खबरें हैं कि पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान का दर्जा बदलने की तैयारी में है. जम्मू-कश्मीर का यह अभिन्न हिस्सा 1947 से पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है. बताया जा रहा है कि इसे अब राज्य का पांचवां राज्य घोषित करने की तैयारी है. यह काम इस तरह से किया जा रहा है कि भारत इसका विरोध न कर सके. लेकिन यह एकतरफा फैसला भारत-पाकिस्तान संंबंधों को सामान्य करने की दिशा में उल्टा कदम चलने जैसा होगा. इससे दोनों देशों के रिश्तों में एक और दरार आनी तय है.

जैसा कि एक भारतीय प्रवक्ता ने गुरुवार को कहा, इस्लामाबाद की यह योजना 1972 के शिमला समझौते और 1999 के लाहौर घोषणापत्र का उल्लंघन है. इनमें भारत और पाकिस्तान ने अपने विवाद, जिनमें कश्मीर से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं, आपसी बातचीत से हल करने की सहमति जताई थी.

गिलगित-बाल्टिस्तान को जम्मू और कश्मीर के राजनीतिक भूगोल से अलग करने का दांव नया नहीं है. 1970 में पाकिस्तान ने इसे प्रशासनिक रूप से पाक अधिकृत कश्मीर से अलग कर दिया था. राष्ट्रपति जिया उल हक के राज में यहां की जनसांख्यिकी को बदलने का भी काम हुआ. यहां शियाओं की आबादी ज्यादा थी सो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों से सुन्नी समुदाय के लोगों को लाकर यहां बसाया गया.

इसके बाद गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का नया राज्य बनाने के लिए एक कृत्रिम मांग पैदा की गई ताकि इसकी जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से वाली पहचान खत्म हो जाए. यही कवायद अब पूरी होने की तरफ बढ़ती लग रही है जैसा कि इन दिनों पाकिस्तान के विदेश मंत्री के समकक्ष सरताज अजीज की अगुवाई वाली कमेटी की एक लीक हुई रिपोर्ट बता रही है.

चर्चा यह भी है कि यह कदम चीन के दबाव में उठाया जा रहा है ताकि गिलगित-बाल्टिस्तान के दर्जे को लेकर मौजूद अनिश्चितता खत्म हो जाए क्योंकि पाकिस्तान में चीनी परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा यहां और इसके आसपास के इलाकों में बन रहा है. अगर ऐसा है तो भारत को राजनयिक स्तर पर इस कवायद का मुकाबला करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए. (स्रोत )