कविता का प्रकाशन दशकों से समस्याग्रस्त रहा है. पत्र-पत्रिकाओं में उसके लिए कम जगह होती है. पचासेक साल पहले तो यह हाल था कि मुक्तिबोध जैसा मूर्धन्य कवि भी अपनी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं को भेजने में इसलिए संकोच करता था कि उनकी लंबाई के कारण वे छपेंगी नहीं. विश्व कविता दिवस - और उनकी जन्मशती के मौके पर भी, जो इस समय चल रही है - यह याद किया जाना चाहिये कि उनके जीते जी उनका एक भी कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हो पाया था. एक ज़माने में कहा जाता था कि प्रकाशक कवियों से पैसे लेकर उनके संग्रह छापते थे. इन दिनों भी कभी-कभी ऐसा सुनने को मिल जाता है.

मेरा कविता संग्रह तो, सौभाग्य से, 25 वर्ष की आयु में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कर दिया था. लेकिन मेरी पीढ़ी के अनेक प्रतिभाशाली कवियों के कविता संग्रह काफी बाद में ही प्रकाशित हो सके. इनमें से कुछ तो मैंने ही अपनी पत्रिका ‘पहचान’ में 1970-74 के बीच प्रकाशित किये थे.

इस स्थिति में पिछले एकाध दशक में लगता है अंतर आया है. इसका प्रमाण है राजकमल-राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा हाल ही में प्रकाशित 11 संग्रह जो अपेक्षाकृत युवा कवियों के हैं. एक साथ इतने संग्रह प्रकाशित करने का जोखिम इससे पहले शायद ही किसी प्रकाशन ने उठाया हो. हालांकि वाणी प्रकाशन, बीकानेर के सूर्य प्रकाशन मंदिर, जयपुर के बोधि प्रकाशन और इलाहाबाद के साहित्य भंडार ने भी अच्छी संख्या में कविता संग्रह प्रकाशित किये हैं.

भले इन दिनों ज़्यादातर कविता पढ़े जाने के लिए लिखी जाती हैं, उसके मौखिक पाठ की बड़ी लंबी और सशक्त परंपरा रही है. हमारे समय में यह परंपरा कवि सम्मेलनों के असह्य फूहड़पन में बदल गयी है. फिर भी, जब-तब ऐसे आयोजन, गोष्ठियां आदि होते रहते हैं जिनमें कवियों के मुख से कविता सुनने का अवसर मिलता है. कविता प्रस्तुत करते हुए कवि की सजीव उपस्थिति, उसकी आवाज़, लय-उतार-चढ़ाव आदि कविता को नयी अर्थाभा और मानवीय गरमाहट देते हैं और उसकी जटिलता, सूक्ष्मता आदि को भी ग्राह्य बना देते हैं.

हिंदी की महत्वपूर्ण कविता लोकप्रियता और बाज़ारूपन से दूर रहकर अपना सत्व सजग सजीव रख सकी है. यह आकस्मिक नहीं है कि अब भी सार्थक प्रतिरोध कविता में अधिक है. उसका प्रतिष्ठान-विरोधी स्वभाव अनदेखा नहीं जा सकता. हमारे एक पुरखे मलिक मोहम्मद जायसी ने सदियों पहले कवि की दीठ (दृष्टि) को हिरवाणी के खड्ग के समतुल्य बताते हुए कहा था कि उसमें एक दिशा में आग और दूसरी दिशा में पानी होता है. दो परस्पर विरोधी भावों या तत्वों को कविता एक साथ ले जाने की क्षमता रखती है.

इसके अलावा कविता अपना समय तो लिखती ही है पर उसके पार के समय को भी लिखती है. कविता विकल्प और स्वप्न की रंगभूमि भी होती है, तब भी, जब वह कुछ मूल्यों के लिए रणभूमि में भी क्यों न बदल गयी हो. वह बेहतर और वैकल्पिक दुनिया की संभावना को भाषा में सजीव रखती है. वह नैतिक उपदेश नहीं देती पर हमारे नैतिक बोध को सक्रिय रखती है.

हमारे जुगाड़ू समय में कविता ज़िद कर समझौता करने, आत्मसमर्पण करने से इनकार करती है. अंत:करण, न्याय और समरसता के मुद्दों पर, सभी लोगों की समता पर उसका इसरार कई बार सूक्ष्म और जटिल होने के कारण अलक्षित जा सकता है पर वह होता ज़रूर है. आज विश्व कविता दिवस पर पर इन कुछ बातों को ध्यान में रखना जरूरी है: कविता कभी हार नहीं मानती. वह हमें यह भरोसा दिलाती रहती है कि कठिन से कठिन समय में मनुष्य बने रहना न सिर्फ़ संभव है, बल्कि ज़रूरी भी.

यह भी कि साहित्य सत्याग्रह है तो ज़्यादातर कविता के कारण ही.