गोवा में कांग्रेस की सरकार बन सकती थी अगर राहुल गांधी के पास नितिन गडकरी जैसे मैनेजर और मनोहर पर्रिकर जैसे लीडर होते. चुनाव के मैदान में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन पांच सितारा होटल के बंद कमरे में वह मुख्यमंत्री की कुर्सी हार गई. गोवा चुनाव में नंबर दो पर आने के बाद अमित शाह ने वह तेज़ी दिखाई जो राहुल गांधी नहीं दिखा पाए.

उत्तर प्रदेश चुनाव में जबरदस्त जीत के बाद भी अमित शाह ने गोवा से अपनी नजर हटने नहीं दी. 11 मार्च को नतीजे आने के बाद उन्होंने नितिन गडकरी से संपर्क किया और देर रात ही गडकरी गोवा पहुंच गए. सुनी-सुनाई है कि वहां के एक पांच सितारा होटल में आधी रात के बाद भाजपा की सरकार बनाने की कवायद शुरू हुई जो सुबह पांच बजे तक चली.

गोवा में बहुमत के लिए 21 विधायक चाहिए, भाजपा के पास सिर्फ 13 ही थे और कांग्रेस के पास 17. यानी भाजपा को कम से कम आठ और विधायकों की ज़रूरत थी और कांग्रेस को सिर्फ चार. गोवा में दो छोटी पार्टियां महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी और गोवा फॉरवर्ड पार्टी के तीन विधायक चुनकर आए थे. नितिन गडकरी के करीबी सूत्र बताते हैं कि ‘11 और 12 मार्च की दरम्यानी रात को गडकरी ने सबसे पहले एमजीपी के नेताओं से बात की. उऩकी पहली शर्त थी - मनोहर पर्रिकर ही गोवा के मुख्यमंत्री बनेंगे.’

इसके बाद सबसे पहले गडकरी और पर्रिकर ने आपस में बात की. जब पर्रिकर गोवा लौटने के लिए तैयार दिखे तो रात में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से बात की गई. इसके बाद फैसला हुआ कि पर्रिकर को ही भाजपा विधायक दल का नेता चुना जाएगा. पर्रिकर का नाम तय होने के बाद भाजपा को गोमांतक पार्टी के तीन विधायकों का समर्थन मिल गया. भाजपा के पास दो निर्दलीय विधायक का समर्थन पहले से था. लेकिन सत्ता अभी भी तीन विधायक दूर थी. इसके बाद गडकरी ने गोवा फॉरवर्ड पार्टी के विजय सरदेसाई से बात शुरू की.

चुनाव से पहले और चुनाव के प्रचार के दौरान भी पर्रिकर और सरदेसाई के बीच रिश्ते काफी खट्टे रहे थे. समस्या ये भी थी कि विजय सरदेसाई गडकरी के साथ-साथ कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह से भी बात कर रहे थे. सुनी-सुनाई है कि विजय सरदेसाई ने दिग्विजय के सामने पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत को मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी लेकिन इस पर उन्हें कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला. जबकि गडकरी ने उनकी मनचाहे विभाग के तीन मंत्रियों की मांग फटाफट मान ली.

यानी कि कांग्रेस जब तक अपने विधायक दल का नेता चुनती तब तक भाजपा के पास 21 विधायक आ चुके थे. अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो कांग्रेस के पास न नेता था और न बहुमत का दावा. दूसरी तरफ भाजपा के पास नेता भी था और 21 विधायकों के समर्थन की चिट्ठी भी.’ 2005 में झारखंड में भाजपा के साथ भी ऐसा ही हुआ था. तब भाजपा के पास तीस विधायक थे, लेकिन राज्यपाल ने सिर्फ 16 विधायक होने के बावजूद झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार इसलिए बनवा दी थी क्योंकि उसके पास बहुमत की चिट्ठी थी.

सच्चाई वैसे है भी यही. गोवा में कांग्रेस न तो अपना नेता आसानी से चुन पाई और न ही सही समय पर बहुमत जुटाने की कोशिश ही कर पाई. वहां कांग्रेस के पास एक सरकार, कई उम्मीदवार की स्थिति थी. गोवा में पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत, पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह राणे, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ल्युज़िन्हो फलेरो का दावा मजबूत था, लेकिन तीन बार के विधायक चंद्रकांत कवलेकर को विधायक दल का नेता चुना गया. नेता चुनने के बाद कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पहुंची, राज भवन से भी संपर्क किया गया. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. सुप्रीम कोर्ट ने पर्रिकर का राजतिलक नहीं रोका और राजभवन से कांग्रेस नेताओं को सिर्फ मुलाकात का मौका मिला.

अब कांग्रेस के विधायक खुलेआम दिल्ली से आए नेताओं को कोस रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस को अब गोवा में सरकार बनाने से ज्यादा पार्टी को बचाने के बारे में सोचना होगा. जाती विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे विश्वजीत राणे ने तो कांग्रेस नेतृत्व को धमकी दे भी दी है. वे दिग्विजय सिंह के सामने विधायक दल की बैठक छोड़कर बाहर आ गए थे. राणे ने एक इंटरव्यू में साफ कहा, ‘जनता ने हमें जिताया था, पार्टी नेताओं की वजह से हम हार गए. कभी-कभी मुझे लगता है मैं गलत पार्टी में हूं.’ साफ है कि भाजपा अब कांग्रेस को उस खेल में भी पछाड़ रही है जिसकी काग्रेस कभी चैंपियन मानी जाती थी.