यूरोपीय देशों के मीडिया में भारत संबंधी किसी घटना की चर्चा अक्सर तभी दिखती है जब उसके बहाने से भारत की निंदा-आलोचना करने या उस पर कीचड़ उछालने का कोई मौका मिले. बड़ी रेल दुर्घटनाएं और प्राकृतिक आपदाएं या बलात्कार या फिर भ्रष्टाचार के मामले ऐसे ही मनचाहे मौके हुआ करते हैं. इस तरह के मामलों को उछालने से यूरोपीय मीडिया को अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने का परम आत्मसुख मिलता है. वह खुलकर भले ही न कहे, पर कहना यही चाहता है कि देखा, ‘संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र’ से तो हम ही भले हैं! हम जनसंख्या में जितने छोटे हैं, व्यावहारिक श्रेष्ठता और सुसभ्यता में उतने ही बड़े हैं!’

इसी कारण भारत के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणामों पर यूरोपीय मीडिया की रिपोर्टें और टीका-टिप्पणियां यद्यपि भारतीय मीडिया के विश्लेषणों से ही प्रेरित रही हैं, पर साथ ही बेहतर लोकतंत्र होने के अपने स्वाभाविक अहंकार से भी मुक्त नहीं कही जा सकतीं.

मोदी चुनावी रणनीति की धुरी थे

इस संदर्भ में बीबीसी किसी हद तक एक संतुलित अपवाद था. बीबीसी ने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि ‘मोदी अपनी पार्टी की चुनावी रणनीति की धुरी थे. देश का विकास और आधुनिकीकरण करने तथा भ्रष्टाचार का उन्मूलन कर देने के अपने वादों के साथ उन्होंने बड़े आक्रामक ढंग से चुनाव-प्रचार किया. उत्तर प्रदेश जैसे कंगाल राज्य में - जहां जाति, धर्म और परिवार के प्रति मोह गहराई तक पैठा हुआ है - ये बहुत ही तगड़े वादे थे. उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रबल विजय सिद्ध करती है कि मतदाताओं से अपने आप को जोड़ने की श्रीमान मोदी की क्षमता कम नहीं हुई है. उनकी पार्टी ने मुख्यमंत्री के पद के लिए किसी का नाम लेने के बदले मोदी के नाम पर ही भरोसा किया. विपक्ष उन्हें गुजरात से आया बाहरी आदमी कहता रहा और किसी स्थानीय नेता का नाम नहीं लेने के कारण भाजपा का मखौल भी उड़ाता रहा, पर इससे (जनता की) मूलभूत भावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ा. उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में मिली भारी विजय से राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का कद और भी बढ़ गया है.’

ब्रिटेन के ही द इकनॉमिस्ट ने प्रधानमंत्री मोदी की इस अप्रत्याशित ज़ोरदार सफलता का विश्लेषण करते हुए अपने अपेक्षाकृत लंबे लेख का आरंभ इन शब्दों के साथ कियाः ‘एक टेलीविज़न चैनल ने उसे सुनामो की संज्ञा दी है (सुनामी और नरेंद्र मोदी का मेल). श्रीमान मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को केसरिया बाढ़ में पूरी तरह डुबो दिया. उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 में से 312 सीटें हथिया लेना केवल कड़ी मेहनत, सांगठनिक कौशल और जुझारू प्रचार का ही परिणाम नहीं है. आम तौर पर आपस में लड़ने-झगड़ने वाले भारतीय विशेषज्ञ भी मोदी को यह श्रेय देने पर एकमत हैं कि वोट बटोरने में उनका कोई सानी नहीं.’

मुसलमानों के लिए बुरी ख़बर

द इकनॉमिस्ट का यह भी कहना है कि कारोबारी जगत के बहुतेरे लोग मोदी और उनकी पार्टी की इस भारी सफलता से खुश हैं और आशा कर रहे हैं कि सरकार खुले बाज़ार की नीति को अब एक नए विश्वास के साथ आगे बढ़ायेगी. हालांकि उसके मुताबिक उत्तर प्रदेश के चार करोड़ मुसलमानों के लिए यह एक बुरी ख़बर भी है. उसके शब्दों में ‘बात इतनी ही नहीं है कि हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी ने एक भी मुसलमान को उम्मीदवार नहीं बनाया. मंद स्वर में मोदी स्वयं, और उंचे स्वर में निचले दर्जे के उनके संगी-सहयोगी व पार्टी-प्रवक्ता (मुसलमानों द्वारा) महसूस किये जा रहे सांप्रदायिक घाव पर नमक छिड़कते रहे हैं.’ यहां ध्यान देने की बात यह है कि भारत के मुसलमानों के प्रति द इकनॉमिस्ट की यह सहानुभूति उचित तब होती, जब ब्रिटेन और सारा यूरोप स्वयं, ठीक इसी समय इस्लाम-विरोधी घोर-दक्षिणपंथ की तरफ झुक नहीं रहा होता.

ब्रिटेन के द टेलीग्राफ़ ने अपनी तरफ़ से कुछ कहने के बदले समाचार एजेंसी रॉयटर्स का एक आकलन प्रकाशित किया. इसमें कहा गया है कि ‘उत्तर प्रदेश हाथ में आने का मतलब है, नोटबंदी वाले भारी जोखिम भरे निर्णय के बाद, मोदी द्वारा एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के प्रबंधन का उन्मुक्त अनुमोदन.’ निवेशक तो अब यही आशा करेंगे कि मोदी, देश की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिए, राष्ट्रीय बिक्रीकर शुरू करने सहित और अधिक सुधारों की तरफ क़दम बढ़ायेंगे.

चुनाव जनमतसंग्रह था

रॉयटर्स की ही तरह यूरोप के जर्मनभाषी देशों के लिए जर्मन समाचार एजेंसी डीपीए ने अपने आकलन में लिखा, ‘उत्तर प्रदेश और चार अन्य राज्यों में महीनों चला कड़ा चुनावी संघर्ष मोदी के तीन वर्षीय शासनकाल पर एक ऐसे जनमतसंग्रह के समान देखा जा रहा है, जो 2019 के राष्ट्रीय आम चुनाव तक प्रभावी रहेगा.’ उसने आगे लिखा है कि इस चुनाव संघर्ष में हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी ने समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का सूपड़ा साफ़ कर दिया.

यहां यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यूरोपीय देशों के मीडिया में ‘बीजेपी’ नाम के पहले हमेशा ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ विशेषण ज़रूर जोड़ दिया जाता है. भारत में ‘हिंदू’ और ‘राष्ट्रवाद’ शब्द का जो अर्थ लगाया जाता है, यूरोप में वही अर्थ नहीं लगाया जाता. पहली बात, यूरोप में हिंदू धर्म बहुत बदनाम है. उसे जनता को जातियों में बांट कर उनका दमन-शोषण करने वाला एक घोर अमानवीय धर्म माना जाता है. दूसरी बात, यूरोप में धर्म की धारणा यह है कि उसका हमेशा ईसा, मूसा या मुहम्मद जैसा कोई धर्म-प्रवर्तक होता है और उसके उपदेशों वाली कोई पवित्र पुस्तक होती है, जिसे पूजना-पढ़ना अनिवार्य होता है. यह सब हिंदू धर्म से बिल्कुल मेल नहीं खाता.

‘राष्ट्रवाद’ शब्द से यूरोपवासियों को हिटलर याद आता है

तीसरी बात, ‘राष्ट्रवाद’ शब्द भारत में देशभक्ति का पर्यायवाची समझा जाता है, जबकि यूरोप में जर्मनों को ही नहीं, सभी प्रबुद्ध यूरोपवासियों को यह शब्द तुरंत हिटलर के राष्ट्रवाद की याद दिला कर घृणा से भर देता है. वे यही सोचने लगते हैं कि भारत में बीजेपी का राष्ट्रवाद भी हिटलर की नाज़ी पार्टी के फ़ासिस्ट राष्ट्रवाद जैसा ही एक जनसंहारक विस्तारवादी राष्ट्रवाद होगा. हिटलर के विस्तारवादी अत्याचार सारे यूरोप को भुगतने पड़े थे, इसलिए सारे यूरोप में यही सोच है. इस बीच इस्लामी कट्टरपंथ भी धर्म के नाम पर दमनकारी राष्ट्रवाद का एक नया पर्याय बन गया है. उससे भयभीत यूरोपीय लोग ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ को भी वैसा ही मान सकते हैं.

यूरोपीय मीडिया भारत के संदर्भ में जब भी ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ शब्द का प्रयोग करता है तो आम यूरोपीय के मन में यह पूर्वाग्रह पैदा होना स्वाभाविक ही है कि बीजेपी भी सिरफिरे हिंदुओं की कोई ऐसी ही कट्टरपंथी धार्मिक पार्टी है, जो भारत का हिंदूकरण करना और सभी लोगों पर हिंदू धर्म थोपना चाहती है. यूरोपवासी यही सोचते हैं कि जिस तरह उनके ईसाई मिशनरी या मुस्लिम धर्मप्रचारक धर्मांतरण द्वारा अपने धर्म का विस्तार करते हैं, उसी तरह हिंदू भी करते होंगे. वे नहीं जानते कि धर्मांतरण द्वारा धर्म के प्रचार-प्रसार की हिंदू धर्म में कोई अवधारणा ही नहीं है.

‘ईसाई राष्ट्रवादी’ कभी नहीं लिखा जाता

जर्मनी सहित यूरोप के अनेक देशों मे ऐसी कई पार्टियां हैं, जिनके नाम तक में ‘क्रिश्चियन’ (ईसाई) शब्द शामिल है, जो सरकारें चला रही हैं या चला चुकी हैं. पर यूरोपीय मीडिया उनके नाम के आगे ‘ईसाई राष्ट्रवादी’ कभी नहीं लिखता और न ही उन्हें राष्ट्रवादी कहता है. ये पार्टियां भी किसी अंतरराष्ट्रीयतावाद की पोषक नहीं हैं, वे अपने राष्ट्र को ही सर्वोपरि रखती हैं. लेकिन, बीजेपी का नाम आते ही उस पर ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का लेबल लगना शुरू हो जाता है.

जर्मनी के तीन दैनिकों - बर्लिन के ‘बेर्लिनर त्साटुंग’, कोलोन के ‘क्यौएल्नर श्टाट-अनत्साइगर’ और फ्रैंकफर्ट के ‘फ्रांकफुर्टर रुंडशाऊ’ - ने बैंकॉक स्थित अपने साझे संवाददाता का एक आलेख प्रकाशित किया. इससे साफ़ पता चलता है कि भाजपा को ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ बता कर यूरोपीय मीडिया वास्तव में कहना क्या चाहता है. इस आलेख में लिखा है, ‘मोदी को कुछ समय पहले नकद धन नष्ट करने के उनके कारनामे की सज़ा देने के बदले (चुनावों को) एक प्रकार का जनमतसंग्रह बना कर मतदाताओं ने इस हिंदू राष्ट्रवादी को विजय का उपहार दे दिया. जबकि, चुनाव ऐसे थे कि दूसरे पक्ष को कभी हारना ही नहीं चाहिये था. इस हिंदू राष्ट्रवादी के कांग्रेस पार्टी से लेकर क्षेत्रीय पार्टियों तक के सभी विरोधियों को चाहिये था कि वे ही जीतते, ताकि मोदी अपने कार्यकाल की अधमेड़ पर ही इतने दुर्बल हो जाते कि असहिष्णुता से उन्मत्त उनकी हिंदू राष्ट्रवादी पैदल जनता के पैर ठिठक जाते.’ कहने की आवश्यकता नहीं कि यह मोदी या भाजपा से अधिक भारतीय जनता की निंदा है.

मोदी जनता को बहा ले गए

इससे कहीं सभ्रांत है जर्मन प्रतिष्ठान ‘स्टिफ्टुंग फ्युअर दी फ्राइहाइट’ (स्वाधीनता हेतु प्रतिष्ठान) की वेबसाइट पर प्रकाशित उसके दिल्ली स्थित दक्षिण एशिया कार्यालय के प्रमुख का यह आकलनः ‘किसी सुनामी लहर की तरह वे (मोदी) अपनी मतदाता जनता को बहा ले गए. 2014 से देश का शासन चला रही बीजेपी अपने आप को आर्थिक सुधार लाने और भ्रष्टाचार तथा काले धन से लड़ने वाली पार्टी के तौर पर पेश कर रही है... विपक्ष की दुर्बलता और बीजेपी की सबलता के प्रकाश में विधानसभा चुनावों के नतीजे 2019 के भावी संसदीय चुनावों के अग्रिम परिणाम जैसे बन गए हैं. लोगों की आशा के कर्णधार मोदी ने लोगों की अपेक्षाओं को पर लगा दिये हैं. चुनावी जनता का मूड बनाए रखने के लिए अब उन्हें और अधिक काम करना पड़ेगा... मोदी 2019 के बाद भी सत्तारूढ़ रह पाते हैं या नहीं, यह निर्णायक रूप से इस पर निर्भर करेगा कि इस समय छिन्न-भिन्न विपक्ष तब तक एकजुट हो पाता है या नहीं. ठीक इस समय तो ऐसे कोई संकेत नहीं हैं.’

स्विट्ज़रलैंड के जर्मन दैनिक ‘नोए त्युरिशर त्साइटुंग’ के नयी दिल्ली संवाददाता ने भी विधानसभा चुनावों में गहरी रुचि लेते हुए एक लंबा लेख लिखा. इसके लेख के शब्दों में बीजेपी की ‘किसी भूस्खलन जैसी विजय का महत्व 20 करोड़ जनसंख्या वाले इस उत्तरी राज्य की सीमाओं से कहीं दूर तक जाता है... मुख्यतः उच्च वर्ण के हिंदू समर्थकों की बीजेपी अपनी स्पष्ट जीत को इसलिए भी जनता के सभी वर्गों और तबकों से मिले समर्थन का प्रत्यक्ष प्रमाण बता रही है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति लोगों को जाति और धर्म के नाम पर गोलबंद करने का खेल रही है.. तथ्य भी यही है कि 40 प्रतिशत के साथ उसके मतों का अनुपात सबसे अधिक है...चुनाव-परिणाम को इस बात का प्रमाण भी माना जा सकता है कि जनता ने नोटबंदी से हुई पीड़ाओं के लिए मोदी को माफ़ कर दिया. वाकपटु प्रधानमंत्री महोदय को, प्रगति और आर्थिक विकास दिलाने वाली पार्टी के तौर पर, बीजेपी पर जनता का भरोसा फिर टिकाने में भी सफलता मिल गयी, हालांकि वे इस मामले में लोगों की अपेक्षाओं से काफ़ी पीछे हैं.’

‘नोए त्युरिशर त्साइटुंग’ के नयी दिल्ली संवाददाता का कहना है कि उत्तराखंड में भी बीजेपी की ज़ोरदार विजय से भारत की राजनीति में अब उसका वही वर्चस्व हो गया है, जो पहले कभी कांग्रेस पार्टी का हुआ करता था. नेहरू-गांधी की कांग्रेस उत्तरोत्तर महत्वहीन होती जा रही है.

सारे पूर्वानुमान पीछे छूट गए

स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी के पड़ोसी फ्रांस के मीडिया ने भारत के पांच राज्यों में हुए चुनावों को लगभग अनदेखा कर दिया. वहां के प्रमुख पत्रों में से केवल ‘ले मोंद’ ने ‘भारत में हिंदू राष्ट्रवादियों की विजय’ शीर्षक के अंतर्गत एक संक्षिप्त समीक्षा में लिखा कि 40 प्रतिशत वोट पाने वाली बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में तीन-चौथाई सीटें जीत लीं. पिछले 40 साल में यह किसी पार्टी की सबसे बड़ी विजय है. ‘एक ऐसे राज्य में, जहां मतदाता जात-पांत और धर्मों में बंटे हुए हैं, बीजेपी ने ऐसी उत्ताल तरंगें पैदा कीं कि सारे पूर्वनुमान पीछे छूट गए. सवर्णों की इस हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी को निचली जातियों ने ऊपर उठाया. उसके 381 प्रत्याशियों में से 150 तथाकथित पिछड़ी जातियों के और 64 अछूत थे. कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं था. राज्य की 20 प्रतिशत जनसंख्या वाले मुस्लिम समुदाय के वोट विपक्षी पार्टियों के बीच बंट कर रह गए. अपने कुशल चुनावी गणित से बीजेपी ने विभिन्न जातियों के बिखरे वोट को हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा की एक प्रबल राजनीतिक शक्ति के रूप में पिरो दिया.’

‘ले मोंद’ को शिकायत है कि बीजेपी ने अपने चुनाव प्रचार में ‘धर्मनिरपेक्षता की अवमानना’ की, भले ही वह दावा कर रही है कि उसे जनता ने धर्म और जाति से ऊपर उठ कर अपना व्यापक समर्थन दिया. यह बात भारत के वामपंथियों के ही नहीं, यूरोप के ‘भारत पारखियों’ के भी गले नहीं उतर पाती कि यदि विश्वासजनक राजनैतिक विकल्प दिखे, तो भारत की कम पढ़ी-लिखी साधारण जनता में धर्मों और जातियों से ऊपर उठ सकने की भी क्षमता व सूझबूझ है. खेलों में हार-जीत, प्राकृतिक आपदाओं या किसी बाहरी आक्रमण के समय हर भारतीय अपनी जात-पांत और धर्म से ऊपर उठ कर क्या मात्र भारतीय ही नहीं रह जाता? इस बात का तो गर्मजोशी से स्वागत होना चाहिये कि उत्तर प्रदेश जैसे एक अत्यंत रूढिवादी राज्य की जनता भी अब धर्म-कर्म और जात-पांत के प्रपंच से ऊपर उठने के लक्षण दिखा रही है. अपनी बिरादरी वालों को वोट देने और परिवारवाद से मुंह मोड़ रही है.