुझान इसकी तरफ हुआ और भांग हाशिए पर पहुंच गई. लेकिन आज भी होली के समय यह बात साफ दिखती है कि भांग हमारी सामाजिक चेतना में कितने गहरे तक पैठ बनाए हुए है. और यह बेवजह नहीं है. इतिहास बताता है कि भारत में भांग का इस्तेमाल वैदिक काल से चला आ रहा है.

नशा नहीं, एक पवित्र औषधि है भांग

अथर्ववेद में जिन पांच पेड़-पौधों को सबसे पवित्र माना गया है उनमें भांग का पौधा भी शामिल है. इसके मुताबिक भांग की पत्तियों में देवता निवास करते हैं. अथर्ववेद इसे ‘प्रसन्नता देने वाले’ और ‘मुक्तिकारी’ वनस्पति का दर्जा देता है. आयुर्वेद के मुताबिक भांग का पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है. सुश्रुत संहिता, जो छठवीं ईसा पूर्व रची गई, के मुताबिक पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने और भूख बढ़ाने में भांग मददगार होती है. आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल इतना आम है कि 1894 में गठित भारतीय भांग औषधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे ‘आयुर्वेदिक दवाओं में पेनिसिलीन’ कहा था.

मध्यकाल में मुगल शासन के दौरान यूनानी चिकित्सा पद्धति प्रचलित थी. इसके तहत भी तंत्रिका-तंत्र से जुड़े रोगों जैसे मिर्गी आदि बीमारियों के इलाज में भांग का इस्तेमाल किया जाता था.

रुढ़िवादी इस्लाम किसी भी तरह के नशे को हराम बताता है, लेकिन भारतीय मुसलमानों के बीच भांग हमेशा से प्रचलित रही. यहां तक कि मुगल बादशाह हुमायूं भी ‘माजूम’ का शौकीन था. इसे भांग में दूध, घी, आटा और कोई मीठा पदार्थ मिलाकर बनाया जाता था. हुमायूं की मृत्यु सीढ़ियों से गिरने से हुई थी और इस बात की काफी संभावना है कि तब वो माजुम के नशे में रहा हो और खुद को संभाल न पाया हो.

सिख योद्धा भी रणभूमि में जाने से पहले भांग का सेवन करते थे ताकि वे पूरी क्षमता से लड़ सकें और चोटिल या जख्मी होने पर उन्हें दर्द का एहसास न हो. इस परंपरा की झलक हमें सिखों के निहंग पंथ में आज भी देखने को मिलती है. इस पंथ में नशीली दवाओं का सेवन उनके धार्मिक कर्मकांड का हिस्सा है.

भांग का एक संबंध 1857 की क्रांति से भी जुड़ता है. माना जाता है कि मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में विद्रोह का जो बिगुल फूंका था, उसके पीछे भी भांग की भूमिका थी. जब उनके ऊपर विद्रोह का मुकदमा चल रहा था तब उन्होंने ‘भांग का सेवन और उसके बाद अफीम खाने’ की बात स्वीकार की थी. उनका यह भी दावा था कि विद्रोह के समय उन्हें होश नहीं था कि वे क्या कर रहे हैं.

ब्रिटिश राज के समय भी भारत में भांग का सेवन बड़े पैमाने पर चलन में था

अंग्रेज जब भारत आए तो यह देखकर हैरान रह गए कि यहां किस तरह भांग का सेवन आमबात है. दरअसल तब पश्चिम में यह धारणा थी कि भांग या उसके उत्पाद जैसे गांजा आदि के सेवन से इंसान पागल हो सकता है. इस धारणा की पुष्टि और भारत में भांग के उपयोग के दस्तावेजीकरण के लिए अंग्रेज सरकार ने भारतीय भांग औषधि आयोग का गठन किया था. आयोग को भांग की खेती, इससे नशीली दवाएं तैयार करने की प्रक्रियाएं, इनका कारोबार, इनके इस्तेमाल से पैदा हुए सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और इसकी रोकथाम के तौर-तरीकों पर एक रिपोर्ट तैयार करनी थी. इस काम के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों में पूरे भारत में एक हजार से ज्यादा साक्षात्कार किए थे. आयोग ने पूरे वैज्ञानिक तरीके से एक बड़े सैंपल साइज को आधार बनाकर अपनी रिपोर्ट तैयार की थी.

जब यह रिपोर्ट तैयार हुई तो आश्चर्यजनकरूप से इसके निष्कर्ष भांग के इस्तेमाल को लेकर बड़े सकारात्मक थे : पागलपन तो बहुत दूर की बात, इसका संयमित सेवन को हानिरहित है; शराब भांग से ज्यादा हानिकारक है; और इसलिए भांग पर प्रतिबंध लगाने की कोई वजह नहीं हैं. इस रिपोर्ट का आखिरी निष्कर्ष यह था कि भांग पर किसी भी तरह की पाबंदी पूरे देश में एक परेशानी और व्यापक असंतोष की वजह बन सकती है.

सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व

आयोग की रिपोर्ट में भांग के सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व की भी चर्चा की गई थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि हिंदू धर्म के तीन मुख्य देवताओं में से एक शिव का संबंध भांग या इससे बनने वाले गांजे से जुड़ता है. कहा जाता है कि शिव को यह अतिप्रिय है. आयोग ने यह भी माना था कि उसके सामने इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि शिव की पूजा-पद्धति में भांग और उसके दूसरे उत्पादों का प्रयोग व्यापक रूप से होता है.

इसी रिपोर्ट के मुताबिक भांग का सबसे ज्यादा सेवन होली के समय होता है, ‘इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि होली के दौरान तकरीबन सभी लोग भांग का सेवन करते हैं’.

हालांकि जैसी हमने पहले ही चर्चा की है, आजकल शहरों में भांग की जगह शराब और दूसरे किस्म के नशे ने ले ली है. फिर भी होली आने पर ‘भंग का रंग’ ही सबसे ज्यादाजमता है. इस बात की पुष्टि भारतीय भांग औषधि आयोग की रिपोर्ट की इन पंक्तियों से भी होती है, ‘वसंत ऋतु का यह त्योहार आज भी भांग से जोड़ा जाता है, और ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि निकट भविष्य में यह संबंध खत्म होने जा रहा है.’