उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या जाने वाले हैं. अयोध्या में योगी का एजेंडा क्या होगा इस पर अटकलों का बाज़ार गर्म है. सुप्रीम कोर्ट ने बातचीत से राम मंदिर विवाद सुलझाने के लिए 31 मार्च तक का वक्त मुकर्रर किया है. कुछ लोग कह रहे हैं कि योगी बातचीत का रास्ता निकालने के लिए अयोध्या जा रहे हैं, कुछ लोग कह रहे हैं कि वे साधु-संतों का मन टटोलने अयोध्या जाएंगे.

राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष मंहत नृत्य गोपाल दास ने दावा किया है कि योगी आदित्यनाथ ने उन्हें अयोध्या आने की खबर भिजवाई है और उन्हें उम्मीद है कि दिल्ली में नरेंद्र मोदी और लखनऊ में योगी राम मंदिर बनाने का रास्ता निकालेंगे. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण ही चल रहे विवाद का एकमात्र हल है. प्रधानमंत्री मोदी और योगी आदित्यनाथ को आगे आकर मंदिर निर्माण का कार्य करवाना चाहिए. बात बहुत हो गई अब मोदी सरकार को संसद से कानून बनवाकर मंदिर बनाना चाहिए.

राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष की ये बातें सुनकर लगता है कि वे बातचीत के मूड में नहीं है और सुप्रीम कोर्ट की तरफ से की गई पहल में अड़ियल रुख ही अपनाएंगे. राम मंदिर मसले के इस वक्त कुछ और पक्ष भी हैं. इस केस के एक पक्षकार हैं, हाजी महबूब और हाशिम अंसारी के बेटे मोहम्मद इकबाल अंसारी. ये बातचीत के लिए तैयार दिख रहे हैं लेकिन इनकी शर्त बेहद कड़ी है. ये दोनों कहते हैं कि अगर मोदी मध्यस्थता करेंगे तभी बातचीत की टेबल पर आएंगे. प्रधानमंत्री खुद बातचीत बढाएं या फिर उनके स्तर पर कोई मध्यस्थ नियुक्त हो.

राम मंदिर मामले में निर्मोही अखाड़ा भी एक पक्ष है. निर्मोही अखाड़ा के महंत रामदास की बात राम जन्मभूमि न्यास से अलग और मुस्लिम पक्षकारों से ज्यादा मेल खाती है. महंत रामदास ने मीडिया से कहा कि प्रधानमंत्री मोदी किसी मध्यस्थ को नियुक्त करें और बातचीत में सिर्फ राम मंदिर मामले के पक्षकार शामिल हों कोई नेता नहीं.

लेकिन सच्चाई 31 मार्च तक इस पर फैसला करने का फैसला नेताओं के ही पाले में है. दिल्ली में प्रधानमंत्री के करीबी नेताओं से पत्रकारों ने पूछा, क्या केंद्र सरकार 31 मार्च से पहले राम मंदिर मसले में किसी भी तरह की पहल करेगी. उन नेताओं के रुख से लगा कि केंद्र सरकार अभी इंतजार करना चाहती है. क्योंकि फिलहाल केंद्र सरकार को भी बातचीत का कोई रास्ता खुलता दिखाई नहीं देता. इसलिए राम मंदिर मामले के जो पक्षकार सीधे प्रधानमंत्री के दखल की मांग कर रहे हैं उनकी बात को केद्र सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है.

सत्ता के गलियारों में पैठ रखने वाले एक सूत्र बताते हैं कि इसकी संभावना बहुत कम है कि 31 मार्च से पहले कोई बड़ी खबर मिले. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के ज्यादातर सदस्य अब भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, पर्सनल लॉ बोर्ड के जफरयाब जिलानी ने तो बार-बार कहा कि बातचीत से कोई रास्ता नहीं निकलेगा, अदालत को ही फैसला सुनाना होगा. प्रधानमंत्री के स्तर पर पहले नरसिंह राव सरकार और चंद्रशेखर सरकार के वक्त भी बात हुई थी. लेकिन फैसला नहीं हो पाया. मोदी सरकार उस स्थिति से बचना चाहती है.

सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री के स्तर पर दखल तभी दिया जाएगा जब उस दखल की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी होगी. योगी आदित्यनाथ का अयोध्या दौरा उसी पृष्ठभूमि को तैयार करने का शुरुआती कदम माना जा सकता है.