2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को 87 सीटें मिली थीं, लेकिन इस बार तो सिर्फ 19 सीटें ही मिल पाईं. इतनी बुरी हार का क्या कारण मानती हैं?

कारण मैं बता चुकी हूं और वो है ईवीएम मशीनों से छेड़छाड़. मुझे प्रतीत हो रहा है कि चुनाव आयोग की तरह आप भी मेरी बातों की तरफ ध्यान नहीं दे रही हैं. प्रधानमंत्री जी नहीं चाहते थे कि एक दलित महिला पांचवीं बार देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बने इसलिए उन्होंने ईवीएम मशीनों में ही गड़बड़ी करवा दी.

आपके हिसाब से ईवीएम मशीनों में किस तरह की छेड़छाड़ या गड़बड़ी हुई है?

उन मशीनों पर भयंकर टोटका किया हुआ प्रतीत होता है. वरना यह कैसे संभव है कि इंसान, वाहन, जानवर सबके सब मशीन में घुसते ही कमल के फूल में बदल जाएं!

आपने कहा है कि चुनाव में धोखाधड़ी के कारण अब आप हर महीने की 11 तारीख को काला दिवस मनाया करेंगी. काला दिवस के दिन आप क्या करेंगी?

जगह-जगह लगी मेरी मूर्तियों पर अक्सर जो धूल और कालिख जम जाती है, सब लोग मिलकर उसे साफ किया करेंगे ताकि वो हमेशा चमकती रहें और मेरी तरह मूर्तियों की चमक खो न जाए.

अगले साल आपका राज्यसभा का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है और फिर से राज्यसभा में जाने के लिए आपके पास पर्याप्त विधायक भी नहीं हैं. ऐसे में आप क्या करेंगी?

(चिढ़कर) समर्थन जुटाउंगी और क्या करूंगी! विधायकों की कमी पूरी करना क्या सिर्फ भाजपा को ही आता है!

आप और अरविंद केजरीवाल दोनों ही बैलेट पेपर के जरिए चुनाव कराने की बात कह रहे हैं. बैलेट पेपर के जमाने में धांधली होती तो आप क्या कहतीं?

तब मैं ईवीएम से वोटिंग कराने की बात करती, और क्या!

आपने 97 मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिया था और जामा मस्जिद के शाही इमाम सहित कई मुस्लिम धर्मगुरुओं से भी बसपा को वोट देने की अपीलें कराई थीं. फिर भी आपको मुस्लिम मतदाताओं के वोट क्यों नहीं मिल पाए?

मुझे प्रतीत हो रहा है कि मुस्लिम महिलाओं को बुर्का पहने हुए अपने बच्चों के साथ हाथी पर चढ़ने में काफी दिक्कत हुई. इस कारण उनके पति भी अपनी बेगमों के साथ दूसरी जगह चले गए.

आपका सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला जो 2007 में इतना हिट हुआ था, इस बार पिट कैसे गया?

यह सब मोदी जी और डोनाल्ड ट्रंप जी की मिलीभगत की वजह से हुआ है. जबसे ट्रंप ने एच1बी वीजा के नियम सख्त कर दिये हैं, तब से इंजीनियरिंग की पढ़ाई में लोगों का ज्यादा भरोसा नहीं रहा. अर्थात किसी भी किस्म की इंजीनियरिंग को लेकर कोई उत्साह नहीं बचा अब इस देश में.

आपने आज तक ट्विटर अकाउंट क्यों नहीं बनाया?

ये क्या होता है!

आपने चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग क्यों नहीं किया ?

हाथी इतना शांत और सीधा जानवर है कि आज भी जंगल के पुराने तौर-तरीकों में ही वह खुद को सहज पाता है. हमें डर था कि कहीं वो आधुनिक तौर-तरीकों से कहीं बिदक न जाए.

हाथी बिदके तो नहीं, लेकिन थककर बैठ जरूर गए. अब क्या करेंगी आप उनका?

(खीजकर) अब मैं उन्हें वापस जंगल में भेज दूंगी...

आपने मुख्तार अंसारी जैसे लोगों को बसपा में शामिल क्यों किया?

बबुआ (अखिलेश यादव) के गुंडों से लड़ने के लिए मुझे भी तो बाहुबली चाहिए थे कि नहीं!

जमीनी स्तर पर बहुत से दलितों को शिकायत है कि आपने उनसे ज्यादा सवर्णों और मुस्लिमों को रिझाने की कोशिश की. इस बात में कितनी सच्चाई है?

मुझे भी दलितों से शिकायत है कि उन्होंने मुझे एक बार भी नोटों की माला नहीं पहनाई... मैं दिन गिनती रही कि अब-तब....क्या उन्हें अहसास है कि बार-बार कैशलेस माला पहनकर मेरे दिल पर क्या बीती! नोटों की इतनी ही कमी थी तो गुलदस्ते की जगह कोई एटीएम मशीन ही गिफ्ट कर देते! लेकिन कुछ देते तो सही.

2008 में ‘फोर्ब्स’ पत्रिका ने आपको दुनिया में 100 सबसे ज्यादा ताकतवर महिलाओं में 59वें स्थान पर रखा था. इतनी ताकतवर स्थिति के बाद भी अपने ही राज्य में सत्ता के सबसे निचले पायदान पर पहुंचने को किस तरह देखती हैं?

देखिए, लोगों के लिए विकास का मुद्दा अभी नया-नया है. गांव में जब कोई नई कार या कुछ भी नया और अनोखा सा आता है तो बच्चों से लेकर बड़े तक सब उसके पीछे दौड़ लगा देते हैं. अर्थात इस बार सब के सब मोदी जी के विकास के मुद्दे के पीछे दौड़ गए हैं, लेकिन जल्दी ही विकास के मुद्दे से बोर होकर फिर से जात-पात की तरफ लौट आयेंगे. उस समय उन्हें मेरी अहमियत का अंदाजा होगा. तब मैं 59वें क्या 5वें पायदान पर पहुंच जाऊंगी.

यूपी के दलित तबके को लगता है कि इतनी ताकतवर होने के बावजूद उनके मुद्दों को जिस तरह उठाना चाहिए था, आपने वैसे नहीं उठाया. इस पर क्या कहेंगी?

उन्हें समझना चाहिए कि एक ही व्यक्ति हर तरह के काम में परफेक्ट नहीं होता. मैं मूर्तियां, मेमोरियल और पार्क बनवाने में माहिर हूं. क्या कोई आज तक मेरी तरह मजबूत और इतनी ज्यादा संख्या में मूर्तिया बनवा सका है? नहीं न! हां, मैं मानती हूं कि दलित आंदोलन के मामले में मैं कच्ची निकली पर अब इसका भी उपाय सोच लिया है मैंने.

वह क्या?

मैं हार्दिक पटेल को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बारे में सोच रही हूं. वह लड़का आंदोलन का काम अच्छे से संभालता है.

पर हार्दिक पटेल तो पटेलों का आंदोलन कर रहे हैं, फिर वे दलित आंदोलन का नेतृत्व कैसे करेंगे?

छुट्टियों के दिनों में हार्दिक, पटेल आंदोलन भी देख लिया करेगा. वह काफी प्रतिभाशाली आंदोलनकारी है.

क्या अब बसपा ‘बिल्कुल समाप्त पार्टी’ बन गई है?

(खीजकर) मुझे इस सवाल से भाजपा की सवर्ण मानसिकता की दुर्गंध आ रही है. मैं ऐसे मनुवादी सवालों के जवाब देना उचित नहीं समझती.