जैसलमेर से करीब 60 किलोमीटर दूर, भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास गांगा की बस्ती नाम का एक छोटा-सा गांव है. यह देश के उस इलाके में बसा है जहां सबसे कम बरसात होती है. इसके बावजूद भी गांगा की बस्ती में रहने वाले अधिकांश ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय खेती या पशुपालन ही है. इन लोगों को बुवाई के लिए बरसात के दौरान सिर्फ तीन-चार दिन का ही मौक़ा मिलता है. यदि किसी कारण से ग्रामीण यह मौक़ा गंवा देते हैं, तो कुदरत इन्हें फिर दूसरा कोई मौका नहीं देती.

पिछली बरसात में इस गांव के रहने वाले दिलबर को भी यह मौक़ा गंवाना पड़ा था. उन्होंने किराए पर ट्रैक्टर लेकर अपने खेतों में लगवाया ही था कि वन विभाग के अधिकारियों ने उसे जब्त कर लिया. दिलबर इतने पढ़े-लिखे नहीं थे कि ट्रैक्टर वापस पाने के लिए जरूरी लिखा-पढ़ी कर पाते. इसलिए उन्हें अपना ट्रैक्टर छुड़ाने के लिए बिचौलियों की मदद लेनी पड़ी. जो पैसे दिलबर ने खेती के लिए जुटाए थे, वह सरकारी चालान भरने और बिचौलियों की फीस चुकाने में गंवा दिए.

छह दिनों की भागादौड़ी के बाद जब तक दिलबर को ट्रैक्टर वापस मिला, बुवाई का समय निकल चुका था. वे बताते हैं, ‘यहां हर दूसरे साल तो अकाल पड़ता है. दो-तीन साल में एक बार ही अच्छी खेती का मौका मिलता है. इस साल वह मौका मिला था लेकिन सरकार ने छीन लिया.’ दिलबर अकेले नहीं हैं जिन्हें इस तरह से मौका गंवाना पड़ा हो. उनके और आस-पास के कई गांवों के सैकड़ों किसानों को हर साल ही खेती का यह दुर्लभ मौक़ा इसी तरह गंवाना पड़ता है. इसकी वजह ये है कि ये गांव जहां बसे हैं, वह इलाका अब डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) के अंतर्गत आता है.

डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) का गठन साल 1980 में हुआ था. 3162 वर्ग किलोमीटर में फैले इस पार्क का अधिकांश हिस्सा जैसलमेर जिले में पड़ता है और बाकी बचा बाड़मेर जिले में. यह एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहां राजस्थान का राज्य पुष्प - रोहिडा, राज्य वृक्ष - खेजड़ी, राज्य पशु - चिंकारा और राज्य पक्षी - ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, चारों ही कुदरती तौर पर पाए जाते हैं. इसलिए पर्यावरण संरक्षण के लिए डीएनपी की खासी अहमियत है. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड - जिसे स्थानीय भाषा में गोडावण कहते हैं - अब डीएनपी के अलावा लगभग अन्य सभी जगहों से विलुप्त हो चुका है.

गोडावण से जुडी एक दिलचस्प बात यह भी है कि इसे सिर्फ इसके नाम के चलते ‘राष्ट्रीय पक्षी’ के खिताब की दौड़ से बाहर कर दिया गया था. दरअसल 60 के दशक में जब राष्ट्रीय पक्षी का चुनाव किया जा रहा था तो मशहूर पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने गोडावण को यह दर्जा दिए जाने की पैरवी की थी. बताते हैं कि इस सुझाव को इसलिए ठुकरा दिया गया क्योंकि चयन समिति ने माना कि इस पक्षी का नाम गलत उच्चारित किये जाने संभावनाएं काफी ज्यादा हैं. यानी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ को चूक होने पर ‘ग्रेट इंडियन बास्टर्ड’ बोला जा सकता था इसलिए गोडावण को न चुनते हुए मोर को राष्ट्रीय पक्षी बना दिया गया.

‘1981 में दस साल पूरे होने थे और हमें इस जमीन पर अधिकार मिलने थे. लेकिन 1980 में यह इलाका डीएनपी घोषित हो गया और हमें आज तक उस जमीन पर खातेदारी नहीं मिल सकी.’  

आज कई पक्षी विज्ञानी मानते हैं कि अगर गोडावण को राष्ट्रीय पक्षी बनाया गया होता तो शायद लोगों में इस पक्षी को लेकर ज्यादा जागरूकता होती और यह विलुप्ति की कगार पर नहीं पहुंचा होता. उस दौर में देश में हजारों गोडावण पाए जाते थे लेकिन आज दुनियाभर में इनकी संख्या 150 से भी कम हो चुकी है. इनमें अधिकतर डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) में ही पाए जाते हैं. लेकिन डीएनपी बनने के बाद भी इस पक्षी के संरक्षण में कोई तेजी नहीं आई और इनकी संख्या लगातार घटती ही रही है. दूसरी तरफ डीएनपी बनने से दिलबर जैसे हजारों लोग मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित कर दिए गए हैं.

जैसलमेर जिले में ही निम्बा नाम का एक गांव है जो पूरी तरह से डीएनपी के अंतर्गत है. इस गांव में घूमने से समझा जा सकता है कि डीएनपी की कीमत यहां के निवासियों को किस तरह से चुकानी पड़ रही है. आज निम्बा के लोग बिजली और पानी के लिए तरस रहे हैं तो इसकी वजह भी नेशनल पार्क ही है. हालांकि कुछ समय पहले यहां बिलजी के लिए नई लाइन बिछनी शुरू हुई थी. बिजली के खंबे और तार भी यहां पहुंच चुके थे और पास के ही फलेडी गांव में नया बिजलीघर भी बन कर तैयार हो गया था. लेकिन इस नई लाइन से गांव तक बिजली पहुंचती उससे पहले ही यह काम रोक दिया गया, क्योंकि डीएनपी क्षेत्र में बिजली की लाइन नहीं बिछाई जा सकती.

फलेडी के पूर्व सरपंच लियाकत अली बताते हैं, ‘डीएनपी 1980 में ही बन चुका था और तभी से यह कानून भी था कि यह प्रतिबंधित क्षेत्र है जिसमें बिजली की लाइन नहीं बिछ सकती. इसलिए डीएनपी से तो नई लाइन का प्रस्ताव पास ही नहीं होना चाहिए था. लेकिन यह प्रस्ताव पारित हुआ और जब काम लगभग पूरा होने को था तब इसे रोक दिया गया. न तो हमें इस लाइन से बिजली मिली और न कोई दूसरी लाइन यहां बनी. यही स्थिति पानी की भी है. डीएनपी होने के चलते यहां पानी की लाइन भी नहीं बिछ सकती.’

डीएनपी बनने से इन गांवों का विकास तो रुका ही, यहां के लोगों के व्यवसाय और जीवनयापन भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. ग्रामीण बताते हैं कि खेती और पशुपालन ही उनके दो मुख्य व्यवसाय हैं और दोनों पर नेशनल पार्क बनने से बहुत बुरा असर पड़ा है. थार रेगिस्तान के जिस हिस्से में ये गांव बसे हैं, वहां ऐसे कम ही लोग हैं जिनके पास अपनी जमीनें हों. इसलिए पीढ़ियों से यहां के लोग सार्वजनिक जमीनों पर ही खेती करते आ रहे हैं. लेकिन डीएनपी बन जाने के कारण यहां ऐसी जमीन पर खेती करना प्रतिबंधित हो गया है.

लियाकत अली बताते हैं, ‘1971 में हम सभी गांव वालों को खेती के लिए जमीन आवंटित की गई थी. यह गैर-खातेदारी जमीन थी और इस शर्त पर दी गई थी कि दस साल काश्त करने पर इस जमीन की खातेदारी भी हमें मिल जाएगी. 1981 में दस साल पूरे होने थे और हमें इस जमीन पर अधिकार मिलने थे. लेकिन 1980 में यह इलाका डीएनपी घोषित हो गया और हमें आज तक उस जमीन पर खातेदारी नहीं मिल सकी.’

वैज्ञानिक मानते हैं कि गोडावण को बचाने के लिए इन ग्रामीणों और इनके पशुओं का यहां रहना जरूरी है. इससे ग्रामीणों की स्थिति ऐसी बन पड़ी है कि उन्हें सरकारी नीतियां ही हाशिये पर धकेल रही हैं.  

इन गांवों के अधिकतर किसानों के पास खेती के लिए गैर-खातेदारी जमीन ही है. लेकिन इस तरह की जमीन पर न तो इन किसानों को ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ की सुविधा मिलती है और न ही बीज इत्यादि खरीदने के लिए सहकारी समितियों से कोई मदद. जिन थोड़े से लोगों के पास यहां निजी जमीन है वे ऐसा कर सकते हैं लेकिन वह भी कई बार मुसीबत का सबब बन जाती है. स्थानीय निवासी निहाल खान बताते हैं, ‘अपने ही खेतों में बुवाई करने पर भी डीएनपी के अधिकारी हमसे इस बात के पैसे वसूलते हैं कि तुमने खेत की सीमा लांघकर नेशनल पार्क के इलाके में बुवाई की है. कभी ट्रैक्टर जब्त कर लिए जाते हैं तो कभी चालान कर दिया जाता है.’

खेती की तरह ही इन ग्रामीणों का दूसरा मुख्य व्यवसाय, पशुपालन भी डीएनपी बनने से प्रभावित हुआ है. निम्बा गांव के निवासी सुहैल बताते हैं, ‘मेरे पास करीब 80 जानवर हैं. चरने के लिए जब ये जानवर आस-पास के इलाके में जाते हैं तो डीएनपी के अधिकारी उन्हें जब्त कर लेते हैं. वे कहते हैं कि तुम्हारे जानवर प्रतिबंधित इलाके में घुसे हैं. एक जानवर (भेड़ या बकरी) वापस पाने के लिए हमें 50 रूपये देने पड़ते हैं. अगर दस जानवरों का भी वे चालान काट देते हैं तो हमें पांच सौ रूपये चुकाने पड़ते हैं.’ पैसा न चुकाने पर कई बार ग्रामीणों को बंदी भी बना लिया जाता है. लियाकत अली बताते हैं, ‘डीएनपी के कर्मचारियों को गिरफ्तार करने का कोई अधिकार नहीं है. लेकिन चालान होने पर अगर कोई ग्रामीण पैसे न चुका पाए तो कर्मचारी जंगलात की चौकियों में उन्हें बंद कर देते हैं. कई बार तो दो-दो दिन तक गांव के लोगों को भूखा-प्यासा इन चौकियों में कैद रहना पड़ता है.’

गांव वालों को हो रही इन समस्याओं के बारे में पूछने पर जैसलमेर के जिला वन संरक्षक (वन्यजीव), अनूप केआर कहते हैं, ‘जितना ग्रामीण बता रहे हैं, उतनी समस्याएं असल में नहीं हैं. यहां अधिकतर ग्रामीण ऐसे हैं जिनके पास पांच बीघा जमीन है लेकिन वो पचास बीघा पर खेती करते हैं. ऐसे में उनका चालान करना जरूरी है. आप देख लीजिये जैसलमेर में अगर कहीं आज रेगिस्तान बचा है तो वह सिर्फ डीएनपी के इस प्रतिबंधित क्षेत्र में ही बचा है.’ अनूप केआर आगे कहते हैं, ‘अगर यहां डीएनपी नहीं होता तो जैसलमेर की अन्य सरकारी जमीनों की तरह इस जमीन को भी विंडमिल लगाने के लिए आवंटित कर दिया जाता. तब तो गांव के लोगों को खेती के लिए बिलकुल भी जमीन नहीं मिलती.’

डीएनपी के चलते जिन गांवों का विकास बिलकुल रुक गया है, उन गांवों के पुनर्वास पर भी कई बार चर्चा हुई है. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रामीण यदि इस इलाके से बाहर जाते हैं तो इससे डीएनपी की पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ेगा. चूंकि गोडावण भोजन के लिए उन कीड़ों पर निर्भर होता है जो भेड़, बकरी, गाय या भैंस के गोबर में पनपते हैं इसलिए वैज्ञानिक मानते हैं कि गोडावण को बचाने के लिए इन ग्रामीणों और इनके पशुओं का यहां रहना जरूरी है. इससे ग्रामीणों की स्थिति ऐसी बन पड़ी है कि उन्हें सरकारी नीतियां ही हाशिये पर धकेल रही हैं.

डीएनपी में बसे इन गांवों में न तो बिजली की लाइन लग सकती है, न पानी की पाइपलाइन बिछ सकती है और न ही अन्य विकास कार्य हो सकते हैं. इन लोगों का पुनर्वास भी नहीं हो सकता क्योंकि इनके जानवरों की गोडावण के संरक्षण में अहम भूमिका है. गोडावण को बचाने के लिए जरूरी है कि इनके जानवर उस क्षेत्र में जाते रहें जिसे प्रतिबंधित किया गया है ताकि इनके गोबर से उसे भोजन मिलता रहे. लेकिन जब ये जानवर प्रतिबंधित क्षेत्र में जाते हैं तो ग्रामीणों को चालान भुगतना पड़ता है. यानी सरकारी नीतियां ही ऐसी बना दी गई हैं कि न तो इन ग्रामीणों का पुनर्वास हो सकता है और न ही उस इलाके का विकास जहां ये रह रहे हैं.