उत्तराखंड का मुख्यमंत्री चुनने की जो चुनौती भाजपा हाईकमान के सामने थी, उसे एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता कुछ यूं बयां करते हैं, ‘यहां चुनौती दूल्हे के नाप की शेरवानी चुनने की नहीं, बल्कि शेरवानी के नाप का दूल्हा चुनने की थी.’ अपनी बात स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि प्रदेश में जो समीकरण बन पड़े थे उनमें त्रिवेंद्र सिंह रावत सबसे फिट बैठते थे.

चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कई लोगों को शामिल माना जा रहा था. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भगत सिंह कोश्यारी, भुवन चंद्र खंडूरी, अजय भट्ट, प्रकाश पंत, सतपाल महाराज, अनिल बलूनी और विजय बहुगुणा इनमें मुख्य थे. लेकिन चुनावों के बाद जब मुख्यमंत्री पद की असल दौड़ शुरू हुई और पार्टी हाईकमान ने फैसला लिया कि मुख्यमंत्री विधायकों में से ही कोई चुना जाएगा, तो इनमें सी कई नाम इस दौड़ से बाहर हो गए.

तब यह लड़ाई सतपाल महाराज, प्रकाश पंत और त्रिवेंद्र सिंह रावत के बीच सिमट गई. इन तीनों में सतपाल महाराज की दावेदारी सबसे कमज़ोर पड़ी क्योंकि वे 2014 में ही कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे. ऊपर से उनका मुकाबला ऐसे लोगों से था जिन्होंने अपने जीवन का लंबा समय संगठन को दिया है. भाजपा कार्यकर्ता बताते हैं कि सतपाल महाराज को अगर मुख्यमंत्री बनाया जाता तो प्रदेश में ही नहीं बल्कि देशभर में संगठन से जुड़े लोगों में एक नकारात्मक संदेश जाता. इसलिए मुख्यमंत्री की दौड़ के आखिरी चरण तक सिर्फ प्रकाश पंत और त्रिवेंद्र सिंह रावत ही बचे थे.

दो नामों में से एक चुनने की जद्दोजहद

त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रकाश पंत के राजनीतिक जीवन में कई समानताएं हैं. दोनों 56 वर्षीय नेता पहली बार 2002 में विधायक चुने गए थे. इसके बाद दोनों ही 2007 में भी जीते और दोनों ही तब कैबिनेट मंत्री भी बने. 2012 में हार का स्वाद भी दोनों नेताओं ने साथ में ही चखा था और पार्टी को लेकर दोनों ही नेताओं का समर्पण संदेह से परे माना जाता है. लेकिन रावत की तुलना में प्रकाश पंत की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही थी. इसके कुछ ठोस कारण भी थे. पहला कारण था उनका अनुभव. उत्तराखंड राज्य गठन से पहले ही प्रकाश पंत उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बन चुके थे. वे उत्तराखंड राज्य के पहले विधानसभा अध्यक्ष भी रहे और उनके नाम देश के सबसे कम उम्र के विधानसभा अध्यक्ष होने का रिकॉर्ड भी दर्ज है.

प्रकाश पंत की दावेदारी का दूसरा मजबूत कारण था उनकी साफ़ छवि और उनका जनाधार. त्रिवेंद्र सिंह रावत की भले ही संगठन में मजबूत पकड़ हो लेकिन जनता के बीच प्रकाश पंत का नाम उनसे ज्यादा लोकप्रिय रहा है. साथ ही पिछली भाजपा सरकार में कृषि मंत्री रहते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत पर बीज घोटाले के आरोप लगे थे जबकि प्रकाश पंत पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं. लेकिन इसके बावजूद भी त्रिवेंद्र रावत अगर इस दौड़ में आगे निकल गए तो उसके भी कुछ ठोस कारण हैं.

पहला और सबसे मजबूत कारण है भाजपा के मातृसंगठन कहे जाने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से उनका लंबा जुड़ाव. पौड़ी जिले के खैरासैंण गांव में जन्मे त्रिवेंद्र सिंह रावत 19 साल की उम्र में ही आरएसएस से जुड़ गए थे. संगठन के प्रति उनका समर्पण ही था कि बेहद कम समय में ही वे पहले तहसील और फिर महानगर प्रचारक बन गए. पत्रकारिता की पढ़ाई करने वाले रावत अपने छात्र जीवन में भी सक्रिय रूप से संगठन से जुड़े रहे. 1993 में उन्हें संघ की ओर से भाजपा में संगठन मंत्री बना दिया गया.

पृथक राज्य की मांग के लिए चले आंदोलन में भी त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सक्रियता से भाग लिया और राज्य गठन के बाद जब 2002 में पहले विधानसभा चुनाव हुए तो वे डोईवाला विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच गए. 2007 में वे पहले से भी ज्यादा मतों से इसी सीट से चुनाव जीते और भाजपा सरकार में कृषि मंत्री बने. इसी दौरान उन पर ढैंचा बीज घोटाले में शामिल होने के भी आरोप लगे. कृषि विभाग ने बाज़ार भाव से दोगुने दामों पर बीज खरीदे थे और सूचना के अधिकार में यह भी सामने आया था कि जिन ट्रकों से इन बीजों का प्रदेश में आना दर्शाया गया है, वे ट्रक कभी प्रदेश में दाखिल ही नहीं हुए. यह मामला आज भी उत्तराखंड उच्च न्यायालय में लंबित है. वैसे पिछली कांग्रेस सरकार ने भी इस मामले की जांच करवाई थी लेकिन इस जांच में रावत के खिलाफ उसी तरह कोई आरोप साबित नहीं हुए जैसे अधिकतर सरकारी जांचों में पूर्ववर्ती मंत्रियों के खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं होते.

हार के बावजूद कद बढ़ता गया

2012 में त्रिवेंद्र रावत चुनाव हार गए थे, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनका उत्सर्ग यहीं से शुरू हुआ. संगठन में मजबूत पैठ होने के चलते 2013 में उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी मिली. इसके बाद जब 2014 में लोकसभा चुनाव हुए और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया तो त्रिवेंद्र रावत यहां के सह-प्रभारी बने. भाजपा से जुड़े लोग बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में रावत ने प्रचारक रहते हुए जमीनी स्तर पर काम किया था. इसका फायदा उन्हें 2014 में मिली जिम्मेदारी निभाने में मिला. इस चुनाव में भाजपा ने प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीत लीं. यहां से रावत का कद अमित शाह की नज़रों में और भी बड़ा हो गया.

इसी साल त्रिवेंद्र रावत को झारखंड का प्रदेश प्रभारी भी बनाया गया. बताते हैं कि वहां चुनावों में उन्होंने टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव प्रचार तक में अहम भूमिका निभाई. चुनाव नतीजे आए तो भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल गया और त्रिवेंद्र रावत को उनकी कार्यक्षमता का प्रमाणपत्र. इसके बाद तो केंद्रीय नेतृत्व में उनकी छवि और उनकी पकड़ पहले से भी मजबूत हो गई. आज जब केंद्रीय स्तर पर भाजपा इतनी मजबूत है कि हर राज्य में फैसले उसके इशारों से ही होते हैं, तब यही पकड़ त्रिवेंद्र रावत की सबसे बड़ी ताकत साबित हो रही है. इसी का नतीजा है कि उत्तराखंड भाजपा में चार पूर्व मुख्यमंत्रियों के सक्रिय राजनीति में होने के बाद भी नए मुख्यमंत्री के तौर पर त्रिवेंद्र रावत शपथ ले रहे हैं.

इन चुनावों के बाद जो समीकरण प्रदेश में बने, उनका भी रावत को मुख्यमंत्री बनाने में अहम योगदान है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट मुख्यमंत्री पद के मजबूत दावेदार माने जा रहे थे. लेकिन वे इस प्रचंड मोदी लहर के बावजूद अपनी ही सीट पर चुनाव हार गए. इससे वे स्वयं तो मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर हुए ही, उन्होंने त्रिवेंद्र रावत के प्रबल प्रतिद्वंदी प्रकाश पंत को भी इस दौड़ में कमज़ोर कर दिया. उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रवाद ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ के नाम पर होता है और जातिवाद ‘क्षत्रिय बनाम ब्राह्मण’ के नाम पर. अजय भट्ट और प्रकाश पंत दोनों ही कुमाऊं से हैं और दोनों ही ब्राह्मण हैं. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री जैसे दोनों सबसे महत्वपूर्ण पद इन दोनों ‘एक ही खेमे’ के लोगों को देना पार्टी के लिए मुश्किल था. इसलिए इस समीकरण को साधने के लिए जरूरी था कि मुख्यमंत्री गढ़वाल से हो और क्षत्रिय हो. त्रिवेंद्र सिंह रावत इस खांचे में सबसे फिट बैठते थे लिहाजा वे ही मुख्यमंत्री की शेरवानी के नाप के सबसे मुफीद दूल्हे बन गए.