निर्देशक : विक्रमादित्य मोटवाणी

लेखक : अमित जोशी, हार्दिक मेहता

कलाकार : राजकुमार राव, गीतांजलि थापा

रेटिंग : 3.5/5

हॉलीवुड में ‘कास्ट अवे’ से लेकर ‘127 आवर्स’ और ‘द मार्शियन’ तक ढेरों लाजवाब सर्वाइवल ड्रामा/थ्रिलर फिल्में बनी हैं. विषम परिस्थितियों में अकेले फंसे नायक की इन गाथाओं को देखते वक्त आपकी सांसें हमेशा ही उखड़ती हैं और रोंगटे दोगुनी रफ्तार से खड़े हो जाते हैं. लेकिन 2010 में आई अविश्वसनीय कहानी कहने वाली ‘बरीड’ जैसी अलहदा फिल्में बन भी सकती हैं, आज भी यकीन करना मुश्किल है.

बरीड की शुरुआत में जमीन के अंदर दबे एक ताबूत में नायक होश संभालता है और अंत तक वहीं लेटा रहता है. ताबूत में उसके पास पेन, पेंसिल, लाइटर, टॉर्च और मोबाइल फोन जैसी कुछ चीजें होती हैं और तकरीबन डेढ़ घंटे तक नायक इन्हीं चीजों की सहायता से ताबूत से बाहर आने की कोशिश करता है. फिल्म इस पूरी अवधि में नायक के पास से अपना कैमरा नहीं हटाती और आप भी अपनी नजरें नहीं हटा पाते - यह फिल्म इतनी ज्यादा रोचक और मनोरंजक बनाई गई है.

विक्रमादित्य मोटवाणी की ‘ट्रैप्ड’ बंद जगहों पर रचे जाने वाले सर्वाइवल ड्रामा/थ्रिलर जॉनर के इन्हीं पदचिन्हों पर चलती है और अपनी कहानी को मुंबई की एक सुनसान गगनचुंबी इमारत के पैंतीसवे माले पर ले जाती है. नायक शौर्य (राजकुमार राव) अपनी प्रेमिका नूरी (गीतांजलि थापा, छोटे-से प्रभावी रोल में) से शादी का वादा कर चुका होता है और शादी के बाद की बसाहट हासिल करने की जल्दी में ब्रोकर के झांसे में आकर एक सुनसान पड़ी इमारत के खाली पड़े फ्लैट को किराए पर ले लेता है. कम दामों पर उसे बिजली-पानी का वादा भी मिलता है, लेकिन जब वो इस फ्लैट में कैद हो जाता है तो वहां न बिजली आती है और न ही भरपूर पानी. साथ में उसके पास खाने के लिए कुछ नहीं बचता और फोन की बैटरी भी उसके कांक्रीट के बने पिंजरे के अंदर कैद होते ही दम तोड़ देती है.

‘ट्रैप्ड’ की खासतौर पर बयां करने लायक खूबी यह है कि वो हॉलीवुड के सर्वाइवल जॉनर की ऊपर वर्णित फिल्मों की याद तो दिलाती है, लेकिन ऐसा सिर्फ सामान्य ज्ञान बघारने के ही काम आता है. इस फिल्म की पटकथा खालिस ओरिजनल है और निर्देशन भी मोटवाणी की पिछली दो फिल्मों की तरह बेहद दुरुस्त. यकीनन बेहद प्रभावी भी, और इसीलिए ‘ट्रैप्ड’ एक फिल्म कम, वास्तविकता ज्यादा नजर आती है.

फिल्म में राजकुमार राव का पात्र कैद से बाहर आने के लिए अनेक तरह के जतन करता है और उसके यही जतन, यही तरीके न सिर्फ सबसे ज्यादा मारक होते हैं, फिल्म को यथार्थवादी पहनावा देने के कारक भी होते हैं. इनमें से एक भी तरीके का यहां तफ्सील में जिक्र करना फिल्म देखने के लिए उत्सुक बैठे दर्शकों की नजर में कुफ्र करना होगा. इसी वजह से सिर्फ इतना जानिए कि अंडरवियर की इलास्टिक से लेकर गीजर के पानी तक, चूहे-कॉक्रोच-कबूतर से लेकर शेविंग क्रीम और गत्ते तक, फिल्म हर उस संसाधन का उपयोग करती है जो आप और हम करते, अगर इस तरह की कैद में होते.

बिना मध्यांतर वाली ‘ट्रैप्ड’ की सबसे बड़ी खासियत यही है, कि इसका हीरोइज्म इतना जमीनी है कि यह रंगीन फिल्म कम धूसर वास्तविकता ज्यादा दिखाता है. वह वास्तविकता जो हमारे साथ कभी भी घट सकती है और घटने के बाद जो होगा उसी के आसपास की कहानी यह फिल्म कहती है. इसी खासियत के दम पर ‘ट्रैप्ड’ वह दुर्लभ सिनेमा भी बनती है जिसकी कहानी में फिल्म के नायक की जगह दर्शक खुद अपने आपको ट्रैप्ड पाता है. सिनेमा और वास्तविकता के बीच का अंतर जिस तरह इस फिल्म में मिटता है, कभी-कभी ही मिट पाता है.

2010 में आई मोटवाणी की पहली फिल्म ‘उड़ान’ बनावट में अपने दौर की बाकी फिल्मों से बेहद अलग थी. तीन साल बाद आई ‘लुटेरा’ का क्राफ्ट ‘उड़ान’ से एकदम अलग था. ‘ट्रैप्ड’ दोनों ही फिल्मों से जुदा है और खालीपन को उभारने वाले आलोकानंदा दासगुप्ता के संगीत की वजह से (बंगाली निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता की बेटी) और नायक की हताशा पर हमेशा जूम-इन करने वाले सिद्धार्थ दीवान के कैमरे की वजह से मोटवाणी के पिछले सिनेमा की झलक इसमें बिलकुल नहीं मिलती. लाड़-दुलार से रचे गए कलात्मक फ्रेम्स नहीं मिलते (सिवाय सपनों वाले दृश्यों के), और मुख्य किरदारों के बीच के रिश्तों की गर्माहट व तकरीबन फुसफुसाकर बात करने वाले किरदार नहीं मिलते. लेकिन इन सब नायाब चीजों की जरूरत पड़े ऐसी शिकायतें भी ‘ट्रैप्ड’ में नहीं मिलतीं, क्योंकि चुस्त पटकथा पर निर्देशकीय अनुशासन के अलावा फिल्म के हिस्से में राजकुमार राव की अदायगी आती है, जो इस फिल्म को वैसा वाला निखार देती है जैसे खाली पड़ी उपजाऊ जमीन को सुर्ख लाल गुलाब के लहलहाते खेत देते हैं.

‘ट्रैप्ड’ में गीतांजलि थापा और चंद पलों के लिए नजर आने वाले दो-तीन कलाकारों के अलावा सिर्फ एक एक्टर और है, और अगर दर्जन भर भी और होते, तब भी राजकुमार राव की प्रतिभा के तेज को छिपा नहीं पाते! राजकुमार राव ‘ट्रैप्ड’ की आत्मा हैं, शरीर हैं और जिस समर्पण के साथ वे इस फिल्म को उसका किरदार शौर्य देते हैं, वह अतुलनीय है. निराशा हो चाहे हताशा, क्रोध हो चाहे पानी के लिए तड़प जाना, मुख्य दरवाजे पर सड़सी मारते रहना हो या फिर मदद पाने की अपनी कोशिश को सफल होते देखते वक्त बच्चों सा मचल जाना, इस अंडररेटिड एक्टर ने ‘ट्रैप्ड’ में अभिनय नहीं किया है, शौर्य नामक आदमी का जीवन जिया है.

और जब कोई ऐसा अभिनय कर पाता है, जो जीवन जीने के समान लगता है, तो उस अभिनेता से बेहतर कुछ नहीं होता.