राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को अगर दोनों पक्ष आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं तो किसी को भी इसमें कोई परेशानी क्यों होनी चाहिए? आखिर इस मसले के सबसे पुराने पैरोकार और बाबरी मस्जिद की सबसे लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने वाले हाशिम अंसारी भी तो यही चाहते थे. उन्होंने हिंदू धर्मगुरुओं और निर्मोही अखाड़े के प्रतिनिधियों से कई बार समझौते के प्रयास भी किये थे. हालांकि उनके प्रयास सफल नहीं हो सके थे और इस बात का मलाल उन्हें मरते दम तक रहा. लेकिन आज अगर सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में ऐसा कोई समझौता हो सकता है तो उसका स्वागत क्यों नहीं किया जाना चाहिए?

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर ने इस मामले को आपसी सहमति से सुलझाने की बात कही है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर दोनों पक्ष चाहें तो वे स्वयं भी इस मामले में मध्यस्थता करने को तैयार हैं. लेकिन न्यायालय की इस टिप्पणी के आते ही यह मामला विवादों से घिरने लगा है. इसने फिर से लोगों को दो खेमों में बांट दिया है. एक तरफ वे लोग हैं जो इस टिप्पणी का स्वागत कर रहे हैं. लेकिन इनमें अधिकतर वे हैं जो हमेशा से ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ का नारा बुलंद करते रहे हैं. दूसरी तरफ वे लोग हैं जो न्यायालय की इस टिप्पणी का विरोध कर रहे हैं. इनमें से अधिकतर को लगता है कि इस मामले में समझौते का मतलब है हिंदू पक्ष के आगे घुटने टेक देना.

संयोग से न्यायालय की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब इसे हिंदू समुदाय के पक्ष में देखने की गलती करना एक हद तक स्वाभाविक ही होगा. इसका पहला कारण तो यही है कि न्यायालय ने यह टिप्पणी भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई के दौरान की है. सुब्रमण्यम स्वामी तमाम मंचों से यह कहते रहे हैं कि ‘साल-दो-साल के अंदर किसी भी हाल में राम मंदिर वहीं बन के रहेगा जहां राम का जन्म हुआ था.’ इसलिए जब न्यायालय की हालिया टिप्पणी को वे अपनी एक उपलब्धि बताते हैं तो कई लोग इसे मंदिर निर्माण के पक्ष में आई टिप्पणी मानने लगते हैं.

दूसरा कारण है कि यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही आई है. योगी आदित्यनाथ जिस गोरक्षपीठ के प्रमुख हैं, उसकी राम मंदिर आंदोलन में अहम भूमिका रही है. खुद योगी आदित्यनाथ भी भाजपा के उन सबसे कट्टर चेहरों में से एक रहे हैं जो ‘राम मंदिर के मामले में कोई समझौता नहीं’ करने की बात कहते रहे हैं. उनके मुख्यमंत्री बनते ही राम मंदिर आंदोलन में तेजी आने के कयास भी लगाए जाने लगे थे. इसलिए कुछ लोगों को लगता है कि समझौता राम जन्मभूमि का पक्ष लेने वालों के पक्ष में जा सकता है.

अगर इस मुद्दे के सुलझ जाने से किसी को विचलित होना चाहिए तो इन्हीं लोगों को होना चाहिए. लेकिन इसके उलट ये लोग तो न्यायालय की टिप्पणी का स्वागत कर रहे हैं.  

लेकिन इन संयोगों से इतर यदि आपसी समझौते की इस सलाह को तटस्थ होकर देखा जाए तो शायद यह राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझाने का सबसे सही और व्यावहारिक उपाय हो सकता है. वरिष्ठ वक़ील और बाबरी मस्जिद एक्शन समिति से जुड़े ज़फ़रयाब जिलानी ने भी न्यायालय की इस सलाह का स्वागत किया है. एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि देश के मुख्य न्यायाधीश यदि इस मसले में मध्यस्थता करते हैं और बातचीत से यह मुद्दा सुलझ सकता है तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता.

हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब इस मुद्दे को अदालत से बाहर सुलझाने की बात कही जा रही हो. ऐसी बातें पहले भी कई बार हुई हैं लेकिन समझौते के ये प्रयास कभी किसी निर्याणक मोड़ तक नहीं पहुंच सके. साल 2014 में तो अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञान दास ने यह भी खुलासा किया था कि भाजपा के राज्यसभा सदस्य विनय कटियार और विहिप प्रमुख अशोक सिंघल के चलते अयोध्या विवाद में हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच समझौता नहीं हो सका था. महंत ज्ञान दास का कहना था कि, ‘इस मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के तीसरे दिन हाशिम अंसारी के साथ समझौते का प्रस्ताव तैयार हो गया था. विराजमान रामलला और निर्मोही अखाड़ा पक्ष, दोनों ही समर्थन देने को तैयार थे. इस प्रस्ताव पर सिर्फ हिंदू और मुस्लिम पक्ष के हस्ताक्षर होना बाकी था. लेकिन सोची-समझी साजिश के तहत विनय कटियार और सिंघल ने समझौता नहीं होने दिया.’

महंत ज्ञान दास ने आरोप लगाए थे कि कटियार और सिंघल जैसे नेता नहीं चाहते कि राम जन्मभूमि विवाद कभी सुलझे क्योंकि वे इस मसले को उलझाए रखकर अपनी राजनीतिक दुकान चलाना चाहते हैं. बिलकुल यही आरोप विश्व हिंदू परिषद्, आरएसएस और भाजपा पर भी लगते रहे हैं. ऐसे में अगर इस मुद्दे के सुलझ जाने से किसी को विचलित होना चाहिए तो इन्हीं लोगों को होना चाहिए. लेकिन इसके उलट ये लोग तो न्यायालय की टिप्पणी का स्वागत कर रहे हैं.

इस मुद्दे में हुई मध्यस्थता की कोशिशों का यदि इतिहास देखा जाए तो बाबरी के पैरोकार अक्सर समझौते के लिए तैयार दिखे हैं जबकि हिंदू संगठनों का रुख ज्यादा अड़ियल रहा है. उन्होंने कभी मुस्लिम समुदाय से मस्जिद का दावा पूरी तरह छोड़ देने की बात कही है तो कभी 84 कोसी परिक्रमा के दायरे से बाहर या फिर सरयू नदी के किनारे मस्जिद बनवाने की बात कही है. जबकि इस बार वे ऐसा नहीं कर रहे हैं.

अदालत की मध्यस्थता में यदि कोई समाधान होता है तो उन शर्तों पर ही होगा जो बाबरी मस्जिद के पैरोकारों को भी स्वीकार होंगी.  

कई लोग संसद और उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा के भारी बहुमत का भी जिक्र कर रहे हैं. इन लोगों का आरोप है कि न्यायालय से बाहर होने वाले समझौते में भाजपा या मंदिर के पैरोकारों का पक्ष इस प्रचंड बहुमत के चलते हावी रहेगा. यह आरोप पूरी तरह से निराधार लगते हैं. न्यायिक मध्यस्थता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बाबरी मस्जिद के पैरोकारों को अपनी शर्तें रखने और दूसरे पक्ष की शर्तें मानने या नकारने का उतना ही अधिकार है जितना कि दूसरे पक्ष को. इसलिए भाजपा के बहुमत के चश्मे से इस मध्यस्थता को देखने को ठीक नहीं कहा जा सकता. यहां तक कि जिन सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर मध्यस्थता का यह रास्ता खुला है, उनकी भी इसमें कहीं कोई भूमिका नहीं हो सकती.

बहुत संभव है कि पिछले प्रयासों की तरह इस बार भी अगर की जाती है तो समझौते की कोशिश किसी निष्कर्ष तक न पहुंच सके, लेकिन यह कहना सही नहीं है कि न्यायालय के बाहर यदि मामला सुलझता है तो राम मंदिर का पक्ष मजबूत और बाबरी मस्जिद का कमज़ोर हो सकता है. इस बार अदालत की मध्यस्थता में यदि कोई समाधान होता है तो उन शर्तों पर ही होगा जो बाबरी मस्जिद के पैरोकारों को भी स्वीकार होंगी.

यह भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि आज जो मामला अदालत में चल रहा है, वह बाबरी मस्जिद ढहाने का आपराधिक मामला नहीं बल्कि इस जमीन का मालिकाना हक़ तय करने का दीवानी (सिविल) मामला है. यदि यह मामला बाबरी मस्जिद गिराने के आरोप में चल रहा आपराधिक मामला होता तो इसमें न्यायालय से बाहर समझौते की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती थी. लेकिन यह पिछले दो दशक से लंबित ऐसा सिविल मामला है जिसमें एक बार उच्च न्यायालय फैसला दे भी चुका है. और लगभग सभी संबंधित पक्ष उस फैसले से असंतुष्ट होकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे हैं. ऐसे में इस मामले पर न्यायालय का यह सुझाव देना कि अदालत के बाहर इसे सुलझाने के सार्थक प्रयास किये जाएं, कहीं से भी अनुचित नहीं लगता.

अदालत सेबाहर इस मामले को सुलझाने के सुझाव काइसलिए भी स्वागत होना चाहिए क्योंकि यही इस मुद्दे का एकमात्र स्थायी समाधान हो सकता है. इसके उलट अगर इस मुद्दे को न्यायिक फैसले से सुलझाने की कोशिश होती है तो यह मामला ज्यादा समय तकलंबित रहने वाला है. क्योंकि न्यायालय का इस मामले में जो भीफैसला आएगा, कभी उसे लार्जर बेंच में चुनौती दी जाएगी तो कभी उस पर पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल होंगी. इसके अलावासमझौता इसलिए भी बेहतर विकल्प है कि इससे दो समुदायों के बीच की कटुता में कमी आने की संभावना भी निकल सकती है.