अयोध्या के राममंदिर विवाद पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की. शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला बेहद संवदेनशील है इसलिए इसका आपसी स​हमति से हल निकले तो बेहतर है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो वह मामले की मध्यस्थता कर सकता है. हालांकि शीर्ष अदालत ने जल्दी सुनवाई शुरू करने की मांग पर कहा है कि वह 10 दिन बाद यानी 31 मार्च को इस पर विचार करेगा.

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने कहा कि यह मामला धर्म और आस्था से जुड़ा है और ऐसे मामले कोर्ट से बाहर बातचीत से सुलझाए जाएं तो बेहतर होगा. जस्टिस खेहर ने दोनों पक्षों को वार्ताकार नियुक्त कर बातचीत करने का सुझाव दिया. साथ ही उन्होंने पेशकश की कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो किसी जज को इसमें मध्यस्थ बनाया जा सकता है. उन्होंने खुद भी मध्यस्थ बनने की पेशकश की है.

हालांकि सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट को बताया कि दोनों पक्ष इस मसले पर जिद छोड़ने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा कि वे पहले भी बातचीत की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन मामले का कोई हल नहीं निकल सका इसलिए उन्होंने कोर्ट से दखल देने की अपील की है. स्वामी ने कहा कि कोर्ट इस मामले की सुनवाई जल्द से जल्द आरंभ करे. इस पर कोर्ट ने कहा कि अगली 31 मार्च को वह इस मांग पर विचार करेगा. भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का स्वागत किया है. वहीं कांग्रेस ने मामले को विचाराधीन बताते हुए कहा कि अदालत ही इस मामले पर फैसला ले.

उधर, बाबरी मस्जिद समिति ने शीर्ष अदालत के सुझाव को खारिज कर दिया है. खबरों के मुताबिक समिति के संयुक्त संयोजक डॉ एसक्यूआर इलयास ने कहा, ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले ही अपना निर्णय दे चुका है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को लगता है कि बातचीत का वक्त अब खत्म हो चुका है.’ उन्होंने बाबरी मस्जिद समिति और विश्व हिंदू परिषद के बीच हुई पिछली बातचीत का भी हवाला दिया जो किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी. बाबरी मस्जिद एक्शन कमे​टी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने भी समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि कोर्ट से बाहर यह विवाद नहीं सुलझेगा क्योंकि इस मामले में पहले हुई वार्ता फेल हो चुकी है.

अयोध्या का राममंदिर विवाद बीते 67 सालों से चल रहा है. 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तो यह दोनों समुदायों के लिए काफी संवेदनशील मुद्दा बन गया. अब से करीब साढ़े छह साल पहले सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि विवादित स्थल राम जन्मभूमि है और इसके नीचे विशाल मंदिर के अवशेष पाए गए हैं, इसलिए विवादित स्थल की दो तिहाई जमीन मंदिर के लिए और एक तिहाई मस्जिद के लिए बांट दी जाए. हालांकि हाईकोर्ट के निर्णय के करीब छह साल बाद भी मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू नहीं हो सकी है. इसी सिलसिले में सुब्रमण्यम स्वामी ने शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी.