गोवा के मुख्यमंत्री के तौर पर मनोहर पर्रिकर ने अब इस राज्य में भाजपा की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी संभाल ली है. हालांकि इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार का रक्षा मंत्रालय जैसा विभाग छोड़ना पड़ा. द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी कई रक्षा परियोजनाएं हैं जिन पर मनोहर पर्रिकर के जाने से विपरीत असर पड़ना तय माना जा रहा है.

अखबार के मुताबिक मंत्रालय के कई अधिकारी मानते हैं कि पर्रिकर के लिए यहां से जाने का यह सही समय नहीं था. ये अधिकारी बताते हैं कि रक्षा खरीद नीति को अंतिम रूप देने में वैसे ही काफी देर हो चुकी है. पर्रिकर के कार्यकाल में महीनों की मशक्कत के बाद इस पर मामला कुछ आगे बढ़ा था. रक्षा खरीद प्रक्रिया से जुड़े दिशा-निर्देश, नियम-कायदे आदि तय हो चुके थे. यह भी कि सेनाओं के लिए भारत में साजो-सामान बनाने वाली निजी कंपनियां किन-किन मापदंडों पर विदेशी फर्मों के साथ भागीदारी कर सकेंगी. सूत्र बताते हैं कि यह नीति जारी होने ही वाली थी कि पर्रिकर ने रक्षा मंत्रालय से इस्तीफा दे दिया.

यही नहीं, सेनाओं के आधुनिकीकरण, सैन्य साजो-सामान के स्वदेशीकरण, सातवें वेतन आयोग के हिसाब से वेतन और पेंशन पुनर्निरीक्षण, सैन्य-असैन्य संबंध आदि जैसे मसलों पर भी मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में मामला आगे बढ़ा था. मगर अब इन सभी पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं क्योंकि फिलहाल कोई पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं है. नए रक्षा मंत्री जब आएंगे, तो वे इन सभी पर क्या रुख अपनाते हैं, कितना वक्त लेते हैं, इस पर ही निर्भर करेगा कि इन अहम मसलों पर अागे क्या फैसला होता है.

फिलहाल केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के पास रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार है. अखबार से बात करते हुए पूर्व एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर कहते हैं, ‘रक्षा मंत्रालय ऐसा महकमा नहीं है जो किसी को अतिरक्त प्रभार के तौर पर सौंप दिया जाए. खास तौर पर वित्त मंत्री को तो बिल्कुल नहीं क्योंकि उनके पास पहले ही बहुत काम होता है.’ पूर्व सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर भी कहते हैं, ‘रक्षा मंत्रालय में निरंतरता जरूरी है. यहां रक्षा परियोजनाओं पर लगातार निगाह रखने, उन्हें आगे बढ़ाते रहने की जरूरत पड़ती है. अन्यथा इनमें अनावश्यक देरी होती है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा साबित हो सकता है.’