विश्व कविता दिवस की पूर्वसंध्या पर इंफाल में पहला पद्म कुमार स्मृति व्याख्यान देने का सुयोग हुआ. दुर्भाग्य से बेमौसम की बरसात हो गयी और वहां यातायात बहुत बाधित हुआ. लगभग 80-90 लोग रहे होंगे, कोरस रंगमंडल के सुघर-सुंदर परिसर में. रंगकर्मी-कवि रतन थियम ने अध्यक्षता की और मैंने अपने व्याख्यान का शीर्षक रखा: ‘कविता और दुनिया’.

जिसे हम जीवन की लय कहते हैं और जिसके बढ़ते अभाव पर विलाप करते हैं, वही कविता को दुनिया से जोड़ती है. यही लय कविता में भाषा की लय बनती है. जीवन के लय-विलय के खेल में ही कविता रची जाती है. दुनिया से कविता का रिश्ता जटिल, कई स्तरों वाला, ऐन्द्रिय और वैचारिक सभी होता है. कविता का जन्म दुनिया के प्रेम और आकर्षण से ही होता है. कविता के लिए दुनिया सिर्फ़ धरती नहीं, समय भी होती है. कविता दुनिया का उत्सव मनाती है, उसके तमाशे की गवाह होती है और उससे सवाल पूछने की जुर्रत भी करती है.

दुनिया में बढ़ती हिंसा, अत्याचार, क्रूरता और अन्याय को कविता अनदेखा नहीं करती. वह उनके बरक़्स उम्मीद और संभावना की, संवाद और सहकार की, सृजन और कल्पना की दुनिया खोजती-पाती रहती है. सत्यातीत समय और तथ्य-मुक्त माहौल में कविता सच के अल्पसंख्यक होते जाने को दर्ज़ करती है पर उसकी उपस्थिति और ज़रूरत को भूलती नहीं है.

इस समय दुनिया में लगातार तरह-तरह के ‘दूसरे’ - जातिगत, धार्मिक, भाषिक, साम्प्रदायिक, वैचारिक - गढ़े और खोजे जा रहे हैं. उन्हें नष्ट करने, हराने के उपक्रम हो रहे हैं. कविता में कोई ‘दूसरा’ नहीं होता, वह हमारे और उनके बीच के द्वैत को ध्वस्त करती रहती है. वह भिन्नता को अनदेखा नहीं करती, पर समानताएं और साझापन उसकी नज़र से कभी ओझल नहीं होते.

दुनिया बहुत सी सीमाएं बनाती रहती है - नैतिक, वैचारिक, ज्ञानात्‍मक आदि. कविता इन सीमाओं से परे जा सकने का साहस करती है. हमारे समय में अपनी व्यावसायिक विफलता से अबाधित कविता दुस्साहस की विधा है. हम यह कई बार भूल जाते हैं कि कविता स्वतंत्रता के संकेत देती है और संभावित गुलामी से हमें आगाह करती है. दशकों से कविता बाज़ार-व्यवस्था की हिंसा, अनैतिकता आदि के बारे में हमें सचेत करती आयी है.

कविता हमारी नैतिक संवेदना का विस्तार करती है; हमारे सिकुड़ते अंत:करण को जीवित-सक्रिय करने की कोशिश करती है. वह हमें समय और समयातीत से, इतिहास और अनंत से जोड़ती है. दुनिया का काम भले कविता के बिना बखूबी चले, कविता का काम दुनिया के बिना नहीं चल सकता.

विचित्र को परिचित बनाना, बने रहने की सबसे जरूरी शर्त है

यूनेस्को के अंतर्गत भाषाओं और साहित्यों का एक अंतरराष्ट्रीय फ़ेडेरेशन है जिसका सत्रहवां अधिवेशन दिल्ली में हाल ही में संपन्न हुआ. अधिवेशन की थीम थी - ‘भाषा और साहित्य में परिचित और विचित्र: दृष्टि और राजनीति’. कई देशों से विशेषज्ञ और अकादेमिक जुड़े. भारत के ज्यादातर विद्वान् अंग्रेज़ी में सोचने-विचारने वाले लोग थे जिनमें से अधिकांश भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य के ही अध्येता हैं और उनमें से बहुत कम लोग, जतन और समझ से, अपनी मातृभाषाओं का साहित्य पढ़ते या उस पर विचार करते हैं.

बहरहाल, मुझे समापन व्याख्यान देने का न्यौता था और मेरा विषय था ‘विचित्र को परिचित बनाना, भारतीय बहुलता का कलात्मक उत्सव’. यों यह बार-बार कहना ज़रूरी नहीं होना चाहिये, क्योंकि जगज़ाहिर है, कि भारत में सब कुछ बहुवचन है - धर्म, भाषा, देवता, दर्शन, वेद-पुराण, भोजन, वेशभूषा, रीति-रिवाज़ आदि. पर इस समय सारे संसार में बहुलता पर और उससे अनिवार्यतः उपजने वाली सहिष्णुता, परस्पर सहकार और समझ पर जो भयावह प्रहार हो रहे हैं उनके चलते इसे बार-बार कहते रहना ज़रूरी है.

हमारे यहां दूसरों की स्वीकृति में विभिन्नताओं का एहतराम करना (सम्मान करना) शामिल रहा है. इसी मानसिकता ने साहित्य, संगीत, ललित कलाओं और स्थापत्य, रंगमंच और नृत्य, लोककलारूपों, सिनेमा आदि में हमारी विविधता को उसकी पूरी जटिलता और जीवंतता में चरितार्थ किया है. हम यह भी जानते-मानते रहे हैं कि मानवीय अनिवार्यतः यथार्थवादी नहीं होता. उसके कई रूप संभव हैं, हमारे यहां रहे हैं.

जब हमने रससिद्धांत के अंतर्गत रौद्र और वीभत्स जैसे रसों को शामिल किया तो बहुत पहले यह मान लिया था कि मानवीय भाव-यथार्थ कुछ अवांछनीय तत्वों के, असुंदर और अवांछनीय के पड़ोस में भी होता है. यह सच्ची यथार्थ-दृष्टि थी.

भारतीय महाकाव्यों में अप्रत्याशित इतने नियमित रूप से घटित होता है कि वह सहज स्वीकार्य होता है और इतना अपरिचित नहीं लगता. हम साधारणीकरण की सर्जनात्‍मक प्रक्रिया से विचित्र को परिचित बनाते हैं.

भारत के नाटयशास्त्र को पंचम वेद कहा गया था. यह इस बात की सांस्कृतिक-बौद्धिक स्वीकृति भी थी कि साहित्य और कलाओं की अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता होती है और इसका उन्हें पूरा-पक्का अधिकार है. आधुनिक काल में ‘कर्मसौंदर्य’, ‘लोकमंगल’, ‘ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान’, ‘व्यक्तित्व की खोज’ आदि अवधारणाएं इसी स्वतंत्रता और स्वायत्तता का विस्तार हैं.

हमारे यहां साक्षरता भले बढ़ी हो, साहित्यिक निरक्षरता बढ़कर भयावह हो गयी है

राजधानी दिल्ली में उर्दू के सिलसिले से दो बड़े सालाना उत्सव होने लगे हैं - ‘जश्ने-रेख़्ता’ और ‘जश्ने-अदब’. दिल्ली में उर्दू की महान परंपरा रही है और ऐसे आयोजन उसकी याद दिलाने का काम भी करते हैं. बड़ी संख्या में इनमें उर्दू-भाषी और उर्दू-प्रेमी जमा होते हैं. इनमें बहुत सारे युवा होते हैं. दोनों में हिंदी लेखकों को भी शामिल किया जाता है.

इस बार जश्ने-अदब के एक सत्र में उर्दू कवि-आलोचक शमीम हनफ़ी कथाकार और सैयद मोहम्मद अशरफ़ के साथ मैं भी था. हमारे सत्र से पहले एक सत्र में विद्वान्-कथाकार शमसुर रहमान फ़ारूकी ने विस्तार से हमारी दास्तानों की परंपरा और उसके रसूख पर बात की. उनके अनुसार 19वीं सदी के आखि़र और 20वीं सदी की शुरुआत में उर्दू में दास्तानों के संग्रह, 40 से अधिक ज़िल्दों में प्रकाशित हुए. उनमें लगभग ढाई करोड़ शब्दों का उपयोग हुआ था.

दास्तानें सुनने के लिए रची जाती थीं और उनमें मौक़े के मुताबिक बदलाव होते रहते थे. ज़्यादातर दास्तानें लोगों को पता होती थीं और अकसर दास्तानगो आगे क्या होने जा रहा था, यह बता भी देता था. कई तरह के दुहराव, भटकाव भी उनमें होते थे. चित्र-विचित्र, सर्वथा प्रत्याशित, निपट अप्रत्याशित उसमें लगातार घटता रहता था. वे यथार्थ को सिर्फ़ चित्रित नहीं, कल्पित भी करती थीं. उनमें कई बार एक बिल्कुल नामुमकिन सी दुनिया बनायी जाती थी और कल्पना का यह खेल लोगों को पसंद आता था. उसमें लोग उड़ते थे, पानी पर चलते थे और जब-तब ग़ायब भी हो जाते थे. कल्पना का ऐसा खिलवाड़, ऐसा जादू शायद ही किसी और विधा में रहे होंगे. दास्तानें, देशकाल की सीमाएं, भूगोल और इतिहास आसानी से पार कर लेती थीं.

हमारा सत्र ‘अदब समाज और जिदगी’ पर था. निहायत घिसा-पिटा विषय. हम कई दशकों से इस पर एक असमाप्य बहस करते रहे हैं. मैंने फिर याद दिलाने की कोशिश की कि समाज साहित्य नहीं लिखता, व्यक्ति ही लिखते हैं. सभी लेखक बिना ऐसा दावा किये अपने को, अपनी जिंदगी, अपने समय और समाज को लिखते हैं. साहित्य वह चीज़ भी है जिससे समाज अपने समाज होने का अहसास पाता है. हमारी बदक़िस्मती है कि, ख़ासकर उत्तर भारत में, समाज का ज़्यादातर हिस्सा साहित्य से मुंहफेरे रहता आया है. वहां साक्षरता भले बढ़ी हो साहित्यिक निरक्षरता तो बढ़कर भयावह हो गयी है. साहित्य समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी भरसक निभाता है पर यहां समाज साहित्य के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी बहुत कम निभाता है.

साहित्य अपने अंतरतम में जानता है कि सचाई और समय, जिंदगी और समाज हमेशा उससे बड़े और जटिल होते हैं. साहित्य का अपना समाज और जिंदगी भी होते हैं जिसमें लेखक और कृतियां होती हैं और उनमें संवाद, बहस आदि होते रहते हैं. ऐसे समय आते हैं जब समाज भटकने लगता है तो साहित्य उसका प्रतिपक्ष बन जाता है. आज हिंदी साहित्य हिंदी समाज का सच्चा प्रतिपक्ष है. उर्दू साहित्य भी.