उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही एक बड़ी संभावना जोर पकड़ने लगी है. अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण की. गोरखपुर से पांच बार के लोकसभा सदस्य इस मामले में बिल्कुल अपने गोरक्षपीठ मठ के पूर्व महंतों जैसे ही हैं. उदाहरण के तौर पर मठ के पूर्व महंतों की तरह ही आदित्यनाथ भी बड़े पैमाने पर हिंदुओं के ध्रुवीकरण के लिए राम मंदिर के प्रतीक का सहारा लेते रहे हैं. शायद इसीलिए बहुत से लोग निकट भविष्य में राम मंदिर के निर्माण की संभावना को सच होते हुए भी देख रहे हैं.

गोरक्षपीठ का राम मंदिर आंदोलन से गहरा जुड़ाव रहा है

गोरक्षपीठ की तीन पीढ़ियां राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी रही हैं. इसी पीठ के महंत दिग्विजय नाथ (1935-1969) को उन चंद लोगों में गिना जाता है, जिन्होंने शुरुआती तौर पर बाबरी मस्जिद को मंदिर में तब्दील करने की परिकल्पना की थी. बताया जाता है कि उन्हीं की अगुवाई में 22 दिसंबर 1949 को विवादित ढांचे के भीतर चोरी-छिपे भगवान राम की प्रतिमा रखवाई गई थी. उस वक्त हिंदुत्व के सबसे बड़े झंडाबरदार हिंदू महासभा के विनायक दामोदर सावरकर के साथ दिग्विजय नाथ ही थे, जिनके हाथ में इस आंदोलन की कमान थी. हिंदू महासभा के सदस्यों ने तब अयोध्या में इस काम को अंजाम दिया था. ये सदस्य तब अखिल भारतीय रामायण महासभा के बैनर तले काम कर रहे थे.

दिग्विजय नाथ के निधन के बाद उनके शिष्य महंत अवैद्यनाथ (उत्तर प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के गुरु) ने आंदोलन को आगे बढ़ाया. उनके बारे में भी कहा जाता है कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने की रूपरेखा उन्हीं की देखरेख में तैयार की गई थी. हालांकि इस काम को अंजाम संघ परिवार (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन) के लोगों ने दिया. इस आंदोलन ने उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया था.

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने 1989 में इलाहाबाद में जिस धर्म संसद का आयोजन किया, उसमें अवैद्यनाथ के भाषण ने ही इस आंदोलन का आधार तैयार किया था. इस धर्म संसद के तीन साल बाद ही बाबरी ढांचा ढहा दिया गया. तब एक फरवरी 1989 को स्टेट्समैन ने अपनी खबर में लिखा था, ‘गोरखपुर के महंत अवैद्यनाथ ने खास तौर पर उल्लेख किया है कि क़ुरान मुस्लिमों को दूसरों के धर्म स्थलों पर मस्जिद बनाने से रोकती है…. और हमें किसी संघर्ष टालने के लिए किसी दूसरी जगह पर राम मंदिर बनाने की सलाह दी जा रही है. यह सलाह ठीक वैसी ही है, जैसे रावण से युद्ध टालने के लिए भगवान राम को किसी दूसरी सीता से विवाह करने के लिए कह दिया जाए.’

राम मंदिर आंदोलन में अवैद्यनाथ की भूमिका कितनी थी, इसका अंदाजा लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है. आयोग ने इस आंदोलन के जरिए देश में सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश का जिन-जिन अहम लोगों को जिम्मेदार माना था, उनमें अवैद्य नाथ भी एक थे. आयोग की रिपोर्ट कहती है..

‘पर्याप्त मात्रा में पुख्ता सबूत दर्ज किए गए हैं... कि उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, परमहंस रामचंद्र दास, आचार्य धर्मेंद्र देव, बीएल शर्मा, ... महंत अवैद्यनाथ आदि ने भड़काऊ भाषण दिए.’

अब योगी आदित्यनाथ उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं

इसके बाद अब योगी आदित्यनाथ उसी परंपरा को आगे बढ़ाने में लगे हैं. निधन (2014 में) से करीब दो दशक पहले 1994 में अवैद्य नाथ ने आदित्यनाथ को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. बल्कि यूं कहें कि आदित्यनाथ ने इस आंदोलन को अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में ज्यादा उग्र स्वरूप दे दिया है, तो गलत नहीं होगा. वे न सिर्फ खुलेआम कट्‌टरवादी सांप्रदायिक राजनीति का समर्थन करते हैं, बल्कि उनके द्वारा गठित हिंदू युवा वाहिनी संप्रदायों के बीच वैमनस्य फैलाने की विशेषज्ञ मानी जाती है. साथ ही मुस्लिमों को हिंदुओं के दुश्मन के तौर पर प्रचारित करने के लिए भी.

दिग्विजयनाथ और अवैद्यनाथ की तरह ही आदित्यनाथ भी विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाए जाने के धुर समर्थक रहे हैं. संभवत: इसीलिए संघ ने भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर आदित्यनाथ की दावेदारी/उम्मीदवारी का समर्थन किया. आदित्यनाथ ने हाल में हुए उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान सभी सात चरणों तक राम मंदिर का मुद्दा चर्चा में बनाए रखा. उसे जीवित रखा. पहले चरण के मतदान के बाद ही उन्होंने पत्रकारों से कहा था, ‘राम मंदिर के निर्माण में जो बाधाएं हैं, उन्हें धीरे-धीरे दूर किया जाएगा. जल्द ही अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा.’

प्रचार के दौरान एक जगह तो उन्होंने एलान कर दिया था, ‘अगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में से किसी को भी चुनाव में जीत मिली तो करबला और कब्रिस्तान बनवाए जाएंगे. लेकिन भाजपा के जीतने पर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की राह प्रशस्त की जाएगी.’

यानी अब जबकि आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं तो यह तय माना जा सकता है कि भाजपा 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए राम मंदिर को ही बड़ा जरिया बनाएगी.