कांग्रेस आज एक बहुत नाजुक मोड़ पर खड़ी है. हाल के विधानसभा चुनावों के बाद वह पंजाब में सरकार बनाने और गोवा-मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में कामयाब हुई. लेकिन उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उसकी हार का अंतर चौंकाने वाला है. गोवा और मणिपुर में तो उसका हाल यह रहा कि जीतने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाने के लिए संख्याबल जुटा लिया.

अब नतीजा यह है कि कांग्रेस आज खुद या गठबंधन सहयोगियों के बूते देश के सिर्फ छह राज्यों में काबिज है जबकि भाजपा या उसके सहयोगियों के मामले में यह आंकड़ा 17 का हो गया है. अब इसमें कांग्रेस का वह ऐतिहासिक पतन भी जोड़ दें जब 2014 के लोकसभा चुनावों में उसे सिर्फ 44 सीटें मिली थीं तो साफ है कि पार्टी रसातल की तरफ बढ़ रही है.

यही वजह है कि अब कांग्रेस के भीतर ही पार्टी के ढांचे और उसके काम करने के तरीके को लेकर बड़ी सर्जरी जैसी बातें हो रही हैं. लेकिन बदलाव ऊपर से होना चाहिए. यह साफ हो चला है कि सोनिया और राहुल गांधी का नेतृत्व कांग्रेस के लिए खास उपयोगी साबित नहीं हो पा रहा. सोनिया स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रही हैं तो एक युवा नेता के रूप में पेश किए जा रहे राहुल भी कोई प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे हैं. बल्कि वे जमीनी सच्चाइयों से कटे राजनेता लगते हैं. इसलिए नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एक के बाद एक चुनावी रण जीतने वाली भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस का उन पर निर्भर रहना एक हारी हुई लड़ाई लड़ने जैसा है.

अक्सर तर्क दिया जाता है कि गांधी परिवार कांग्रेस के लिए गोंद जैसा काम करता है. अगर ऐसा है तो फिर सोनिया और राहुल को सारे पद छोड़ देने चाहिए और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की परामर्श समिति का नेतृत्व करना चाहिए. इस तरह वे पार्टी का मार्गदर्शन कर सकते हैं. इस तरह वे कांग्रेस के शीर्ष स्तर पर नए लोगों की राह भी प्रशस्त कर सकते हैं और उस दमघोंटू मंडली से छुटकारा भी पा सकते हैं जो उनके इर्द-गिर्द जमा हो गई है.

कांग्रेस को धर्मनिरेपक्षता और सामाजिक न्याय जैसे उन सिद्धांतों के पुनर्मूल्यांकन की भी जरूरत है जो इसकी विचारधारा का केंद्रीय हिस्सा हैं. इसकी धर्मनिरपेक्षता की पहचान अब अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की बन गई है -जिससे भाजपा को बहुसंख्यक तुष्टीकरण का मौका दिया है- जबकि सामाजिक न्याय का मतलब अब बस आरक्षण के लिए हाथापाई रह गया है. यही खेल जाति आधारित कई पार्टियां भी खेल रही हैं.

इसलिए कांग्रेस के लिए अब यही रास्ता बचा है कि वह अपना कायाकल्प करके खुद को एक आधुनिक और मध्यमार्गी पार्टी की तरह पेश करे. इसके लिए उसे खुद को एक ऐसी पार्टी बनाना होगा जिसमें नेतृत्व का फैसला योग्यता और आंतरिक लोकतंत्र के जरिये हो. पार्टी को ऐसी धर्मनिरपेक्षता पर जोर देना होगा जिसमें हर व्यक्ति के अधिकारों का सम्मान हो. उसे जाति और समुदाय जैसे दायरों से ऊपर उठकर नौजवान भारत के सपनों का प्रतिनिधि बनना होगा. (स्रोत)