‘एक आदमी ट्रेन के इंतजार में रेलवे स्टेशन पर काफी देर से खड़ा है. ट्रेन आती है. लोग चढ़ते-उतरते हैं. स्टाफ की अदला-बदली होती है. इंजन बदलता है और ट्रेन चल देती है. चलती ट्रेन में भी कुछ लोग भागकर चढ़ते हैं. लेकिन वह आदमी खड़ा रहता है. ट्रेन निकल जाने के बाद वह स्टेशन मास्टर के पास पहुंचता है. उनसे पूछता है कि अमुक ट्रेन कब आएगी? स्टेशन मास्टर का जवाब- बस, अभी निकली है. आप दो मिनट से चूक गए. वह आदमी बोला- मैं तो काफी देर से खड़ा हूं. पलटकर स्टेशन मास्टर सवाल दाग देता है- क्या आप दिग्विजय सिंह हैं?’

कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पर यह चुटकी इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चल रही है. दिग्विजय भी इसी माध्यम से खूब पलटवार कर रहे हैं. शुक्रवार के दिन उन्होंने करीब 20 ट्वीट किए. इनमें उनका कहना था, ‘रणनीति के तहत मैंने बाबुश मोनसराटेट और विजय सरदेसाई की पार्टियों (यूजीपी और जीएफपी) से गठबंधन का प्रस्ताव दिया था. यूजीपी से हमारा गठबंधन हो गया. हमने पांच में से तीन सीटें जीत लीं. जबकि जीएफपी के साथ गठबंधन हमारे ही नेताओं ने नकार दिया. दुखद... जीएफपी को चार में से तीन सीटों पर जीत मिली. अगर हमने उसके साथ गठबंधन किया होता, तो हमारे पास 22 सीटें होतीं. फिर भी दिग्विजय दोषी हैं? निर्णय आप पर छोड़ता हूं.

बताने की जरूरत नहीं कि इन सभी बातों के छोर जुड़ते कहां से हैं. जाहिर है गोवा से, जहां विधानसभा चुनाव में 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी तो कांग्रेस बनी. लेकिन सरकार बनाई भाजपा ने, जिसे सिर्फ 13 सीटें मिली थीं. प्रभारी होने के नाते गोवा में कांग्रेस की सरकार बनवाने की जिम्मेदारी दिग्विजय की थी. लेकिन भाजपा उनकी नाक के नीचे से रातों-रात सरकार ले उड़ी. दिग्विजय जिस जीएफपी के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन की योजना बना रहे थे या बाद में उसके साथ आने की आस लगाए बैठे थे, वही तीन निर्दलीयों और एमजीपी (महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी) के तीन ही विधायकों के साथ भाजपा से जा मिली. दिग्विजय हाथ मलते रह गए,

अब उल्टे उन पर हमले होने लगे हैं. कांग्रेस विधायक विश्वजीत राणे ने तो उनकी तरफ उंगली उठाते हुए पार्टी ही छोड़ दी. उन्होंने कहा, ‘जनता ने हमें जिताया था. लेकिन पार्टी नेताओं की वजह से हम हार गए.’ गोवा कांग्रेस के अध्यक्ष लुइजिन्हो फलेरो ने भी सीधे दिग्विजय सिंह पर निशाना साधा. उन्होंने शुक्रवार को दावा किया, ‘कांग्रेस ने बहुमत के लिए जरूरी 21 विधायकों का समर्थन जुटा लिया था. सरकार गठन का दावा करने के लिए मैंने राज्यपाल के नाम पत्र तैयार कर लिया था. लेकिन दिग्विजय सिंह ने सलाह दी कि राज्यपाल जब बुलाएं, तभी उनसे मिलने जाना चाहिए और हम इंतजार करते रहे.’

लेकिन बात सिर्फ यहीं तक ही सीमित होती तो शायद ज्यादा गंभीर न माना जाता. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में कांग्रेस का करीब-करीब सूपड़ा साफ होने (दोनों राज्यों में क्रमश: सात और 11 सीटें) की आंच भी दिग्विजय तक पहुंच रही है. इसका कारण भी है. दिग्विजय सिंह उस कोर टीम के सबसे ताकतवर सदस्य हैं जो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अहम राजनीतिक और चुनावी मसलों पर मशविरा देती है.

दिग्विजय सिंह के प्रभाव का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्हें कई बार राहुल गांधी का राजनीतिक गुरु और मार्गदर्शक तक कह दिया जाता है. भले वे खुद इससे इनकार करते रहे हाें. राहुल की कोर टीम में दिग्विजय 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त भी पुरअसर तरीके से शामिल थे. वह भी इसके बावजूद कि 2012 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी रहते हुए वे राज्य विधानसभा चुनाव में पार्टी को कोई खास कामयाबी नहीं दिला सके थे. यही नहीं, उनकी विश्वस्त और मध्य प्रदेश कांग्रेस की नेता मीनाक्षी नटराजन भी राहुल की उसी कोर टीम का हिस्सा बताई जाती हैं, जिसे इन दिनों पार्टी के कई बड़े नेता ‘कोटरी’ (मंडली) कहने लगे हैं.

केंद्र में मंत्री रहे दो नेताअों और कुछ सांसदों ने बीते दो-तीन दिन के भीतर ही इस कोटरी के खिलाफ आवाज बुलंद की है. इनमें से एक हैं आदिम जाति मामलों और पंचायत राज विभाग के पूर्व मंत्री किशोर चंद्र देव. एक अखबार से बात करते हुए वे कहते हैं, ‘राहुल गांधी को अगर बने रहना है तो 10-12 लोगों की उस कोटरी से छुटकारा पाना होगा जो हर वक्त उन्हें घेरे रहती है. यही लोग किसी न किसी राज्य के प्रभारी बने रहते हैं. अहम पदों पर काबिज रहते हैं.’

दिग्विजय की अपनी वेबसाइट बताती है कि वे इस वक्त गोवा के अलावा कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का भी प्रभार संभाल रहे हैं. जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, ओडिशा जैसे राज्यों का प्रभार संभाल चुके हैं. इसी तरफ इशारा करते हुए किशोरचंद्र आंध्र प्रदेश और ओडिशा में पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर सवाल खड़े करते हैं. वे कहते हैं, ‘ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजेडी) की सरकार के खिलाफ सत्ताविरोधी रुझान है. लेकिन क्या आप उसका फायदा उठा सके? (पिछले महीने ही हुए पंचायत चुनाव में कांग्रेस पार्टी ओडिशा में तीसरे स्थान पर रही है.) यही हाल आंध्र प्रदेश का है, जहां जनता का मूड मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के खिलाफ है. जगनमोहन रेड्‌डी से भी लोग खुश नहीं हैं. लेकिन दिल्ली के हमारे पार्टी प्रभारी (दिग्विजय) तो लगता है जैसे पूरी तरह जगन के हाथों बिक चुके हैं. अब आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि राज्य में पार्टी सत्ता में वापसी करेगी?’

पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार तो यहां तक कहते हैं कि पार्टी में चापलूसी का बोलबाला है. उनका कहना है, ‘हां में हां मिलाने की संस्कृति पार्टी में हावी हो चुकी है. जब आप इसी संस्कृति को वफादारी मान लेते हैं तो नए नेतृत्व को उभार भी कैसे सकते हैं? राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने का संकट आ खड़ा हुआ है. इस हैसियत को बचाए रखने के लिए नेतृत्व को जो बन पड़े, वह करना चाहिए.’ वे पिछले साल अरुणाचल प्रदेश में हुई घटना की याद दिलाते हैं, जहां गोवा और मणिपुर की तरह ही सरकार फिसलकर भाजपा के हाथ में चली गई थी. अश्विनी कुमार सवाल करते हैं, ‘ऐसे मौकों पर आपके (राहुल के) सलाहकार क्या करते रहते हैं?’

पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने भी जनवरी में कुछ इसी तरह के आरोप लगाते हुए कांग्रेस छोड़ी थी. उन्होंने कहा था, ‘कांग्रेस को अब जननेताओं की नहीं, प्रबंधकों की जरूरत है.’ एक पूर्व केंद्रीय मंत्री रेणुका चौधरी ने तो सीधे दिग्विजय का इस्तीफा मांग लिया. गोवा में जो हुआ उसे ‘बेवकूफाना’ बताते हुए उनका कहना था, ‘राष्ट्रीय महासचिव (दिग्विजय) को सीधे इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए. वे खुद इस्तीफा दे दें या फिर नेतृत्व उन्हें बर्खास्त करे.’ मुंबई से पार्टी की पूर्व सांसद प्रिया दत्त कहती हैं, ‘कांग्रेस ही कांग्रेस को खत्म करती है. यह एक नहीं, कई मौकों पर देखा जा चुका है. हमें अपने भीतर से ही इस मर्ज का इलाज करने की जरूरत है.’

आवाजें दिग्विजय के गृह राज्य मध्य प्रदेश से भी उठी हैं. प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने 14 मार्च को ट्वीट किया, ‘अब करने से भी क्या होगा. जब करना चाहिए था तब किया नहीं.’ 14 मार्च को ही गोवा में भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता देने के खिलाफ कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. लेकिन शीर्ष अदालत ने फटकार लगाते हुए कांग्रेस की याचिका खारिज कर दी थी. राज्य की दिग्विजय सरकार में मंत्री रहे और फिलहाल देवास से कांग्रेस सांसद सज्जन सिंह वर्मा ने तो पार्टी नेतृत्व को पत्र लिख दिया है. पांच पन्नों के इस पत्र की प्रति सत्याग्रह के पास मौजूद है.

पत्र में वर्मा ने लिखा है, ‘कुछ परिवारों ने कांग्रेस को मिटाने की सुपारी ले रखी है....कौन सा क्षेत्र कांग्रेस के लिए मजबूत है..., उसे कैसे कमजोर किया जाए..., इसके लिए पूरा कुनबा ही वहां डेरा डाल लेता है. कहीं परिवार का मुखिया, कहीं मुखिया का भाई तो कहीं बेटा पहुंच जाते हैं. ऐसे परिवार के कुछ लोगों के पास अन्य राज्यों का प्रभार भी है. उन राज्यों के परिणामों की समीक्षा करें तो उनकी कार्यप्रणाली उजागर हो जाएगी.’ बताते चलें कि मध्य प्रदेश से राज्य सभा सदस्य दिग्विजय के पुत्र जयवर्धन, राघौगढ़ विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक हैं जबकि उनके भाई लक्ष्मण सिंह भी पार्टी के वरिष्ठ सक्रिय सदस्य हैं.

मध्य प्रदेश कांग्रेस के एक बड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘एक जमाना था, जब दिग्विजय सिंह कहा करते थे कि चुनाव काम कर के नहीं, बल्कि मैनेजमेंट से जीते जाते हैं. जनवरी 2002 में उन्होंने दलित एजेंडा वगैरह लागू करने की पहल इसी चुनावी मैनेजमेंट के तहत की थी. हालांकि 2003 में उनका यह दांव चला नहीं. पार्टी प्रदेश में चुनाव हार गई. लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने इसी कौशल के बलबूते केंद्र की राजनीति में प्रभावी दखल बना लिया और बनाए रखा. लेकिन अब लगता है कि वहां भी उनके दांव चल नहीं पा रहे हैं. इसीलिए सबसे तीखी आवाजें उनके खिलाफ ही सुनाई दे रही हैं.’

सो अब इस संदर्भ के आखिर में दिग्विजय सिंह का ही एक बयान काफी प्रासंगिक हो जाता है. अभी कुछ दिन पहले ही गोवा में उन्होंने कहा था, ‘गोवा के लोगों ने हमें कुछ कर दिखाने का आखिरी मौका दिया है. या फिर हम खत्म हो जाने के लिए तैयार रहें. ईश्वर हमारी मदद करे.’ अब गोवा में तो भगवान ने कांग्रेस की मदद नहीं की. क्या भविष्य में दिग्विजय की करेंगे?