दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा को इसी महीने उम्रकैद की सजा सुनाई गई. उन पर माओवादी संगठनों से जुड़े होने, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने और राष्ट्र के खिलाफ षडयंत्र रचने के आरोप साबित हुए हैं. उनके साथ ही जेएनयू के पूर्व छात्र हेम मिश्रा, उत्तराखंड के पत्रकार प्रशांत राही और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के दो किसानों को भी इन्हीं आरोपों में उम्रकैद की सजा दी गई है. गढ़चिरौली जिले की सत्र अदालत ने यह सजा सुनाते हुए कुल 827 पन्नों का फैसला दिया है.

इस विस्तृत फैसले को पूरा पढने पर काफी संभावनाएं लगती हैं कि शायद ऊपरी अदालतों में यह टिक न सके और इसे पलट दिया जाए. इस फैसले में मौजूद कमियों के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है. इन कमियों को समझने की शुरुआत अभियोजन पक्ष की उसी कहानी से करते हैं जिस कहानी पर यह पूरा फैसला टिका है.

अभियोजन पक्ष के अनुसार इस कहानी की शुरुआत अगस्त 2013 से होती है. अतुल शांताराम नाम के एक सहायक पुलिस निरीक्षक तब गढ़चिरौली जिले की स्पेशल ब्रांच में काम करते थे. उन्हें अपने ‘सूत्रों’ से ‘ख़ुफ़िया जानकारी’ मिली थी कि महेश टिर्की और पांडू नरोटे नाम के दो स्थानीय किसान माओवादियों के लिए काम करते हैं और प्रतिबंधित संगठनों के सक्रिय सदस्य हैं. इस जानकारी के बाद अतुल शांताराम ने अपने साथी पुलिसकर्मियों की मदद से इन दोनों किसानों पर नज़र रखना शुरू कर दिया.

22 अगस्त 2013 की बात है. शाम के करीब छह बजे अतुल शांताराम अपने स्टाफ के साथ अहेरी बस स्टैंड पहुंचे. वहां इन लोगों ने देखा कि महेश टिर्की और पांडू नरोटे ‘बस स्टैंड के पास एक सुनसान जगह’ पर खड़े हैं. करीब सवा छह बजे सफ़ेद टोपी पहने एक आदमी वहां आता है और ये लोग ‘संदेहास्पद’ तरीके से आपस में बात करने लगते हैं. तब अतुल शांताराम अपने स्टाफ के साथ इन लोगों की तरफ बढ़ते हैं और इनसे पूछताछ करते हैं लेकिन ये लोग ‘गोलमोल’ जवाब देते हैं. ऐसा होने पर अतुल दो पंचों को बुलाते हैं और उनकी मौजूदगी में इन तीनों लोगों से इनका नाम पूछते हैं. सही नाम बताने के बाद अतुल इन तीनों को अहेरी थाने ले आते हैं.

थाने लाकर पंचों की मौजूदगी में ही इन तीनों लोगों की तलाशी ली जाती है. तलाशी में महेश टिर्की के पास से जो सामान बरामद होता है वह इस तरह है: प्रतिबंधित माओवादी संगठन के तीन पर्चे, एक पर्स जिसमें 60 रूपये हैं, एक पहचान पत्र, एक मोबाइल फोन और 28 मई 2013 का बल्हारशाह रेलवे स्टेशन का एक प्लेटफार्म टिकट (इस प्लेटफार्म टिकट की ख़ास अहमियत है जिस पर हम आगे चर्चा करेंगे). पांडू नरोटे की तलाशी में जो सामान मिला, वह था: एक मोबाइल, एक पर्स जिसमें 1480 रूपये थे, स्टेट बैंक की एक पासबुक, खुद का और बेटी का जन्म प्रमाण पत्र, फोटो पहचान पत्र, जाति पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, 20 अगस्त का एक अखबार, एक छाता, एक मोबाइल और 28 मई का एक बिलकुल वैसा ही प्लेटफार्म टिकट जैसा महेश टिर्की के पास से बरामद हुआ था. इसके अलावा जो सामान हेम मिश्रा से बरामद किया गया, वह था: 16 जीबी का एक मेमोरी कार्ड, एक कैमरा, चार्जर, लाइब्रेरी कार्ड, जेएनयू का पहचान पत्र, एटीएम कार्ड, दिल्ली मेट्रो कार्ड, 7500 रूपये, 19 अगस्त 2013 का दिल्ली से बल्हारशाह का एक ट्रेन टिकट और 19 अगस्त का ही एक अखबार.

सारे देश की पुलिस गुमशुदा व्यक्तियों को उनकी फोटो और तमाम जानकारियां होने के बाद भी खोज नहीं पाती. लेकिन इन पुलिस अधिकारियों ने प्रशांत राही को सिर्फ एक एसएमएस में आए विवरण से ही पहचान कर गिरफ्तार कर लिया  

ये तमाम चीज़ें बरामद होने पर इनका पंचनामा भरा गया और अतुल शांताराम ने इन तीनों लोगों के खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, (यूएपीए) की धारा 13, 18, 20, 38, 39 और भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर दिया. दर्ज किये जाने के बाद इस मामले की जांच सुहास बावचे नाम के एक पुलिस अधिकारी को सौंप दी गई.

अभियोजन की कहानी के अनुसार गिरफ्तार किये जाने के बाद जब इन लोगों से पूछताछ की गई तो महेश और पांडू ने बताया कि नक्सली महिला नर्मदा अक्का ने उन्हें यह काम सौंपा था कि वे दिल्ली से आ रहे हेम मिश्रा को जंगलों में छिपे भूमिगत नक्सलियों तक सुरक्षित पहुंचाएं. इस कहानी के अनुसार पूछताछ में यह भी पता चला की हेम जो मेमोरी कार्ड लेकर आया था उसमें ‘गुप्त सूचनाएं’ थी और उसे ये सूचनाएं नक्सलियों तक पहुंचाने का काम प्रोफेसर जीएन साईबाबा ने सौंपा था. इसी पूछताछ में पुलिस को यह भी मालूम हुआ कि जल्द ही प्रशांत राही भी पास के गोंदिया जिले में आने वाला है और उसकी भी इस मामले में अहम भूमिका है.

प्रशांत राही की गिरफ्तारी की जो कहानी अभियोजन ने बताई है, वह भी बेहद दिलचस्प है. अभियोजन के अनुसार जब जांचकर्ता सुहास बावचे को प्रशांत राही के आने की सूचना मिली तो उन्होंने एक सितंबर को यह सूचना गोंदिया जिले के चिचगड़ थाने में पहुंचाई. इस थाने के दो अधिकारी - राजेंद्र तिवारी और रमेश येड़े - इस दिन छत्तीसगढ़ बॉर्डर के पास पहाड सिंह नाम के एक अपराधी की तलाश में गश्त कर रहे थे. तभी इनके मोबाइल में एक एसएमएस आया कि प्रशांत राही नाम का एक आरोपित - जिसे अहेरी थाने की पुलिस ढूंढ रही है - रायपुर की तरफ आया है. यह एसएमएस देखते ही दोनों पुलिसकर्मी प्रशांत राही की तलाश में जुट गए और चिचगड़ टी-पॉइंट के पास इन्हें प्रशांत राही अपने एक साथी के साथ ‘संदेहजनक’ स्थिति में खड़ा मिल गया.

सारे देश की पुलिस गुमशुदा व्यक्तियों को उनकी फोटो और तमाम जानकारियां होने के बाद भी खोज नहीं पाती. लेकिन इन पुलिस अधिकारियों ने प्रशांत राही को सिर्फ एक एसएमएस में आए विवरण से ही भीड़ के बीच पहचान कर गिरफ्तार कर लिया. इसके बाद इन पुलिसकर्मियों ने प्रशांत रही और उसके साथ गिरफ्तार हुए विजय टिर्की को अहेरी थाने की पुलिस को सौंप दिया. अभियोजन की कहानी के अनुसार हेम मिश्रा की ही तरह प्रशांत राही ने भी गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में प्रोफेसर साईबाबा का नाम लिया. तब पुलिस ने दिल्ली आकर साईबाबा के घर की तलाशी ली जिसमें उन्हें ‘प्रतिबंधित साहित्य’ सहित कई ‘ख़ुफ़िया जानकारियां और संवेदनशील सामग्री’ बरामद हुई. इस तमाम सामग्री के आधार पर पुलिस ने माना कि ये सभी लोग माओवादी संगठनों के सदस्य हैं और सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का षडयंत्र रच रहे हैं. इसके बाद साईबाबा को भी गिरफ्तार करने के बाद इन सभी के खिलाफ आतंकवाद से निपटने के लिए बने क़ानून यूएपीए की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया. यहां से इस मामले में पुलिस का काम ख़त्म हुआ और न्यायालय का काम शुरू हुआ.

अब बात करते हैं उन कमियों की जो अभियोजन की इस कहानी में जगह-जगह नज़र आती हैं. इनकी शुरुआत अभियोजन की कहानी की शुरुआत से ही हो जाती है. अभियोजन के अनुसार हेम मिश्रा, महेश टिर्की और पांडू नरोटे को 22 अगस्त 2013 को गिरफ्तार किया गया था. जबकि इन तीनों लोगों का कहना था कि इन्हें 22 को नहीं बाकि 20 को ही गिरफ्तार कर लिया गया था और तीन दिनों तक गैर-कानूनी तरीके से थाने में रखा गया. इन तीनों लोगों की बातों को इसलिए भी बल मिलता है क्योंकि इनके पास 19 अगस्त और 20 अगस्त के अखबार मिले थे. साथ ही हेम मिश्रा के पास जो ट्रेन टिकट मिला वह 19 अगस्त का था यानी वह 19 को दिल्ली से चलकर 20 को बल्हारशाह पहुंचा था. ऐसे में उसके पास 19 अगस्त का अखबार होना स्वाभाविक बात है. लेकिन अगर इन्हें सच में 22 अगस्त को गिरफ्तार किया जाता तो इन सभी के पास दो-तीन पुराने अखबार होने का कोई औचित्य नहीं था.

सफ़र में अखबार खरीदना और अगस्त के मौसम में महाराष्ट्र में छाता लेकर चलना, दोनों ही बेहद आम बात हैं, लेकिन न्यायालय ने इसे सिर्फ माओवादी होने की निशानी माना है  

अभियोजन की कहानी के अनुसार ही महेश और पांडू नरोटे अहेरी बस स्टैंड पर हेम को लेने पहुंचे थे. ट्रेन टिकट से साफ़ पता चलता है कि हेम 20 अगस्त को बल्हारशाह स्टेशन पहुंच चुका था. इसलिए स्वाभाविक है कि महेश और पांडू भी इसी दिन उसे लेने पहुंचे होंगे. साथ ही अगर हेम को 22 अगस्त को गिरफ्तार किया गया तो वह 20 अगस्त से 22 अगस्त तक कहां रहा, इस बारे में अभियोजन ने कहीं कोई जिक्र ही नहीं किया. हालांकि उसके पास इन सभी के मोबाइल फोन की लोकेशन डीटेल्स थीं लेकिन उन्हें अदालत में पेश नहीं किया गया. अगर ऐसा किया जाता तो पता चल जाता कि हेम मिश्रा, महेश टिर्की और पांडू नरोटे 20 से 22 अगस्त तक कहां थे और उन्हें किस दिन गिरफ्तार किया गया था.

अभियोजन की शुरूआती कहानी में ही एक बड़ा विरोधाभास है. इसमें कभी कहा गया है कि महेश और पांडू अहेरी बस स्टैंड पर हेम का इंतज़ार कर रहे थे और पुलिस उन पर नज़र रखे हुए थी. और जैसे ही हेम इन लोगों से मिला पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया. जबकि न्यायालय में अभियोजन ने कहा कि महेश और पांडू बल्हारशाह रेलवे स्टेशन से हेम को अपने साथ लाए थे और जब ये तीनों लोग अहेरी बस स्टैंड पर उतरे तब पुलिस ने इन तीनों को गिरफ्तार किया. इस विरोधाभास पर न्यायालय कोई चर्चा नहीं की है.

हेम मिश्रा, पांडू नरोटे और प्रशांत राही के पास जो अखबार बरामद हुए हैं, उस पर न्यायालय की टिप्पणी भी काफी विवादास्पद है. न्यायालय में एक पुलिस अधिकारी ने बयान दिया था कि अखबार का इस्तेमाल माओवादी एक-दूसरे को पहचानने के लिए करते हैं. इस बयान को स्वीकार करते हुए न्यायालय ने अपने फैसले में कई बार लिखा है कि इन लोगों के पास से अखबार या छाता बरामद होना बताता है कि ये लोग माओवादी हैं. सफ़र में अखबार खरीदना और अगस्त के मौसम में महाराष्ट्र में छाता लेकर चलना, दोनों ही बेहद आम बात हैं, लेकिन न्यायालय ने इसे सिर्फ माओवादी होने की निशानी माना है.

महेश टिर्की और पांडू नरोटे के पास से एक-एक प्लेटफार्म टिकट भी बरामद किया गया था जिसका ऊपर भी जिक्र किया गया है. यह प्लेटफार्म टिकट इनकी गिरफ्तारी से लगभग तीन महीने पहले यानी 28 मई 2013 का था. इस टिकट का इस्तेमाल अभियोजन ने अपनी कहानी को मजबूत करने के लिए किया है. अभियोजन के अनुसार महेश और पांडू 28 मई को नक्सलियों के कहने पर बल्हारशाह रेलवे स्टेशन गए थे और वहां उन्होंने दिल्ली से आए एक व्यक्ति को पांच लाख रूपये पहुंचाए थे. इस बात की गवाही एक ‘सरकारी गवाह’ ने भी दी थी. अभियोजन ने यह दावा किया कि प्लेटफार्म टिकट इस बात का सबूत है कि ये दोनों लोग 28 मई को रेलवे स्टेशन गए थे और ये लोग नक्सलियों की मदद करते रहे हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर ये दोनों सच में 28 मई को रेलवे स्टेशन गए होते - वह भी एक अपराध करने - तो क्या अपने अपराध के सबूत के तौर पर उस प्लेटफार्म टिकट को तीन महीने तक अपनी जेब में लिए घुमते रहते? साफ़ है कि यह प्लेटफार्म टिकट कहानी गढ़ने के लिए पुलिस ने जान-बूझकर दर्शाया होगा. लेकिन इस सवाल पर भी न्यायालय ने कोई चर्चा नहीं की है.

इस पूरे मामले में जिस तरह के लोगों को पंचनामे भरवाने के लिए पंच बनाया गया है, वह भी पुलिस की भूमिका पर कई सवाल खड़े करता है. यह पूरा मामला ‘इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य’ और ‘प्रतिबंधित साहित्य’ जैसे सबूतों पर टिका है, लेकिन जिन पंचों के सामने ऐसी सामग्री की बरामदगी दिखाई गई है, उनमें अधिकतर या तो अनपढ़ हैं या सिर्फ अपना नाम भर लिखना जानते हैं. इन पंचों में एक संतोष नानाजी नाम के होम गार्ड के जवान हैं जिन्हें हेम मिश्रा से बरामद हुए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का पंचनामा भरवाने के लिए पंच बनाया गया है. लेकिन जिरह के दौरान संतोष नानाजी ने स्वीकारा है कि उन्हें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कोई जानकारी नहीं है और वे पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड और ब्लूटूथ डिवाइस में अंतर भी नहीं बता सकते. इन पंच से ही पुलिस ने हेम से बरामद हुए उपकरणों - मेमोरी कार्ड, कैमरा, चार्जर, लाइब्रेरी कार्ड, पहचान पत्र, एटीएम कार्ड, दिल्ली मेट्रो कार्ड - की बार-बार शिनाख्त करवाई है. जिरह के दौरान यह भी सामने आया है कि संतोष नानाजी पहले भी कई मामलों में अहेरी थाने की पुलिस के लिए पंच बनते रहे हैं.

एन मौके पर, जब पंचनामा भरा जाना था और यह दिखाया जाना था कि क्या-क्या सामान साईबाबा के घर से जब्त किया जा रहा है, पुलिस के वीडियो कैमरे की मेमोरी पूरी भर गई. लिहाजा यह कैमरे में रिकॉर्ड ही नहीं हुआ  

ऐसे ही पंच का इस्तेमाल प्रोफेसर साईबाबा के घर में हुई तलाशी के दौरान भी किया गया. इस तलाशी के दौरान साईबाबा ने लिखित में दिया था कि उनके किसी साथी प्रोफेसर या उनके वकील की मौजूदगी में यह तलाशी ली जानी चाहिए. लेकिन पुलिस ने न तो उनके इस आवेदन को माना, न दिल्ली यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर से तलाशी की अनुमति ली और न ही यह तलाशी किसी राजपत्रित अधिकारी की मौजूदगी में ली गई. बल्कि पुलिस ने दिल्ली यूनिवर्सिटी में नाई की दुकान चलाने वाले एक जगत भोले नाम के व्यक्ति को बतौर पंच वहां बुला लिया. जगत भोले ने जिरह में स्वीकार किया कि उसे कुछ भी पढ़ना-लिखना नहीं आता, वह सिर्फ अपने हस्ताक्षर ही कर सकता है. ऐसे व्यक्ति को पंच बनाकर पुलिस ने तमाम किताबों, लेखों, पर्चों, पेन ड्राइव, हार्ड ड्राइव, लैपटॉप और मेमोरी कार्ड्स की बरामदगी का पंचनामा भरवाया है. लेकिन न्यायालय ने इसे कोई बड़ी चूक नहीं माना.

प्रोफेसर साईबाबा के घर में हुई तलाशी के दौरान एक और दिलचस्प घटना हुई. महाराष्ट्र पुलिस यहां तलाशी के लिए दिल्ली पुलिस के साथ आई थी और इस तलाशी के दौरान वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जा रही थी. लेकिन एन मौके पर, जब पंचनामा भरा जाना था और यह दिखाया जाना था कि क्या-क्या सामान साईबाबा के घर से जब्त किया जा रहा है, पुलिस के वीडियो कैमरे की मेमोरी पूरी भर गई. लिहाजा यह कैमरे में रिकॉर्ड ही नहीं हुआ. पुलिस ने तर्क दिया कि पंचनामे के दौरान भी कुछ पुलिस वालों ने अपने मोबाइल पर वीडियो बनाए हैं, लेकिन ऐसा कोई वीडियो कभी अदालत में नहीं पहुंचा. जब मामले के जांचकर्ता से इस बारे में कोर्ट में सवाल किया गया तो उनका कहना था कि, ‘मैं कई बार वह वीडियो लेने दिल्ली गया लेकिन मुझे वह नहीं मिल पाया.’ अमूमन पुलिस की ऐसी ‘चूक’ सीधे तौर से आरोपित के पक्ष में जाती है लेकिन इस मामले में न्यायालय ने इसे भी बड़ी चूक नहीं माना.

न्यायालय ने हेम मिश्रा, प्रशांत राही और साईबाबा की कॉल डिटेल्स पर भी चर्चा की है. न्यायालय ने माना है कि कॉल डिटेल्स से मालूम होता है कि ये लोग आपस में संपर्क में थे लिहाजा ये सभी मिलकर षडयंत्र कर रहे थे. लेकिन इन कॉल डिटेल्स पर ध्यान दें तो पता चलता है कि इन लोगों की पूरे साल भर में बमुश्किल 12 से 15 बार ही आपस में बातें हुई थीं. एक-दूसरे को जानने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी कॉल्स सामान्य बात है. महत्वपूर्ण यह भी है जिस दौरान हेम मिश्रा गिरफ्तार हुए, उससे कई दिन पहले तक भी उनकी साईबाबा से कोई बात नहीं हुई थी. जबकि अभियोजन के आरोप के अनुसार यदि वे सच में साईबाबा के कहने पर ‘गुप्त सूचनाएं’ लेकर गढ़चिरौली जा रहे थे तो उन्हें लगातार साईबाबा के संपर्क में होना चाहिए था. बिलकुल यही स्थिति प्रशांत राही की कॉल डिटेल्स से भी सामने आती है.

इस पूरे मामले में पुलिस ने ऍफ़आईआर से लेकर पंचनामों तक में भारी चूक की है. ऍफ़आईआर में कई जगह ‘ओवरराइटिंग’ है, अलग-अलग स्याही का प्रयोग है और इसके दर्ज होने का समय पंचनामों में दर्ज समय से बिलकुल मेल नहीं खाता. ऐसा ही पंचनामों और सील किए गए सामान के साथ भी हुआ है. साईबाबा के घर से जो सामान बरामद करके सील किया गया था, फॉरेंसिक लैब पहुंचने से पहले ही उस सामान की सील बदल चुकी थी. इसके लिए जांचकर्ता ने तर्क दिया कि इलेक्ट्रिक उपकरणों से मोबाइल फोन को अलग निकालने के लिये यह सील तोड़नी पड़ी. जब एक बार सील खुल गई तो इस बात की विश्वसनीयता भी नहीं रह गई कि फॉरेंसिक लैब वही सामान पहुंचा है जो साईबाबा के घर से बरामद हुआ था, लेकिन न्यायालय ने इस तथ्य को भी कोई बड़ी भूल नहीं माना.

अब चर्चा करते हैं उस सामग्री की जिसके बरामद होने पर न्यायालय ने इन सभी लोगों को माओवादी और देश के खिलाफ षडयंत्र करने वाला माना है. इस सामग्री को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है. एक वह लेख, फोटो या वीडियो हैं जिनमें हेम मिश्रा, प्रशांत राही या साईबाबा के नाम, तस्वीर या झलकियां मौजूद हैं. इस तरह के लेख, फोटो या वीडियो दिल्ली के ‘गांधी शांति प्रतिष्ठान’ या ‘कॉन्स्टीट्यूशन क्लब’ जैसी जगहों पर हुए सम्मेलनों के हैं जो बाकायदा देशभर के मीडिया को प्रेस विज्ञप्तियां जारी करने के बाद किये गए थे.

इस तरह के लेख या वीडियो में कहीं भी हेम मिश्रा, प्रशांत राही या साईबाबा के नाम या चेहरे नहीं है और इस तरह के वीडियो यूट्यूब पर भी दर्जनों देखे जा सकते हैं  

इन वीडियो में ये लोग ‘लाल सलाम’ जैसे नारे लगाते, जनवादी जीत गाते और सैन्य बलों की भूमिका पर सवाल उठाते दिख रहे हैं. ऐसे लेख, फोटो या वीडियो यह तो दर्शाते हैं कि इन लोगों का रुझान वामपंथ की तरफ है और ये लोग कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों पर विश्वास करते हैं. लेकिन इनके आधार पर ये कहीं भी साबित नहीं होता कि ये लोग किसी हिंसक आंदोलन को बढ़ावा दे रहे थे या किसी सशस्त्र विद्रोह का षडयंत्र रच रहे थे.

दूसरे वे लेख और वीडियो हैं जिनमें नक्सली गोलियां चलाते दिख रहे हैं, जंगलों में गुरिल्ला ट्रेनिंग करते दिख रहे हैं और जिनमें लोगों से विद्रोह का आह्वान किया जा रहा है. लेकिन इस तरह के लेख या वीडियो में कहीं भी हेम मिश्रा, प्रशांत राही या साईबाबा के नाम या चेहरे नहीं है और इस तरह के वीडियो यूट्यूब पर भी दर्जनों देखे जा सकते हैं. लेकिन न्यायालय ने इन दोनों तरह के लेख और वीडियो को साथ में देखते हुए माना है कि ये आरोपित भी हिंसक विद्रोह में विश्वास करते हैं. साथ ही न्यायालय ने माना है कि कई लेखों में जो नाम दर्ज हैं वे इन्हीं लोगों के छद्म नाम हैं और माओवादी अक्सर ऐसे छद्म नामों का प्रयोग करते ही हैं.

पूरे मामले मैं इतने विरोधाभासों के बावजूद भी न्यायालय ने सभी आरोपितों को दोषी माना और इन धाराओं के तहत अधिकतम सजा देते हुए कुल छह में से पांच आरोपितों को उम्रकैद की सजा सुना दी. सिर्फ विजय टिर्की नाम के एक आरोपित को कोर्ट ने यह मानते हुए दस साल की सजा सुनाई है कि उसका माओवादियों से कोई पुराना संपर्क नहीं लगता. वैसे इस तरह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का रुख काफी अलग रहा है. बिनायक सेन पर जब लगभग यही आरोप लगे थे जो अब प्रोफ़ेसर साईबाबा पर लगे हैं, तो निचली अदालत ने उन्हें भी उम्रकैद की सजा सुना दी थी. लेकिन 2011 में जब उनका मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो न्यायालय ने माना कि बिनायक सेन पर किसी भी तरह देशद्रोह जैसा आरोप नहीं बनता. ज्यादा से ज्यादा उन्हें नक्सली विचारधारा का समर्थक कहा जा सकता है और यह कोई अपराध नहीं है.

उस वक्त बिनायक सेन के खिलाफ मुख्यतः दो लोगों ने पैरवी की थी. मुकुल रोहतगी, जो आज भारत के अटॉर्नी जनरल हैं और यूयू ललित, जो आज स्वयं सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश हैं. लेकिन इन दिग्गजों के तर्कों को भी नकारते हुए सर्वोच्च न्यायालय की डबल बेंच ने बिनायक सेन को रिहा कर दिया था. साथ ही बेंच ने यह भी कहा कि जिस तरह गांधी की आत्मकथा रखने से कोई गांधीवादी नहीं हो जाता, उसी तरह नक्सली साहित्य रखने के कारण किसी को नक्सली घोषित नहीं किया जा सकता. संभव है कि कुछ समय बाद इस मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय का यही रुख हो.