एक ऐतिहासिक फैसले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने देश की दो पवित्र नदियों गंगा ओैर यमुना को ‘जीवित इंसान का दर्जा’ देने का आदेश दिया है. एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि अब गंगा-यमुना को वही अधिकार हैं जो देश का कानून और संविधान किसी भी नागरिक को देता है. अदालत ने इस संबंध में न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी का भी उदाहरण दिया जिसे इस तरह का दर्जा दिया गया है.

यानी कहा जा सकता है कि न्यूजीलैंड से नदियों को बचाने की एक नई राह निकली है. यह पहली बार हुआ है जब एक नदी को इंसान मान लिया गया है और उसे वैसे ही अधिकार दे दिए गए हैं जैसे किसी संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के होते हैं. यह मुमकिन हो पाया क्योंकि न्यूजीलैंड का माओरी आदिवासी समुदाय इसके लिए करीब डेढ़ सदी तक संघर्ष करता रहा. माओरी समुदाय वांगानुई को अपना पूर्वज मानता है. इस नदी पर उसकी आस्था अगाध है.

वांगानुई न्यूजीलैंड की तीसरी सबसे बड़ी नदी है. इसकी कुल लंबाई 290 किलोमीटर है. इसे नागरिकों की तरह अधिकार मिलने का मतलब यह है कि अब कोई भी इस नदी को प्रदूषित नहीं कर सकता. यहां तक कि कोई इस नदी को गाली भी नहीं दे सकता. अगर किसी ने ऐसा किया तो इसका मतलब होगा कि वह माओरी समुदाय को नुकसान पहुंचा रहा है और उस पर संबंधित कानून के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है.

यह पहली बार हुआ है जब एक नदी को इंसान मान लिया गया है और उसे वैसे ही अधिकार दे दिए गए हैं जैसे किसी संप्रभु राष्ट्र के नागरिक के होते हैं  

न्यूजीलैंड की संसद ने इस काम के लिए बाकायदा एक कानून बनाया है. इसमें नदी के कानूनी अधिकारों को सुरक्षित रखने का जिम्मा दो वकीलों को दिया गया है. दोनों वकील नदी के अभिभावक होंगे. वांगानुई का एक बैंक एकाउंट होगा. उसकी सेहत को ठीक करने के लिए करीब तीन करोड़ डॉलर और कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए 10 लाख डॉलर का फंड बनाया गया है. भारत में भी कुछ ऐसा ही हुआ है. उत्तराखंड हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार की परियोजना नमामि गंगे के निदेशक, उत्तराखंड के मुख्य सचिव और उत्तराखंड के महाधिवक्ता को इन नदियों का कानूनी अभिभावक बनाया है.

वांगानुई को कानूनी अधिकार देने के कारण भारत से अलग नहीं थे. यह नदी गहरे प्रदूषण की शिकार है. भारी खनन की वजह से कई जगह उसकी धारा बदल चुकी है. उस पर औद्यौगीकरण की मार भी पड़ी है. लेकिन अच्छी बात यह रही कि माओरी समुदाय उसके लिए लड़ता रहा. उसने जो कानूनी लड़ाई लड़ी वह न्यूजीलैंड के इतिहास की सबसे लंबी अदालती लड़ाई बन गई जो लगातार तेज होती गई. स्थानीय लोगों ने भी माओरी समुदाय का समर्थन किया. इस सबका नतीजा वांगानुई को लेकर एक असाधारण कानून के रूप में सामने आया. इस कानून पर मुहर लगाते हुए न्यूजीलैंड की संसद ने इस पर माफी भी मांगी की इस नदी को बचाने के लिए उसने अब तक पर्याप्त उपाय नहीं किए.

यह सिर्फ एक नदी को बचाने की कवायद नहीं है बल्कि मानव और प्रकृति के बीच के छीजते रिश्ते को मजबूत करने की कोशिश है. सहअस्तित्व का ये भाव सिर्फ भाषणों या सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उसे जमीन पर उतारकर दुनिया भर की नदियों का भविष्य संवारने का पैगाम दिया गया है. नदी को इंसानी अधिकार देना चौंकाता जरूर है लेकिन बहुत से जानकार मानते हैं कि ऐसे अभूतपूर्व तरीकों से ही तेजी से प्रदूषित हो रही दुनियाभर की नदियों की रक्षा की जा सकती है. उनके मुताबिक इस बात को भी समझने की जरूरत है कि नदियों को बचाने के परंपरागत तरीके उतने प्रभावी साबित नहीं हो पा रहे.

उदाहरण के लिए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी गंगा को मां मानती है. इस अगाध आस्था के बाद भी गंगा अब तक मैली है. 2525 किलोमीटर लंबी गंगा की सफाई पर पिछले 28 साल में 20 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं . नमामी गंगे परियोजना जोर शोर से आगे बढ़ाई जा रही है लेकिन अब भी गंगा ज्यादातर जगहों पर नदी कम गंदा नाला ज्यादा लगती है. नदियां मानवता की रक्त शिराएं हैं. नदियों के मरने का मतलब इंसानी सभ्यता का भी खत्म होना है. हो सकता है न्यूजीलैंड से हुई यह पहल हमारे इस विनाशकारी सफर को थामने की दिशा में अहम साबित हो.