निर्वाचन आयोग ने भले ही चुनाव खर्च की सीमा तय कर रखी हो, लेकिन चुनावों के दौरान पैसा बेतहाशा ही खर्च किया जाता है. सीएमएस नाम की एक सर्वे एजेंसी के ताजा अध्ययन के हवाले से हिंदुस्तान टाइम्स ने खबर दी है कि उत्तर प्रदेश में ही बड़े दलों ने हाल में ही हुए विधानसभा चुनाव के दौरान करीब 5,500 करोड़ रुपए खर्च कर डाले हैं.

अध्ययन में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में जो रकम खर्च हुई है उसमें से करीब 1,000 करोड़ रुपए तो मतदाताअों के बीच नकद और शराब के तौर पर बांट दिए गए. प्रदेश के हर वोट पर औसतन करीब 750 रुपए खर्च किए गए और इस लिहाज से यह आंकड़ा देश में सबसे ज्यादा है. हालांकि जिन चुनाव क्षेत्रों में मुकाबला कड़ा था, वहां एक-एक मतदाता पर दो-दो हजार रुपए तक खर्च किए गए. इसके अलावा बाकी पैसा प्रचार, विज्ञापन आदि पर खर्च किया गया.

इस सर्वे के दौरान जिन लोगों से बातचीत की गई उनमें से 55 फीसदी लोगों ने माना कि वे ऐसे किसी न किसी मतदाता को जानते हैं जिसने पैसे लेकर किसी उम्मीदवार को वोट दिया है. दो तिहाई लोगों ने माना कि इस बार उत्तर प्रदेश में जितना पैसा खर्च हुआ है, उतना इससे पहले कभी नहीं किया गया. अध्ययन में यह भी सामने आया कि नोटबंदी के बावजूद उम्मीदवारों का चुनाव खर्च बढ़ा है.

खबर के मुताबिक, चुनाव प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश में करीब 200 करोड़ रुपए की अवैध रकम जब्त की गई. लेकिन जिम्मेदार अधिकारी बताते हैं कि इससे पांच गुना से भी ज्यादा पैसा पकड़ में ही नहीं आया और खप गया. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में दिए गए विज्ञापनों पर ही करीब 600-900 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है. यह सब इसके बावजूद है कि उत्तर प्रदेश में निर्वाचन आयोग ने उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की सीमा प्रति उम्मीदवार 25 लाख रुपए तय कर रखी है.