इसी किताब से एक रचना :

‘पत्तियों पर खू़न की बूंदें नज़र आने लगीं / गुलशनों में ख़ुशबुएं फूलों से घबराने लगीं

जल रही है धूप, बैठी छांव में प्यासी हवा / धुन्ध की ऊंची सलीबें मर्सिया गाने लगीं

ख़ुद को हमने यूं सरे बाज़ार नंगा कर लिया / अब हमें तारीख़ की गुस्ताखियां भाने लगीं

बादलों ने ख़ौफ़ से अपनी निगाहें मूंद लीं / बिजलियां जब बस्तियों पर क़हर बरपाने लगीं

सच किसी ज़ख़्मी परिन्दे-सा ज़मीं पर है पड़ा / आसमां तक झूठ की परछाइयां जाने लगीं

रेत के आग़ोश में गुम हो गये जंगल सभी / झाड़ियों से जुगनुओं की सिसकियां आने लगीं

इक ज़रा लहरों की आंखों में शराफ़त क्या दिखी / कश्तियां सागर की छाती चीर कर जाने लगीं’


गज़ल संग्रह : ख़्वाबों की हंसी

शायर : हरिओम

प्रकाशन : वाणी

कीमत : 195 रुपये


शायरी में चंद अलफाजों के जरिए असरदार तरीके से बात कहने की ताकत होती है. हालांकि शेर कह सकना और शायरी में असर पैदा करना, ये दोनों निहायत ही अलहदा बातें हैं. कई बार होता है कि बात बहुत पते की होती है, पर वह शेरो-शायरी में उतर नहीं पाती. दूसरी तरफ बहुत बार यूं भी होता है कि शेर कहने का शऊर तो होता है, पर बात दिल तक नहीं पहुंचती.

‘ख़्वाबों की हंसी’ हरिओम का दूसरा गजल संग्रह है. हरिओम पेशे से प्रशासनिक अधिकारी हैं, लेकिन दिल से शायर. शेर कहने का अंदाज उन्हें बखूबी आता है. अनुभवों की गहराई भी उनके शेरों में है, लेकिन कुछ है जो आपको बांधता नहीं. इस किताब में ज्यादातर शेर प्रेम के इर्द-गिर्द ही कहे गए हैं, लेकिन प्रेम की तीव्रता और गहराई को पाठक पूरी किताब पढ़ जाने पर भी शायद ही महसूस कर सकें.

इस गजल संग्रह के अंत में कुछ नज्में भी हैं. किताब की सिर्फ अंतिम नज्म में वह बात है जो प्रेम की तीव्र, सहज और मासूम-सी मिठास से आपको तर कर देती है. ‘तुम वक़्त मांग लेना’ नाम की इस नज्म में बड़ी ही सादगी से लेखक ने दोस्तों के बीच के प्रेम को अभिव्यक्त करते हुए लिखा है - ‘वो घड़ी जो तुमने मुझे दी थी / आज मेरे पास नहीं है / लेकिन वो वक़्त / जो दिया था तुमने मुझे / औरों से बचाकर / ख़ुद से छुपाकर / वो आज भी मेरे पास है / मेरी सांसों में घुला / मेरी यादों में बसा / मेरे जज़्बातों का सरमाया बन / याद रखना / जब तुम्हारे पास ख़ुद के लिए / वक़्त न रह जाए / खु़दा न खास्ता / तुम मुझसे मांग लेना बेतक़ल्लुफ़ / तुम्हें दोस्ती का वास्ता.’

यूं तो हरिओम एक जगह कहते हैं, ‘और भी आ जाएगी अल्फा़ज़ में रंगत तेरे / तू कभी बच्चों सरीखी सादगी की बात कर’, लेकिन उनकी सादगी अपने ही अल्फाजों में वह रंगत पैदा नहीं कर पाती. लेखक के प्रेम के ऊपर लिखे शेरों में ज्यादातर एक किस्म की रुसवाई है, गहरी उदासी है. कुछ उदाहरण - ‘तुम्हारे नाम से वाबस्ता मेरा नाम रहने दो / ग़रज़ इतनी ज़माने में मुझे बदनाम रहने दो....ताल्लुक़ तोड़ना चाहो तो तोड़ो पर गुज़ारिश है / मेरे सर पर गुनाह-ए-इश्क़ का इल्ज़ाम रहने दो...तुम्हारे नाम कर रक्खी है सारी ज़िन्दगी मैंने / मेरे हिस्से में अपने नाम की ये शाम रहने दो... ये रंज-ओ-दर्द का आलम कभी बदला भी नहीं / और तू साथ न था, माजरा ऐसा भी नहीं...वो उम्र-सा दबे पांवों गुज़र गया जैसे / मैं धुन में अपनी था मैंने उसे देखा भी नहीं.’

प्रेम से इतर राजनीति के घिनौने खेल, सांप्रदायिकता, बिखरे हुए वजूद, जिंदगी के फलसफे और अदालती न्याय से पैदा हुई निराशा पर भी लेखक ने कई अच्छे शेर कहे हैं. लेखक खुद प्रशासनिक अधिकारी हैं इस कारण, सार्वजनिक जीवन में जनता की तकलीफों को करीब से देखने का मौका उन्हें अक्सर ही मिलता होगा. आम जनता की हालत और ताकत से जुड़े कई शेर भी इस किताब में हैं. जैसे - ‘बेचारी देश की मजबूर जनता / हुकूमत की लुगाई हो रही है, सियासत गोद में सेठों के बैठी / मज़े में मुंह-दिखाई हो रही है’. कुछ शेरों में आवाम के पक्ष में एक आक्रोश भी फूटता हुआ सा दिखता है, ‘ये राजपाट ये रुतबे ये हवेली ये महल / इन्हें अवाम के क़दमों तले कुचलने दो.’

सियासत के पीछे छिपकर चल रहे खूनी खेल पर भी हरिओम की नजर पड़ी है. वे लिखते हैं, ‘सियासत के लिए झगड़े हैं, बलवा, क़त्लो-ग़ारत है / सरे-बाज़ार अब तहज़ीब को नाधे हुए हैं हम. ’ मुश्किल के दौर में भी कहीं हौंसला, तो कहीं भरोसे की डोर थामे हुए लोगों को भी लेखक ने अपने शेरों में दर्ज किया है. ‘अजब सर्कस है दुनिया ज़िन्दगी साधे हुए हैं हम / रिवाज़ों की हैं बन्दूकें कई, कांधे हुए हैं हम... मेरे पीछे उदासी है, मेरे आगे है तन्हाई / है मुश्किल वक़्त लेकिन हौसला बांधे हुए हैं हम...कोई रहमत कभी आकर बदल देगी जहां अपना / इसी उम्मीद पर पत्थर भी आराधे हुए हैं हम.’

आज के दौर में इंसान और इंसानियत की क्या कीमत रह गई है, इससे जुड़ी एक अच्छी गजल इस किताब में है, ‘अजनबीयत आज की पहचान है / आदमी इस दौर में सामान है, इल्मों-फ़न हो याके फिर तहज़ीब हो / आजकल हर चीज़ की दूकान है,....जो भी चीजें थीं सभी महंगी हुईं / और जो सस्ता हुआ वो इंसान है; हम हैं, तुम हो और दौरे-हयात / और अपने बीच रेगिस्तान है, हैं यहां हिन्दू-मुसल्मां-सिक्ख-ईसाई / जो नदारद है वो हिन्दुस्तान है.’

किताब के चंद शेर काफी अच्छे हैं, और कुछ इस तरह से दिल को छूते हैं कि उन पर अलग से ध्यान जाता है, जैसे - ‘ये तो अमन की तेज़ फुहारों का दौर है / जलते हुए सवाल उठाएंगे किस तरह...तुमने उन्हें नग़्मे दिये, जज़्बे दिये मगर / गूंगे ग़दर के गीत सुनायेंगे किस तरह...शीशे के साथ अक्स भी तकसीम हो गया / बिखरा हुआ वजूद बनायेंगे किस तरह... मेरे उसके तार्रुफ में फ़क़त / मेरी-उसकी ज़ात थी और कुछ न था.’

कुल मिलाकर हरिओम का यह गजल संग्रह बहुत सादगी से अपनी बात कहता है. लेकिन ज्यादातर गजलें असर पैदा नहीं कर पातीं. उर्दू के बहुत भारी-भरकम शब्द हालांकि गजलों और नज्मों में नहीं हैं, जो हैं उनके हिन्दी में अर्थ दिये जाने से पाठकों को कुछ सुविधा जरूर होती.