पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के जो नतीजे आए, उनमें चार राज्यों में भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने में कामयाब रही. इस नतीजे को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने वाला माना जा रहा है. विपक्षी नेता भी यह मान रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उनका मुकाबला करना आसान नहीं होगा.

लेकिन इन चुनावी नतीजों में एक बात यह भी छिपी हुई है कि ये नतीजे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए भी राजनीतिक तौर पर बेहद अनुकूल हैं. इसकी एक नहीं बल्कि कई वजहें हैं.

सबसे पहली बात तो यह है कि जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू के सर्वेसर्वा नीतीश कुमार ने एकदम अंतिम समय में यह निर्णय लिया कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी. जबकि इसके पहले वे सूबे में कई सभाएं कर चुके थे. उन्होंने दम लगाकर यह कोशिश की थी कि उनका अजित सिंह की अगुवाई वाले राष्ट्रीय लोक दल और समान विचार वाले अन्य किसी दल से गठबंधन हो जाए.

अब उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों के आने के बाद यह कहा जा रहा है कि यहां के चुनावी मैदान से हटने का निर्णय नीतीश का मास्टर स्ट्रोक था. अगर उनकी पार्टी चुनावी लड़ी होती तो इस तरह के नतीजों के बाद उनकी भी सियासी फजीहत होती. लेकिन अब यह कहा जा रहा है कि उन्होंने पहले से ही भांप लिया था और यही वजह है कि वे उत्तर प्रदेश से अलग हो गए थे.

जानकारों के मुताबिक अगर अखिलेश यादव की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन को बहुमत मिल गया होता तो नरेंद्र मोदी से मुकाबले के लिए विपक्ष के जिन चेहरों के पीछे गोलबंद होने की संभावना है, उसके तगड़े दावेदार अखिलेश हो जाते. ऐसी स्थिति में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की छवि भी मजबूत होती. इस जीत का श्रेय जहां समाजवादी पार्टी और गैर कांग्रेसी विपक्षी दल अखिलेश यादव को देते, वहीं कांग्रेस पूरा का पूरा श्रेय राहुल गांधी को देती. मतलब साफ है कि अखिलेश और राहुल दोनों मजबूत होते और यह स्थिति नीतीश के अनुकूल नहीं होती. विपक्ष के सबसे स्वीकार्य और मजबूत चेहरे के तौर पर उनकी जो छवि बनी हुई है, वह थोड़ी कमजोर हो जाती.

पंजाब से भी अनुकूल नतीजे

नीतीश कुमार के अनुकूल नतीजे पंजाब में भी आए. कहां तो ये अटकलें थीं कि पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है. लेकिन नतीजे कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के पक्ष में आए. अगर पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार बनाने में कामयाब होती तो इसका पूरा श्रेय पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दिया जाता. यह कहा जाता कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में मोदी की आंधी के बावजूद पंजाब में केजरीवाल ने उन्हें निष्प्रभावी बना दिया. ऐसे में 2019 में विपक्ष की अगुवाई करने के लिहाज से वे भी एक प्रबल दावेदार हो जाते. यह स्थिति नीतीश के लिए उतनी अनुकूल नहीं होती जितनी आज है.

नीतीश कुमार के बारे में यह बात भी आ रही है कि एक ऐसे दौर में जब ज्यादातर विपक्षी दल नरेंद्र मोदी की राजनीति को न तो समझ पा रहे हैं और न उसका मुकाबला ठीक से कर पा रहे हैं, नीतीश यह काम बखूबी कर रहे हैं. जब नोटबंदी के मसले पर पूरा विपक्ष नरेंद्र मोदी पर हमलावर रुख अपनाए हुआ था, तब नीतीश कुमार नोटबंदी के समर्थन में खड़े हो गए. नीतीश ने इस बात की भी परवाह नहीं कि उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता शरद यादव दिल्ली में नोटबंदी का विरोध कर रहे नेताओं के साथ खड़े हैं.

विधानसभा चुनावों के नतीजे यह साबित कर रहे हैं कि नोटबंदी को मतदाताओं ने कोई नकारात्मक मुद्दा नहीं माना. बल्कि अब तो यह भी लग रहा है कि नोटबंदी को एक सकारात्मक कदम मानते हुए लोगों ने इस वजह से भी भाजपा के पक्ष में मतदान किया. अब राजनीतिक जानकार यह कह रहे हैं कि नीतीश को छोड़कर विपक्ष का कोई भी नेता इस बात को नहीं समझ पाया था. विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद भी नीतीश ने कहा कि विपक्ष द्वारा नोटबंदी का बहुत ज्यादा विरोध करने से भी मतदाता भाजपा के पक्ष में गोलबंद हुए.

यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार ने 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी के हाथों मात खाने के बाद उनकी राजनीति को ठीक ढंग से समझ लिया. उन्हें लग गया कि मोदी का मुकाबला नए ढंग से करना होगा. इसलिए उन्होंने एक असंभव गठबंधन की जमीन तैयार की. 2014 तक बिहार की राजनीति में यह बहुत दूर की कौड़ी लग रही थी कि नीतीश कुमार और लालू यादव एक साथ आ सकते हैं. क्योंकि नीतीश की तब तक की पूरी सियासत ही लालू विरोध के बुनियाद पर टिकी थी. लेकिन नीतीश ने मोदी की चुनौती देखते हुए इस असंभव कार्य को संभव किया और लोकसभा चुनावों में बुरी हार के डेढ़ साल के अंदर हुए विधानसभा चुनावों में मोदी की अगुवाई वाली भाजपा को कुछ उसी अंदाज में हराया जिस अंदाज में वे हारे थे.

राह आसान

उस वक्त भी यह कहा जा रहा था कि 2019 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार विपक्ष की अगुवाई करते दिख सकते हैं. हालांकि, हाल तक इस भूमिका पर अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव की भी दावेदारी थी. लेकिन अब जिस तरह के चुनावी नतीजे आए हैं, उसमें ये दोनों इस दौड़ से बाहर हो गए दिख रहे हैं. अखिलेश को अभी अपनी पार्टी और परिवार में ही कई तरह की चुनौतियों से निपटना है. वहीं अरविंद केजरीवाल को भाजपा दिल्ली नगर निगम के चुनावों में घेरने और दिल्ली में ही राजनीतिक तौर पर निपटाने की कोशिश में जोर-शोर से जुट गई है. उधर, कांग्रेस में भी अंदर से नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में दूसरे दल 2019 के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व को मानेंगे, यह अभी की स्थिति में बहुत मुश्किल लगता है.

भले ही तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रही जयललिता की नरेंद्र मोदी से नजदीकी रही हो, फिर भी विपक्ष उनकी ओर उम्मीद की निगाह से देखता था. लेकिन अब वे भी नहीं हैं. नवीन पटनायक की स्थिति ओडिशा के अंदर ही कमजोर होती जा रही है. वहीं ममता बनर्जी पर कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल कोई दांव खेलें, यह मुश्किल लगता है.

कुल मिलाकर अभी की जो राजनीतिक स्थिति है, उसमें विपक्ष के पास 2019 में मोदी से मुकाबला करने की स्थिति में खुद को बनाए रखने के लिए नीतीश कुमार की अगुवाई में एकजुट होने के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिखता.