केंद्र और हरियाणा सरकार ने आंदोलन कर रहे जाटों को मना लिया है. हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि यह शांति कब तक बरकरार रह पाती है. हरियाणा में जाट आंदोलन की अगुवाई कर रही अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के साथ एक बैठक के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा, ‘हम इस पर सहमत हैं कि जाट समुदाय के लिए हरियाणा में आरक्षण होना चाहिए. हमने अपना काम पूरा कर लिया है. अब मुद्दा पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में अटका है.’ पिछले साल हुए आंदोलन के बाद हरियाणा सरकार ने जाटों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का ऐलान किया था. लेकिन हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगा दी.

अतीत में भी अदालतें जाट समुदाय को दिए गए आरक्षण को रद्द कर चुकी हैं. इसलिए इस पर केंद्र और हरियाणा सरकार का आश्वासन थोड़ा और वक्त शांति की जुगत से ज्यादा कुछ नहीं लगता. जाट मुख्य रूप से खेती-बाड़ी पर आश्रित समुदाय है. लेकिन सिकुड़ती जोत, खेती का हाल जस का तस रहने और देहात में बदलाव की प्रक्रिया धीमी होने के चलते हरियाणा के ग्रामीण इलाके में प्रभुत्व रखने वाला यह समुदाय अब आर्थिक रूप से खुद को पीछे पा रहा है.

देश के कई हिस्सों में बीच के दर्जे की कई जातियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. शिक्षा का स्तर कम है तो जाट समुदाय खेती के इतर मौजूद अवसरों का फायदा उठाने में भी खुद को अक्षम पा रहा है. खेती से जुड़े कारोबारी अवसरों में भी उसे उतनी हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही क्योंकि उसके पास इसके लिए पर्याप्त व्यापारिक बुद्धि कौशल भी नहीं है.

1990 के दशक से ही समुदाय खुद को अन्य पिछड़ी जातियों यानी ओबीसी में शामिल करवाने के लिए आंदोलन छेड़े हुए है. 2014 में आम चुनाव से ऐन पहले तब की यूपीए सरकार ने पिछड़ी जाति राष्ट्रीय आयोग की सिफारिशों के खिलाफ जाते हुए जाट समुदाय के लिए आरक्षण को मंजूरी दे दी थी. उससे एक साल पहले हरियाणा सरकार ने सरकारी नौकरियों में जाटों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का ऐलान किया था. लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र की अधिसूचना इस आधार पर रद्द कर दी कि मंडल आयोग ने पिछड़ी जातियों के लिए सामाजिक, आर्थिक या शैक्षिक लिहाज से कुछ पैमाने तय किए हैं जिन्हें जाट समुदाय पूरा नहीं करता. शीर्ष अदालत के इस आदेश के बाद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने जाटों को आरक्षण देने वाले हरियाणा सरकार के फैसले पर भी रोक लगा दी.

हरियाणा सरकार की ताजा घोषणा देखकर लगता है कि वह जाटों को आरक्षण देने की अपनी पिछली कोशिशों का अंजाम देखने को तैयार नहीं. और यह सिर्फ हरियाणा की ही बात नहीं है बीते साल बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी महाराष्ट्र सरकार का वह फैसला रद्द कर दिया था जिसमें उसने प्रभावशाली मराठा समुदाय को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया था.

होना तो यह चाहिए था कि जाटों के इस आंदोलन से जुड़े सामाजिक आर्थिक कारणों पर ध्यान देते हुए नए रोजगार पैदा करने, कौशल विकास और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मोर्चों पर प्रदर्शन सुधारा जाता. लेकिन इसकी उपेक्षा हो रही है. इस सबके बावजूद आरक्षण की बीन बजाने वाली केंद्र और राज्य सरकारें पहले से ही बड़ी एक भावनात्मक समस्या को और बढ़ाने का काम कर रही हैं. (स्रोत)