पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों की घोषणा के बाद बीते रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय में आए. इस दौरान अपने भाषण में उन्होंने कहा, ‘मैं नए भारत को उभरते हुए देख रहा हूं. युवाओं के सपनों का नया भारत. महिलाओं की आकांक्षाओं का नया भारत. गरीबों की आशाओं-अपेक्षाओं का नया भारत.’ इसी भाषण में आगे प्रधानमंत्री ने यह भी कहा, ‘मैं उनमें से नहीं हूं, जो चुनावी कैलेंडर के हिसाब से काम की दिशा तय करते हैं.’

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भाजपा को मिली बंपर जीत, मणिपुर जैसे राज्य में पहली बार प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने और गोवा में भी ठीक-ठाक प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री का यह भाषण आया था. उनके भाषण की ये पंक्तियां गौर करने लायक हैं, खासतौर पर यह देखते हुए कि गोवा और मणिपुर में उनकी पार्टी किस तरह सरकार बनाने जा रही है.

गोवा और मणिपुर में सत्ता के लिए धमाचौकड़ी

गोवा में भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले चुके हैं. बहुत संभव है, वे 16 मार्च को विधानसभा में बहुमत भी साबित कर दें. यह स्थिति इस तथ्य के बावजूद है कि हाल में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की जनता ने भाजपा को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं दिया है. 40 सीटाें वाली विधानसभा में 21 की जरूरत है जबकि भाजपा को सिर्फ 13 सीटों पर जीत हासिल हुई है. 2012 के विधानसभा चुनाव में उसने 22 सीटें जीती थीं. यही नहीं, निवर्तमान मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर के अलावा उनके पांच मंत्री भी इस बार चुनाव हार गए.

दूसरी तरफ, राज्य की 17 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी है. लेकिन वह सरकार नहीं बना पाई. क्योंकि चुनाव के बाद महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) और गोवा फॉरवर्ड पार्टी (जीएफपी) के तीन-तीन और इतने ही निर्दलीय विधायकों ने भाजपा को समर्थन दे दिया. इसलिए जनमत न होकर भी भाजपा के पास बहुमत का जुगाड़ हो गया.

मणिपुर की हालत तो ज्यादा ही विचित्र है. यहां 60 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 31 सीटें जरूरी हैं. कांग्रेस ने इस आंकड़े से सिर्फ तीन कम यानी 28 सीटें जीती हैं. वह इस राज्य में भी सबसे बड़ी पार्टी है लेकिन लगातार चौथी बार सरकार बनाने की उसकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है. महज 21 सीटें ही जीतने वाली भाजपा को सरकार बनाने का न्योता मिल गया है. यहां वह सब हो रहा है, जिसकी प्रधानमंत्री के ‘नए भारत’ में तो अपेक्षा नहीं ही की जानी चाहिए.

मणिपुर में एक उम्मीदवार (टी रबींद्र सिंह) ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (एआईटीसी) के टिकट पर चुनाव जीता. लेकिन उन्होंने चुनाव के बाद भाजपा में शामिल होने का फैसला कर लिया. यही नहीं, कांग्रेस केे टिकट पर जीते 18 विधायकों के बारे में खबर आई कि वे भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं. इसे यूं भी कहा जा सकता है कि उन्हें भाजपा में शामिल करने की कोशिश की जा रही है. जिरिबाम के निर्दलीय विधायक अशब उद्दीन को तो इंफाल हवाईअड्‌डे से ही उठवा लिए जाने जैसी खबरें भी आई हैं.

यही सब पिछले साल अरुणाचल और उत्तराखंड में भी हुआ था

गोवा और मणिपुर में जो हो रहा है, वह कोई नई बात नहीं है. अभी पिछले साल ऐसी ही उठापटक अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में मची थी. दोनों राज्यों में मामला शीर्ष अदालतों तक भी पहुंचा. अदालती लड़ाई के बाद उत्तराखंड में तो तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने किसी तरह सरकार बचा ली. लेकिन अरुणाचल में पूरी की पूरी कांग्रेस सरकार ही भाजपाई हो गई. एेसी घटनाएं हालांकि पहले भी केंद्र और राज्यों में हुई हैं, लेकिन ये वाकये इसलिए काबिले जिक्र हैं क्योंकि ये प्रधानमंत्री मोदी के ‘नए और उभरते भारत’ में हुए.

दल-बदल रोकने के लिए कानून तो बना, उसे सख्त भी किया गया

सत्ता के लिए चुने हुए जनप्रतिनिधियों की ऐसी मौकापरस्ती को रोकने के लिए कानून बना हुआ है. प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने जनवरी 1985 को 52वां संविधान संशोधन विधेयक संसद से पारित कराया था. इसके जरिए संविधान के अनुच्छेद 101, 102, 190 और 191 में बदलाव किया गया. संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. इसी 10वीं अनुसूची को दल-बदल कानून के तौर पर जाना जाता है. यह संशोधन एक मार्च 1985 से लागू हुआ. इसके मुताबिक कोई भी सांसद/विधायक सत्ता में भागीदारी, किसी निजी लाभ या धन के लालच में अगर अपनी पार्टी को छोड़कर दूसरे दल में शामिल होता है तो उसकी सांसदी/विधायकी छिन जाती है. संसद और विधानसभाओं में किसी मुद्दे पर मतदान के दौरान भी यही नियम लागू होता है. यानी अगर किसी ने पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोटिंग की तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाती है.

हालांकि इस कानून में एक गुंजाइश थी. इस 10वीं अनुसूची की धारा-तीन में प्रावधान था कि सदन में पार्टी की कुल संख्या के एक तिहाई सदस्य मिलकर एक साथ दल-बदल कर सकते हैं. सांसद/विधायक काफी समय तक इसका फायदा उठाते रहे. लिहाजा, दिसंबर 2003 में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद से 91वां संविधान संशोधन विधेयक पारित कराया. इसके जरिए 10वीं अनुसूची की धारा-तीन को खत्म कर दिया गया. जनवरी 2004 से लागू हुए नए प्रावधान के मुताबिक, संसदीय या विधायक दल में विभाजन की अब अनुमति नहीं है. लेकिन अगर मूल पार्टी किसी अन्य दल में विलय का फैसला करती है, तो किसी सदस्य की सदस्यता रद्द नहीं होगी. बशर्ते मूल पार्टी के टिकट पर जीते कम-से-कम दो तिहाई सदस्य उस फैसले के साथ हों.

यानी गुंजाइश अब तक बनी हुई है, इसीलिए और सख्ती की मांग

दल-बदल कानून के तहत समय-समय पर सांसदों/विधायकों पर कार्रवाइयां हुई हैं. इसके बावजूद अपनी गुंजाइशों के कारण यह कानून बहुत प्रभावी नहीं हो पा रहा है. शायद इसी वजह से राजनीति के बड़े-बड़े दिग्गज भी इसमें बदलाव की मांग करते रहे हैं. पिछले साल उत्तराखंड में चले राजनीतिक घमासान पर टिप्पणी करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था, ‘भाजपा देश के संविधान के खिलाफ काम कर रही है. जब ऐसा ही करना है तो इससे अच्छा होता कि भाजपा संविधान की 10वीं अनुसूची को ही खत्म कर देती.’

पिछले साल दिसंबर में ही पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने मीडिया से बातचीत में कहा था, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्ता सुख के लिए दल-बदलू नेता रोज राजनीतिक विचाराधारा बदल रहे हैं. यह घिनौनी प्रवृत्ति है. इस पर लगाम लगाना समय की मांग है. इस पर केवल सख्त कानून से ही लगाम लगाई जा सकती है ताकि लोकतंत्र को हास्यास्पद स्थिति से बचाया जा सके.’ राज्य में उस वक्त सत्ताधारी अकाली दल से बड़ी संख्या में नेताओं के कांग्रेस की तरफ पलायन के मद्देनजर बादल ने यह बयान दिया था.

दोनों नेताअों के बयान काफी अहमियत रखते हैं क्योंकि जिस वक्त वाजपेयी सरकार ने दल-बदल कानून में सख्त प्रावधान जोड़े थे, तब दोनों एनडीए (भाजपा की अगुवाई वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) का हिस्सा थे. बादल तो अब भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए के साझीदार है. ऐसे में उनकी बातें अनसुनी नहीं की जा सकतीं. सो, सवाल उठना लाजमी है कि प्रधानमंत्री मोदी जब ‘नए भारत के उभार’ की बात करते हैं तो क्या वे ‘पुराने भारत की इस दल-बदल प्रवृत्ति’ पर लगाम लगाने की दिशा में कदम उठाएंगे?

हालांकि वे ऐसा कुछ करेंगे इस पर संदेह का भी पूरा आधार मौजूद है क्योंकि मणिपुर में भाजपा की ओर से ही अगले मुख्यमंत्री के तौर पर एन बीरेन सिंह को नामित किया गया है. वे कांग्रेस से भाजपा में आयातित नेता हैं. उन्होंने बुधवार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. और यह संयोग ही है कि वहां की मौजूदा राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला भी एक जमाने में कांग्रेस की कद्दावर नेता रही हैं!