दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को छोड़कर देश के बाकी नेता ईवीएम पर सवाल उठाने से बच रहे हैं. सवाल है कि आखिर ये दोनों नेता ही ऐसा क्यों कर रहे हैं?

इसका सीधा सा जवाब है, विधानसभा चुनाव में हार का सबसे ज्यादा नुकसान इन दोनों नेताओं और इनकी पार्टियों को ही हुआ है. इसके अलावा अभी तो शुरुआत है, इन्हें आगे और ज्यादा नुकसान होने का डर भी सता रहा है. अरविंद केजरीवाल के पास इस वक्त सिर्फ दिल्ली जैसे आधे-अधूरे राज्य की सरकार है और मायावती के पास तो वह भी नहीं हैं. केजरीवाल के पास लोकसभा के चार सांसद थे जिनमें से तीन को उन्होंने खुद ही पार्टी से निकाल दिया. मायावती के पास लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है. आम आदमी पार्टी के पास आज राज्यसभा में एक भी सांसद नहीं है और मायावती के पास वहां सिर्फ छह सांसद हैं.

मायावती खुद भी राज्यसभा की सदस्य हैं और उनका कार्यकाल अगले साल अप्रैल में समाप्त हो रहा है. उत्तर प्रदेश चुनाव में उनकी पार्टी से केवल 19 विधायक चुने गए हैं. ऐसे में मायावती अकेले अपनी पार्टी के दम पर अगले साल खुद को भी राज्यसभा तक नहीं पहुंचा पाएंगी. उल्टे उनकी पार्टी के 19 विधायक कब तक उनकी पार्टी में बने रहेंगे इस पर भी सवालिया निशान है. भाजपा के एक सांसद कहते हैं, ‘बहुत उम्मीद है कि 2019 से पहले बहनजी की पूरी पार्टी विधानसभा से गायब हो जाए. मुस्लिम विधायक समाजवादी पार्टी या कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं. बाकी बचे विधायकों को भाजपा जिस दिन ग्रीन सिग्नल देगी उस दिन आ जाएंगे.’

केजरीवाल के सामने भी चुनौती कम बड़ी नहीं है. आम आदमी पार्टी की खबर रखने वाले एक पत्रकार बताते हैं कि ‘अरविंद केजरीवाल पंजाब में जीत को लेकर इतने आश्वस्त थे जितने दिल्ली को लेकर भी नहीं थे. पंजाब में जीत के बाद जश्न मनाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी. केजरीवाल के सरकारी बंगले को तिरंगे गुब्बारों से सजाया गया था. एलईडी स्क्रीन लगाई गई थी, समर्थकों की भीड़ इकट्ठा की गई थी.’ लेकिन नतीजों ने उन्हें अंदर तक झकझोर कर रख दिया. तीन दिन वे इसी उधेड़बुन में लगे रहे कि आखिर पंजाब में हारे तो कैसे हारे.

आम आदमी पार्टी के पंजाब के एक नेता बताते हैं कि ‘ज़मीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं से रिपोर्ट मांगी गई. दिल्ली और पंजाब की टीम ने मिलकर एक-एक बूथ के हिसाब से वोट का हिसाब-किताब लगाया और फिर रिपोर्ट अरविंद केजरीवाल को सौंपी गई. इस रिपोर्ट को देखकर वे चौंक गए.’ वे जिस इलाके में जीतने की सोच रहे थे वहां उनके उम्मीदवार की ज़मानत तक जब्त हो गई थी. कई बूथों पर तो आम आदमी पार्टी को दस वोटों से भी कम मिले थे. इसलिए अरविंद केजरीवाल अब अपनी हार के लिए ईवीएम में गड़बड़ी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

केजरीवाल कहते हैं, ‘हमारी शंका है कि हमारा 20 से 25 प्रतिशत वोट अकाली दल को ट्रांसफर कर दिया गया. जिस बूथ पर हमारे पांच कार्यकर्ता हैं, उस बूथ पर हमें दो वोट मिले. बाकी वोट कहां गए. कार्यकर्ता कसम खा रहे हैं कि उन्होंने आप को ही वोट दिया.’ अगर ईवीएम सही हैं तो इस सवाल का एक ही जवाब है कि आम आदमी पार्टी को उनके कार्यकर्ताओं ने भी वोट नहीं दिया.

ऐसा सिर्फ पंजाब में ही नहीं हुआ. गोवा में भी केजरीवाल को जोर का झटका लगा. गोवा में वो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार तय करके चुनाव लड़े थे. लेकिन चालीस में से 39 सीट पर उनके उम्मीदवारों की ज़मानत जब्त हो गई. केजरीवाल पंजाब के बाद गुजरात में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को चुनौती देने वाले थे. पंजाब के नतीजे आने से पहले ही आम आदमी पार्टी की एक टीम गुजरात भेज दी गई थी. लेकिन अब उस टीम को वापस बुला लिया गया है और फिलहाल इंतज़ार करने के लिए कहा गया है.

अरविंद केजरीवाल को एक बार फिर उम्मीद दिल्ली से ही है. अप्रैल में दिल्ली में नगर निगम चुनाव होने वाले हैं. यहां भी केजरीवाल की सीधी टक्कर भाजपा से ही है. अगर निगम चुनाव में केजरीवाल जीतते हैं तो फिर उनका हौसला बढ़ेगा. अगर निगम चुनाव में उऩकी हार होगी तो दिल्ली में भाजपा के हौसले और बुलंद होंगे. केजरीवाल की पार्टी के करीब 27 विधायकों पर चुनाव आयोग में पहले ही सुनवाई चल रही है. उन पर ऑफिस ऑफ प्रोफिट का केस है और उनकी विधानसभा की सदस्यता रद्द भी हो सकती है.

अरविंद केजरीवाल के पास तो कम से कम एक मौका है कि वे दिल्ली में अपनी साख बचा सकते हैं. लेकिन मायावती के पास अगले कुछ सालों तक कोई भी ऐसा अवसर नहीं जब वे अपनी ताकत दिखा सकें और अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचा सकें.

इसलिए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को बुलाया और कहा, ‘ये बेईमानी वाली जीत है. घोटाले वाली जीत है. हर साल 11 मार्च को हम प्रदर्शन करेंगे, काला दिवस मनाएंगे.’

मायावती के लिए अब यही एक रास्ता बचा है. उन्हें फिर से सत्ता से हटकर सड़क की सियासत करनी पड़ेगी जो उनके गुरु काशीराम ने ज़िंदगी भर की. मुख्यमंत्री केजरीवाल और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के लिए ये डगर बड़ी मुश्किल है, लेकिन इकलौता विकल्प भी यही है कि केजरीवाल फिलहाल दिल्ली देखें और मायावती अपनी पार्टी. अगर दोनों ने ईमानदारी से ये काम किया तो इन्ही ईवीएम से फिर से उनके लिए वोट निकल सकते हैं.