आज अपना 26वां जन्मदिन मना रहीं आलिया भट्ट फिल्म इंडस्ट्री में भले ही सात साल और 11 फिल्म पुरानी हो चुकी हों लेकिन हर नई फिल्म के साथ वे साबित करती जा रही हैं कि उनके अभिनय में कितनी ताजगी भरी है. अगर किसी को यकीन न हो तो वह हाल ही में आई उनकी फिल्म गली बॉय देख सकता है. यहां आलिया भट्ट ठीक उसी तरह सहज और पसंद आने वाला अभिनय करती हैं जैसा कि वे हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया और डियर जिंदगी जैसी हल्की-फुल्की फिल्मों में करती आई हैं.

आप इंतजार करते हैं कि कब वो फ्रेम में आएं और कुछ ऐसे भाव अपने चेहरे से अभिव्यक्त करें कि आपका दिन बन जाए. और भाइयो और बहनो, इस फिल्म में भी आपका दिन कई बार बनता है. अगर कभी कोई आपसे पूछे कि यार बहुत सुना है कि सलीके की नैचुरल एक्टिंग कर पाना दुर्लभ कला होती है लेकिन आखिर ये नैचुरल होना होता क्या है, तो आप सीधे उन सज्जन को आलिया भट्ट की फिल्मों की तरफ भेज दीजिएगा. उस अभिनेत्री की तरफ जो कैमरा ऑन होते ही फ्रेम को रोशन कर देती है.

26 साल की उम्र वाली इस अभिनेत्री ने अपने दो फिल्मों के संक्षिप्त से फिल्मी जीवन में ही हमारा परिचय एक ऐसी नैचुरल अभिनेत्री से करा दिया था जिसे परदे पर देखना उम्मीद से भर देता है.

यहां आलिया भट्ट की शुरुआती तीन फिल्मों के तीन ही दृश्यों को हम एक बार फिर से और ढंग से याद करना चाहते हैं. उनकी पहली फिल्म ‘स्टूडेंट आफ द इयर’ तो एक फिल्म के तौर पर भी याद रखने लायक नहीं है, इसलिए उसका कोई भी दृश्य इस लेख में शामिल नहीं है.

हाईवे

हाईवे आलिया की बेहद शानदार फिल्म थी. आलिया के किरदार वीरा की उदासी, गुस्से, दुख, प्यार, हंसी, आंसू का कोलाज. करियर की मात्र दूसरी फिल्म जिसमें कुछ तीन-चार सीन छोड़ कर - जिसमें आलिया अपने नथुने फुला कर अभिनय करती हैं - पूरी हाईवे ही आलिया के अभिनय का दस्तावेज है.

हाईवे में कई सीन थे जो आलिया भट्ट को समर्थ अभिनेत्री का रुतबा देते हैं. खुद से बात करने वाले आलिया के लगभग सारे ही दृश्य और आलिया-रणदीप के साथ वाले कई सीन दिल को छूते हैं. एक वो सीन भी जिसमें आलिया पहाड़ों के बीच बहती नदी में हमेशा के लिए बैठ चुके एक पत्थर पर नंगे पांव बैठकर बहती नदी और पहाड़ों को देख बेइंतेहा हंसती, रोती और फिर हंसती हैं. छोटा-सा एक दृश्य जो आजाद करके हमें कहीं उड़ा ले जाता है.

लेकिन फिल्म का सर्वश्रेष्ठ सीन वो है जो दिल को छूता नहीं है, हमेशा के लिए हद्य में अंकित हो जाता है. वह सीक्वेंस जो एक साथ अद्भुत भी है और क्रूर भी. और ऐसा हमारी फिल्मों में कम ही होता है.

पहला दृश्य : एक साथ अद्भुत और क्रूर एक दृश्य

एक लंबा मोनोलॉग. बचपन में हुए यौन शोषण पर. विदेशी चॉकलेट्स लाने वाले, रोज घर आने वाले ताया जी जो नौ साल की वीरा को बाथरूम में ले जाकर उसके मुंह पर मजबूती से हाथ रख देते थे, नल चला देते थे, ताकि उसकी चीखें बाहर न जा सकें. चार मिनट से ऊपर के इस सीन में आलिया भट्ट सच में सबसे ऊंचे शिखरों में से एक पर नीचे पांव लटकाकर बैठ जाती हैं. आउट आफ फोकस खाना खाते हुए रणदीप हुड्डा और उनसे मुंह फेरे बैठीं आलिया इस दृश्य में हमें जिस तरह विचलित कर जाती हैं, उसकी ताकत वे कहां से ले आईं - जबकि इससे पहले वे सिर्फ स्टूडेंट आफ द ईयर जैसी पोपली फिल्म में आई थीं – हमें समझ नहीं आता.

इस सीन को पूर्णता देता है फिल्म का क्लाइमेक्स. आठ मिनट का वह क्लाइमेक्स जिसमें बचपन में चॉकलेट देने वाले अंकल के मुंह पर वीरा चॉकलेट पोत देती है और अपनी आजादी की घोषणा करती है. बस कहीं-कहीं नथुने फुलाती आलिया मखमल में टाट के पैबंद सी हो जाती हैं, लेकिन इतनी सहनशीलता तो हमने भी सीखी है कि ऐसी चीजों को नजरअंदाज कर एक साहसिक और निर्भीक दृश्य और उसके अभिनय की तारीफ कर सकें.

2 स्टेट्स

औसत से आधे माले ऊपर की एक फिल्म. वह फिल्म जिसके हीरो अर्जुन कपूर अगर कभी-कभी परदा करते होते तो दर्शकों को सुकून होता क्योंकि एक्टिंग करते हुए वहां वे ज्यादा कुछ नहीं करते. ऐसी एक फिल्म को सिर्फ आलिया भट्ट ही औसत से ऊपर का बना देती हैं, हालांकि 2 स्टेट्स में ऐसा कोई खास सीन नहीं है जिसमें आलिया ने अभिनय की वह तीव्रता दिखाई हो जैसी वे हाईवे में बार-बार दिखा चुकी थीं. लेकिन पूरी फिल्म में हर सीन, हर फ्रेम में उनकी ताजगी फिल्म को साधारण कहानी के बावजूद इतना तरो-ताजा कर देती है कि देखने वाले को हर वह सीन अच्छा लगता है जिसमें आलिया होती हैं. सामान्य से कपड़ों में, बिना मेकअप की जिल्द चढ़ाए, नथुने फुलाने की समस्या को कम कर चुकीं आलिया 2 स्टेट्स में मेनस्ट्रीम की मसाला फिल्मों के रंग-बिरंगे फ्रेमों में भी परफेक्ट लगकर चौंकाती हैं. मीठा वाला चौंकाना.

दूसरा दृश्य : जब खूबसूरती, हंसी, घबराहट और आंसू की शादी हो जाए

क्लाइमेक्स में जब एक बढ़िया से बजते तमिल गीत के साथ आलिया शादी करने के लिए समंदर किनारे बने एक विशाल मंदिर की सीढियां चढ़कर ऊपर आती हैं, सीने में धौंकनी सी चलती सांसों से जन्मी नर्वसनेस को मुस्कुराहट, उत्साह और अपनी खूबसूरती में वे इतने सलीके से समाहित करती हैं, कि उन पर फिदा होने से बचने के लिए अर्जुन कपूर पर नजरें गड़ानी पड़ती हैं. लेकिन फिर लौट कर नजरें खुद-ब-खुद उन्ही पर गिर पड़ती हैं. ऐसी ही चमकीली इमेजरी होती होगी, जो शादी न करने को तैयार बालकों को भी शादी के मंडप तक पहुंचा देती होगी! वे लोग जो कहते हैं कि छोटे-छोटे पलों में जिंदगी होती है, ऐसे ही पलों से बनने वाले दृश्यों में कभी-कभी फिल्म होती है.

हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया

एक साधारण फिल्म जो खराब इसलिए है क्योंकि जिस लव-स्टोरी में कार और महंगा लहंगा प्यार के एहसास को जगाने का टर्निंग प्वाइंट बने, ऐसा पूंजीवादी प्यार हमें नहीं चाहिए. ऐसी प्रेम-कथा कहती फिल्म भी नहीं. लेकिन बावजूद इसके फिल्म में आलिया और वरुण की कैमिस्ट्री जबरदस्त है. दोनों जिन भी दृश्यों में साथ हैं, वे ही फिल्म की जान हैं. इस कामयाबी में वरुण का भी हिस्सा है लेकिन बड़ा हिस्सा एक बार फिर आलिया का है क्योंकि वे एक बार फिर नई आलिया लगती हैं. नई तरह से लुभाती हैं.

इस फिल्म में दो सीन हैं जो हमें पसंद हैं. और चूंकि दोनों में मुकाबला तगड़ा है इसलिए उस वाले का जिक्र हम यहां कर देते हैं जिसमें शाहरुख हैं और गुरुद्वारे वाले को अपना तीसरा पसंदीदा सीन बना देते हैं.

शाहरुख वाला सीन आपको पता ही है कि फिल्म का आखिरी सीन है. शादी के लिए सजे ट्रक के ऊपर खड़ी आलिया और ’कुछ कुछ होता है’ के ‘तुम पास आए’ का बैकग्राउंड में बजता प्यानो पीस. शाहरुख की तरह आलिया का दोनों हाथ हवा में उठाना और रात में आसमानी रंग का चमकीला एविएटर चश्मा और लहंगा पहने हुए यह डायलाग मारना, ‘हम एक बार जीते हैं, एक बार मरते हैं...और आगे की लाइन मैं भूल गई!’. लेकिन हमसे ये सीन आज भी भूला नहीं जाता!

तीसरा दृश्य : गुरुद्वारे के अंदर, गुरुद्वारे के बाहर

फिल्म में प्रेम-कहानी जब परिपक्व होती है, आलिया प्यार को परदा देने वाले अभिनय में और भी पक्की होती हैं. गुरुद्वारे के अंदर वाले सीन में, जब हंप्टी आलिया को पाने पंजाब पहुंचता है, आलिया का चेहरा छोटे से इस सीन में कोई हरकत नहीं करता, सिर्फ उनकी आंखें परिवार के रिश्तों से गुजरते हुए, हंप्टी पर रुकते हुए फिर तितर-बितर होते हुए आंसू गिराती हैं. छोटा-सा एक प्यारा दृश्य. थोड़ी देर बाद दोनों जब गुरुद्वारे के पीछे मिलते हैं, गले लगते हैं, दृश्य फिर प्यार की कोई नई कविता हो जाता है.

ऐसे ही दृश्यों में दिखता है कि सिर्फ मेथड एक्टिंग ही गंभीर अभिनय में बड़ा वाला मील का पत्थर नहीं है, स्पांटेनियस होना भी अभिनय की एक अविरल नदी है जिसमें बहने के लिए हमारे पास करीना कपूर और परिणीति चोपड़ा के अलावा अब आलिया भट्ट भी हैं. और इस तीसरी वाली अभिनेत्री से उम्मीदें भी मील के पत्थर जितनी बड़ी हैं.