हमारे दार्शनिक मित्र रामिन जहांबेगलू ने ‘प्रतिशोध से क्षमा तक’ विषय पर एक दिन भर लंबा परिसंवाद आयोजित किया, ओपी जिंदल विश्वविद्यालय में अपने शांति अध्ययन के महात्मा गांधी केंद्र के तत्वावधान में. परिसंवाद के चार उपविषय थे: साहित्य में प्रतिशोध और क्षमा; राजनीति, आख्यान और क्षमा, धार्मिक, प्रतिशोध और क्षमा की परम्पराएं और अन्तरिम न्याय तथा समाधान. इसमें आशीष नंदी, शिव विश्वनाथन, मालश्री लाल, रूपा वाजपेयी, ओमर सद्र, मुजीबुर रहमान, माज़ बिन बिलाल, शमा बानू हुसैन अब्बासी, गर्ड फ़र्डिनाण्ड किरछाफ़ आदि ने भाग लिया. महाभारत, सीता, चित्रांगदा, फ़कीर मोहन सेनापति, लिंकन, यहूदी ईश्वर, हिन्दू-मुसलिम संबंध, मृत्यु दंड आदि अनेक मसलों पर विस्तार से गंभीर चर्चा हुई.

मुझे समापन-वक्तव्य देने के लिए बुलाया गया था: विषय दिया गया था- ‘कवि का प्रतिशोध और कविता की क्षमाशीलता’. मैंने यह कहने की कोशिश की कि कविता मुख्यतः जीवन और संसार का उत्सव मनाती है. इसलिए उसमें जीवन और संसार के प्रति अपार कृतज्ञता होती है. वह कृतज्ञता और जीवन के प्रति अदम्य आकर्षण की विधा है. कविता याद करती है और वह भूलने के विरुद्ध एक असमाप्य संघर्ष होती है. हमारा समय व्यापक विस्मृति का है- वह विस्मृति इतिहास, संस्कृति, सामाजिकी, आर्थिकी आदि में बसासी जा रही है. कविता का स्मृति को बनाये रखना इसलिए एक राजनैतिक-सांस्कृतिक कार्रवाई हो जाता है. वह भूलती नहीं है पर क्षमा भी करती चलती है. उसका सत्व याद करने पर क्षमा करने से निकलता है.

प्रतिशोध में, जो भी लेता है उसमें एक तरह के फ़ैसले का भाव रहता है: उसमें दंड देने, शठ के प्रति शठता का व्यवहार करने की इच्छा काम करती है. कविता का मूल मंत्र है: फ़ैसला मत दो क्योंकि तुम पर भी फ़ैसला आयद होगा. ऐसे कई कवि हुए हैं जिन्होंने कई तानाशाहियों में अमानवीयता, जेल, क्रूरता, अत्याचार आदि झेले हैं और उनके बारे में बड़ी तकलीफ़ और मुखरता से लिखा भी है. पर किसी ने प्रतिशोध लेने या दिये जाने की बात नहीं की है. इस सूची में नाज़िम हिकमत, अन्ना अख्‍़मातोवा, माखनलाल चतुर्वेदी, चेस्वाव मीवोष, ओशिप मण्डस्टाम, जोसेफ़ ब्राडस्की और फैज़ जैसे नाम हैं. पर उनमें शायद ही किसी ने बदला लेने की बात या मांग की है. पोलिश कवि हेर्बेर्त ने तो अपने अन्तःकरण की आवाज़ पर की गयी दुस्साहिक कार्रवाई को साहस का काम नहीं, रुचि का मामला तक कहा है.

हमारे यहां आपातकाल में कई वामपंथियों ने उसका समर्थन किया था: उनकी निंदा की गयी पर किसी ने बदले की कार्रवाई न की, न मांगी. बाबरी ध्वंस के बाद हुए दंगों को स्वाभाविक प्रतिक्रिया कहकर टालनेवालों की तीख़ी आलोचना हुई पर किसी से बदला नहीं लिया गया. गुजरात के नरसंहार पर अधिकांश गुजराती लेखक चुप रहे: इस चुप्पी की निंदा हुई पर किसी से बदला नहीं लिया गया. साहित्य, कुल मिलाकर, स्मृति और क्षमा की विधा है. इसलिए कि साहित्य में कोई परम सत्य नहीं होते, न उनकी कोई तानाशाही: वह छोटे से छोटे सच को भी ख़राब नहीं जाने देता.

सौंदर्य की स्थिति

सदियों से ऐसा माना जाता रहा है कि साहित्य और कलाएं, मानवीय जीवन, सौंदर्य खोजते-रचते हैं: सौंदर्य उनका एक बुनियादी सरोकार या लक्ष्य होता है. आधुनिकता के दौर में रूप को विरूप ने, चित्र को विचित्र ने, लगाव को तनाव ने, सौंदर्य को संघर्ष ने एक तरह से अपदस्थ कर दिया. कुछ इस हद तक कि इन दिनों सौंदर्य पर बात, सतही ढंग से, सिर्फ़ शारीरिक सौंदर्य तक सीमित रह गयी है- वह फ़ैशन, मनोरंजन, विज्ञापन आदि का विषय है पर गंभीर चिन्तन या व्यापक सर्जनात्मकता का नहीं. संगीत और नृत्य, जहां तक वे सौंदर्य से परिचालित होते हैं वहां तक समकालीन या आधुनिक अकसर नहीं माने जाते. आम जिंदगी में भी, चौक-बाज़ार में, सामाजिक व्यवहार ओर आदान-प्रदान में सौंदर्य, संगति, समरसता, लय इत्यादि बहुत घट गये हैं. राजनैतिक दुनिया में जो जितना अशिष्ट और अभद्र बोलता है वह उतना ही सफल होता है.

ऐसे सौंदर्य से मुंह-फेरे संसार में सौंदर्य की क्या स्थिति है और क्या वह अब भी ‘मैटर’ करता है इसकी पड़ताल करने की कोशिश कलाकार शक्ति मेरा ने ‘दि प्रामिज़ ऑफ ब्यूटी’ नामक एक पुस्तक (हार्पर कालिन्स द्वारा प्रकाशित) के माध्यम से की है. इसमें उन्होंने 18 विभिन्न अनुशासनों के लोगों से लम्बी बातचीत की है जिसमें वैज्ञानिक, दार्शनिक, पर्यावरणविद्, वास्तुकार, चित्रकार, नर्तकी, कवि आदि शामिल हैं. मैं भी उसमें से एक हूं.

मुझे लगता है कि हमारे समय में सौंदर्य की धारणा सिरे से बदल भले गयी हो, पूरी तरह से ग़ायब नहीं हुई है. बदली हुई धारणा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के एक परिभाषक पद को याद कर कहें, कर्मसौंदर्य की है: गतिशील, सक्रिय, हिस्सेदार सौंदर्य. सत्य-शिव-सुन्दर की मूल्य त्रयी ऐसी रही है कि उनमें से किसी एक की साधना अधूरी साधना होगी. वही सुंदर होगा जो सच भी हो और मंगलकारी भी. सच भी बिना सुंदर और मंगलकारी हुए बिना अपनी सार्थकता नहीं पा सकता और न ही शिव सच और सुन्दर हुए बिना. संसार में सौंदर्य या सच अकेले नहीं होते: वे अकसर असुंदर और झूठ के पड़ोस में बसे होते हैं. एक तरह से भारतीय रस-सिद्धान्त में रौद्र और बीभत्स को भी नव रसों में शामिल किया गया तो यह उनकी अनिवार्य उपस्थिति और सचाई का ही एहतराम है.

दूसरी तरफ़ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कोई कवि जानबूझकर न तो सौंदर्य की तलाश करता है और न उसे रचने की कोशिश करता है: सौंदर्य लक्ष्य नहीं सर्जनात्मकता की परिणति होता है. जब समाज में बहुत असुंदरता और झूठ फैल गये हों, सौंदर्य प्रतिरोध की तरह उभरता है. उसे छोड़ना या भुला देना मानवीयता के एक बड़े सरोकार को धूमिल करने के बराबर है. जब सुंदरता को लीला जा रहा हो उसको बचाना-सहेजना सच्चा संघर्ष है, हो सकता है.

इस बीच

इस बीच अंधेरा गहरा गया है. इस बीच निराशा बढ़ गयी है. इस बीच अपनी बढ़ती अप्रासंगिकता का अहसास और तीख़ा हो रहा है. इस बीच अपने समय की अपनी समझ पर संदेह बढ़ गया है. इस समय उम्मीद करना व्यर्थ सा लग रहा है. इस बीच विचित्र, विद्रूप, विप्रत्याशित दृश्य पर छा गये हैं. इस बीच हम किसी रास्ते पर नहीं कहीं बीहड़ में भटक रहे हैं. इस बीच सारी आश्वस्तियां खिसकती दीख पड़ रही हैं. इस बीच विचारों का अरण्य और घना, और अभेद्य हो गया है. इस बीच साफ़-साफ़ देख और कह पाना बहुत कठिन, लगभग नामुमकिन होता लग रहा है. इस बीच यह कहना मुश्किल है कि हम किसी दिशा में जा या पहुंच रहे हैं. इस बीच यह समझ में नहीं आ रहा है कि अब हमारा मुक़ाम कहां और कब होगा.

ऐसे भयावह विपर्यास के बीच ख़याल आता है कि हमने ऐसा क्या किया है कि सच्चाई इस क़दर भीषण हो गयी है? हमने दुनिया की बेहतरी के सपने देखे. हमने दूसरों के साथ हमेशा आदर और सम्मान का व्यवहार किया: कभी किसी दूसरे या दूसरों को बरबाद करने या उन्हें सबक सिखाने का कोई उपक्रम नहीं किया. हम दूसरों के बिना अपनी दुनिया बना ही नहीं सकते थे. और न उसमें इतमीनान से रह सकते थे. हमने कभी नहीं चाहा कि सभी एक रंग में रंग जायें: हम रंगारंग दुनिया के हमेशा अभिलाषी रहे. हमने असहमति को बराबर जगह दी, भले हमें बढ़ती मीडियाक्रिटी से चिढ़ होती रही. हमने अपने ईमान पर क़ायम रहने की हर चन्द कोशिश की और इसका एहतराम करने में कभी चूक नहीं की कि दूसरों को भी अपने ईमान पर बने रहने का उतना ही हक़ है. हमने दूसरों की हर तरह से हर मुमकिन मदद की क्योंकि हमारी भी वक़्त पड़ने पर दूसरों ने भरपूर बिला शर्त मदद की थी और हमकृतघ्न नहीं हो सकते. हमें पता है कि हमारा दामन पाक-साफ़ और बेदाग़ नहीं है और हमने दूसरों को कभी उनके दाग़ों के लिए कोसा नहीं. दूसरों से अपने को बेहतर मानने में भ्रम में कभी नहीं पड़े, भले इसका अर्थ यह कभी नहीं था कि हममें आत्मविश्वास का अभाव था. जब भी ज़रूरी लगा हमने अपने पर सन्देह किया, दूसरों पर नहीं. क्या इतना बुरा इस ज़िद का नतीजा है कि हमने सिर नहीं झुकाया, समझौता नहीं किया, लहर में नहीं बहे, आंधी के खिलाफ़ डटे रहे?

दुनिया बेहतर नहीं बदतर हो गयी है ऐसा हमें लगता है: करोड़ों होंगे जिनको ऐसा नहीं लगता. बल्कि लगता है कि दुनिया बेहतर हो गयी या रही है. सारी दुनिया को अलगाव, नफ़रत, हिंसा, हत्या आदि की ओर ढकेला जा रहा है. हम ऐसी दुनिया में कभी शामिल नहीं हो सकते लेकिन अपने किसी द्वीप में सुरक्षित भी नहीं रह सकते. हमें इस दुनिया में जैसे भी हो वैसे शामिल रहना है और अपने पर लगातार सन्देह करते हुए भी स्वतंत्रता-समता-न्याय के मूल्यों पर जिद़ कर जमे रहना है. घने अंधेरे में यही रोशनी हो सकती है, यही हमें अंधेरे से रोशनी की ओर ले जा सकती है. रोशनी का रास्ता भी अटपटा और बीहड़ होगा सो होगा. हम अंधेरे से अगर हारें तो रोशनी के लिए लड़ते हुए ही. लड़ना अपने आप में रोशनी के बराबर है.