उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद मुख्यमंत्री के दावेदारों में योगी आदित्यनाथ का नाम तो लिया जा रहा था लेकिन यह पार्टी नेताओं के स्तर पर कम और कार्यकर्ताओं के स्तर पर अधिक था. चुनावों से पहले भी जब मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की घोषणा होनी थी तब भी भाजपा कार्यकर्ताओं के स्तर पर सबसे अधिक मांग योगी आदित्यनाथ के नाम को लेकर ही उठी थी. लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने कभी यह संकेत नहीं दिया कि योगी आदित्यनाथ को भी उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है. इसके बावजूद अंतिम बाजी उनके ही हाथ लगी.

योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही यह साफ हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा हिंदुत्व के मसले पर विशेष जोर देने वाली है. कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की पहचान रखने वाले योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की बागडोर सौंपा जाना नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इसी रणनीति का एक हिस्सा लगता है. इसलिए भी लगता है कि योगी अब भाजपा के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गये हैं.

अगर कुछ लोगों को यह लगे कि वे अब भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद तीसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति बनने की राह पर हैं तो उनका ऐसा सोचना भी गलत नहीं होगा. भाजपा ने संगठन से बाहर जो सबसे महत्वपूर्ण पद दिये हैं उनमें से उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री का पद प्रधानमंत्री के पद के बाद सबसे बड़ा है. भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद योगी आदित्यनाथ के तीसरे सबसे ताकतवर व्यक्ति बनने की संभावनाएं इसलिए भी हैं कि कार्यकर्ताओं के स्तर पर वे खासे लोकप्रिय हैं. और यह लोकप्रियता सिर्फ पूर्वांचल तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश और बिहार में भी फैली हुई है. अब जब आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तो यह पहले से मजबूत ही होने वाली है.

अभी की भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद सबसे ताकतवर राजनाथ सिंह और अरुण जेटली को माना जाता है. लेकिन इन दोनों में से कोई नेता ऐसा नहीं है जिसका एक व्यापक जनाधार हो. जेटली कभी चुनावी राजनीति में कामयाब नहीं हुए हैं और राजनाथ सिंह बार-बार लोकसभा का चुनाव संसदीय क्षेत्र बदल-बदल कर लड़ते हैं.

इनके उलट योगी आदित्यनाथ को देखा जाए तो वे गोरखपुर सीट से 1998 से लगातार सांसद हैं. इस बीच कई ऐसे दौर भी आए जब पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ माहौल था. लेकिन तब भी योगी अपनी सीट निकालते रहे. गोरखपुर के लोग कहते हैं कि वहां योगी को किसी पार्टी की नहीं बल्कि पार्टी को योगी की जरूरत है. ये लोग यह दावा भी करते हैं कि योगी निर्दलीय भी चुनाव लड़ें तो भी जीत जाएंगे.

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद यह तय है कि योगी आदित्यनाथ का प्रभाव उत्तर प्रदेश के अलावा कम से कम हिंदी पट्टी के दूसरे राज्यों में तो बढ़ेगा ही. इसकी एक और वजह यह भी है कि उनकी छवि भाजपा के दूसरे मुख्यमंत्रियों से अलग है. कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की छवि भाजपा के किसी दूसरे मुख्यमंत्री की नहीं है. यदि नरेंद्र मोदी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए पूरे देश में छा गए तो इसकी बड़ी वजह उनकी हिंदुत्ववादी और विकास करने वाले नेता की छवि भी थी.

दूसरे राज्यों में उनका प्रभाव बढ़ने की संभावना इसलिए भी है क्योंकि वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एक राष्ट्रीय पार्टी के नेता के तौर पर हैं. उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे सूबे के ताकतवर से ताकतवर मुख्यमंत्री अब तक अपने सूबे से बाहर निष्प्रभावी इसलिए भी दिखे क्योंकि वे क्षेत्रीय दलों के नेता रहे हैं. जाहिर है उत्तर प्रदेश और उससे बाहर प्रभाव बढ़ने की हालत में पार्टी के अंदर भी उनका रसूख बढ़ने वाला है.

भाजपा से जुड़े सूत्र यह बता रहे हैं कि शुक्रवार की देर रात योगी आदित्यनाथ का नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर तय हुआ तो उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी भूमिका रही. इससे यह मतलब निकाला जा रहा है कि योगी संघ की पसंद हैं. संघ का चहेता होना भी उन्हें पार्टी के अंदर आने वाले दिनों में और अधिक प्रभावी बनाएगा.

उत्तर प्रदेश के बारे में कहा जाता है कि अगर यह अलग देश होता तो दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश होता. इतने बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ एक तरह से प्रधानमंत्री के बाद देश के किसी संवैधानिक पद पर बैठने वाले दूसरे सबसे ताकतवर राजनेता भी हो गए हैं. उत्तर प्रदेश सिर्फ आबादी के लिहाज से ही बड़ा नहीं है, बल्कि लोकसभा में 80 सांसद भी भेजता है. नरेंद्र मोदी जिस गुजरात से आते हैं, वहां के तीन गुने से भी ज्यादा. भारत के जो औसत राज्य हैं, उनके मुकाबले तीन गुना अधिक सांसद भेजने वाले राज्य का मुख्यमंत्री होना, योगी आदित्यनाथ को और भी ताकतवर बनाता है.

बजट से लेकर हर मामले में उत्तर प्रदेश का अपना एक अलग प्रभाव है. ऐसे में इतने बड़े सूबे के इतने प्रचंड बहुमत वाले मुख्यमंत्री का उसी अनुपात में ताकतवर होना लाजमी है.