राजस्थान के धौलपुर में इन दिनों प्रदेश के बड़े नेताओं का जमघट लगा है. नौ अप्रैल को यहां विधानसभा उपचुनाव होना है. कांग्रेस की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चुनाव जीतने के लिए जी-जान एक किए हुए हैं तो अपने करीब आधे दर्जन मंत्रियों समेत मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी यहां चुनावी प्रचार में कूद चुकी हैं. मुख्यमंत्री धौलपुर राजघराने की बहू भी हैं. इस लिहाज से यह उपचुनाव उनके लिए और बड़ा हो जाता है.

जानकारों के मुताबिक अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह आखिरी अहम चुनाव है जो प्रदेश में जनता के रुझान का संकेत देगा. बीते कुछ समय के दौरान हुए चुनावों में भाजपा ने उन राज्यों में भी सरकार बना ली जहां कभी उसका एक सीट जीतना भी दूर की कौड़ी था. ऐसे में राजस्थान जैसे पूर्ण बहुमत वाले प्रदेश में अगर उस धौलपुर की सीट नहीं निकली जहां की वसुंधरा राजे महारानी कही जाती हैं तो इसका असर दूर तक जा सकता है. वैसे भी 2013 में जबरदस्त मोदी लहर होने के बावजूद इस सीट के लिए हुए मुकाबले में भाजपा तीसरे पायदान पर रही थी.

राजस्थान में पिछले लंबे समय से हर पांच साल में सत्ता परिवर्तित होते देखी गयी है. इसके अलावा जानकार बताते हैं कि पिछले साढ़े तीन साल में जिस तरह का प्रदर्शन वसुंधरा सरकार का रहा है उसे देखते हुए राज्य में भाजपा को वापसी करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. वसुंधरा राजे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस समेत प्रदेश संगठन के बड़े नेताओं से अनबन की खबरें भी आती रहती हैं. ऐसे में संभावनाएं जताई जा रही हैं कि धौलपुर चुनाव के नतीजे के आधार पर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कुछ समय बाद राजस्थान में बड़ा बदलाव कर सकता है.

हालांकि इस तरह की खबरें इससे पहले भी कई बार सुनने को मिली हैं, लेकिन वसुंधरा राजे को हिलाने में केंद्र अब तक हर बार असफल ही रहा है. पर इस बार जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की इस असाधारण जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का कद पार्टी में कई गुना मजबूत और बड़ा हो गया है. ऐसे में वे अगले चुनावों को ध्यान में रखते हुए किसी बड़े निर्णय से पहले शायद ही हिचकिचाएं. धौलपुर का नतीजा उसमें अहम भूमिका निभा सकता है.

यदि भाजपा आलाकमान वसुंधरा राजे को पद से हटाने में कामयाब रहता है तो अगले मुख्यमंत्री के चयन में उसे काफी सावधानी बरतनी पड़ेगी. जानकारों के मुताबिक उसे यह काम ऐसे करना पड़ेगा कि राजे समर्थक वोट बैंक और विधायकों में असंतोष पैदा न हो और अगले चुनावों में नया चेहरा प्रदेश की जनता के बीच स्वीकार्य होने के साथ प्रभावी भी हो. ऐसे कई नामों को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है जो राजस्थान में भाजपा का अगला चेहरा बन सकते हैं.

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ऐसे ही दो बड़े नाम हैं जो प्रदेश के मुख्यमंत्री पद के लिए प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं. इस कड़ी में अब एक और नाम अचानक से आकर जुड़ गया है. हो सकता है यह इतना प्रचलन में न हो, लेकिन कई मान रहे हैं कि यह नाम राजस्थान में भाजपा के नए चेहरे के लिए कहीं ज्यादा अनुकूल दिखता है. कई जानकार मान रहे हैं कि सूचना प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ को भाजपा शीर्ष नेतृत्व राजस्थान में अपना नया चेहरा बनाकर प्रस्तुत कर सकता है.

राज्यवर्धन राठौड़ का नाम सामने आना महज इत्तेफाक नहीं है. कई कारण हैं जिनके चलते वे राजस्थान और केंद्र, दोनों के समीकरणों के लिहाज से मुख्यमंत्री पद के लिए फिट नजर आते हैं.

युवा चेहरा और सचिन पायलट का तोड़

पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट प्रदेश में बड़ा चेहरा बनकर सामने आए हैं. युवा होने के साथ-साथ अपनी कड़ी मेहनत और प्रबंधक के रूप में मजबूत छवि के चलते वे कुछ ही वर्षों में जनता के बीच खासे पसंद किए जाने लगे हैं. जानकारों का मानना है कि अगले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, पायलट को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाए या न बनाए लेकिन, वे बड़ी संख्या में वोटों को कांग्रेस की तरफ जरूर खींच ले जाएंगे. ऐसे में भाजपा को प्रदेश में जल्द ही कोई ऐसा चेहरा उतारना होगा जो पायलट की काट बन सके. जानकारों की मानें तो राज्यवर्धन सिंह राठौड़ पायलट को टक्कर देने के लिहाज से एक सटीक विकल्प नजर आते हैं. उनका कहना है कि युवा होने के साथ राठौड़ का ऊर्जावान व्यक्तित्व प्रदेश के युवाओं के साथ सामान्य वोटर को रिझाने में सफल रहेगा.

इसके अलावा पायलट और राठौड़ में संयोगवश कुछ समानताएं भी हैं जो चुनावी समीकरणों के लिहाज से ना सही लेकिन मनोवैज्ञानिक तौर पर राठौड़ को पायलट का विकल्प बनाकर पेश करती हैं. कुछ साल पहले पायलट प्रादेशिक सेना में बतौर लेफ्टिनेंट चुने जाने का सम्मान हासिल कर चुके हैं, तो राठौड़ भी राजनीति से पहले फौज में कर्नल के पद पर सेवारत थे. इसके अलावा राजस्थान कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष बनने से पहले पायलट पिछली केंद्र सरकार में राज्यमंत्री थे और राठौड़ भी वर्तमान सरकार में राज्यमंत्री के पद पर ही आसीन हैं.

राष्ट्रवादी छवि

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ फौज में कर्नल रहने के साथ ओलंपिक खेलों में पदक जीतकर देश का नाम पूरी दुनिया में रोशन कर चुके हैं. इस तरह उनकी जो राष्ट्रवादी छवि उभरकर सामने आयी है वह भाजपा और आरएसएस की विचारधारा से मेल खाने के साथ आमजन को भी खासा प्रभावित करती है. इसके अलावा बीते साल सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से सेना को लेकर खूब बात हो रही है. जानकारों का मानना है कि हालिया विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा ने सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए जो पाकिस्तान विरोधी माहौल तैयार किया था उसका उसे भरपूर फायदा मिला है. ऐसे में यदि भाजपा राठौड़ की सैनिक छवि को भुनाते हुए उन्हें सच्चे राष्ट्रभक्त की तरह जनता के सामने प्रस्तुत करती है तो उसे निश्चित तौर पर इसका लाभ मिलेगा.

जातिगत समीकरण

राज्यवर्धन सिंह राठौड़ राजपूत समाज से ताल्लुक रखते हैं. यदि राजस्थान के वर्तमान मंत्रिमंडल पर नजर डाली जाए तो उसमें राजपूत नेताओं ने बड़ा स्थान घेर रखा है. इसके अलावा वोटों की संख्या के हिसाब से भी राजपूत समुदाय महत्वपूर्ण है. ऐसे में जानकार कहते हैं कि राजघराने से ताल्लुक रखने वाली वसुंधरा राजे को हटाने से यदि राजपूत विधायक और पुराने रजवाड़ों से जुड़े लोग रुष्ट होते हैं तो राठौड़ उन्हें मनाने में सफल रहेंगे. राजस्थान की राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो इससे पहले भी वहां पर राजपूत मुख्यमंत्रियों को सहर्ष ही स्वीकार किया जाता रहा है. राजे के अलावा पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत की बात की जाए तो वे राजस्थान की राजनीति में बतौर मुख्यमंत्री लंबी पारी खेल चुके है. ऐसे में विधानसभा चुनावों के दौरान जो जातिगत समीकरण बन सकते हैं राठौड़ उनमें आसानी से फिट होते दिखते हैं.

विवादों से दूर

आमतौर पर जो चेहरे राजनीति में नए होते हैं उन्हें लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने में एक अरसा लग जाता है, साथ ही उन पर दांव खेलने से कोई भी पार्टी बचती है. लेकिन राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के साथ ऐसा नहीं है. वे राजनीति में भले नए हैं लेकिन ओलपिंक विजेता होने के कारण न सिर्फ राजस्थान बल्कि पूरा देश उनसे बखूबी परिचित हैं. ऐसे में कुछ साल पहले ही राजनीति में उतरना उनके लिए फायदे का सौदा है. माना जाता है कि जो नेता राजनीति में लंबे समय तक मौजूद रहते हैं देर-सवेर उन से जुड़ा कोई ना कोई विवाद सामने आ ही जाता है. लेकिन इस क्षेत्र में नए होने के कारण अभी तक राठौड़ का दामन किसी भी तरह के दाग से बचा हुआ है. ऐसे में विश्लेषक मानते हैं कि लगातार मैली होती जा रही राजनीति में एक साफ चेहरा लोगों को निश्चित तौर पर आकर्षित करने में सफल रहेगा. यह राठौड़ की साफ छवि ही थी जिसके चलते उन्हें पहली बार में ही सरकार में मंत्रालय मिला.इसके अलावा राठौड़ नपे-तुले बयानों लिए भी जाने जाते हैं. ऐसे में सूत्र मानते हैं कि राठौड़ की मर्यादित छवि विधानसभा चुनाव में लोगों को एक बार फिर भाजपा की तरफ खींचने में सहायक रहेगी.

केंद्र के प्रति निष्ठा

आमतौर पर किसी नेता को कोई बड़ा पद देने के पीछे उससे जुड़ी मजबूत राजनैतिक पृष्ठभूमि देखी जाती है. लेकिन जानकार मानते हैं कि ऐसी कोई पृष्ठभूमि न होना भी राठौड़ के लिए के लिए फायदेमंद साबित होगा. दरअसल अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आने वाले नेताओं की प्राथमिकताएं भी अलग-अलग होती हैं. इस तरह कई बार एक ही पार्टी में रहने के बावजूद उनकी निष्ठाएं अलग-अलग खेमों में बंट जाती हैं. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को इसके प्रत्यक्ष सबूत के तौर पर देखा जा सकता है. ऐसे में प्रदेश के किसी पुराने नेता की बजाय राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का चयन केंद्र के लिए फायदेमंद हो सकता है. विश्लेषकों की मानें तो कोई राजनैतिक पृष्ठभूमि न होने के कारण राठौ़ड़ के सिर्फ भाजपा शीर्ष नेतृत्व के प्रति समर्पित और निष्ठावान रहने की पूरी गारंटी ली जा सकती है.

इन सभी कारणों को देखते हुए राजस्थान की राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि यदि भाजपा शीर्ष नेतृत्व, युवा राठौड़ को राजस्थान में अपना चेहरा बनाती है तो वे पार्टी के लिए लंबी रेस का घोड़ा साबित हो सकते हैं.