क्या हर भूतपूर्व सुपरस्टार का हीरो की भूमिका में ही ‘कमबैक’ करना जरूरी होता है? इस तरह का ‘कमबैक’ क्या एक ऐसी नियति है, जिसे नियत समय पर ‘करने’ का भार हर सितारे को उठाना ही होता है? या फिर यह एक ऐसी टीस है जो गुजरे जमाने के जाने-पहचाने चेहरों को हर आने वाले समय के सिनेमा में अपनी सीट तलाशने को मजबूर करती है?

हमारी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री इस मिजाज के सवालों के जवाब सिर्फ हां में देने में यकीन रखती है. सर्वविदित भी है कि साठ से लेकर सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में फिल्मों में सक्रिय रहने वाले ज्यादातर सुपरसितारों ने शिखर से उतरने के कुछ साल बाद दोबारा फिल्मों में बतौर हीरो कमबैक करने की कोशिश की ही की है. कइयों ने असफल कमबैक के बाद भी तिबारा-चौबारा कोशिशें की हैं और केंद्रीय भूमिकाओं का मोह मरते दम तक नहीं छोड़ा है. याद कीजिए, स्टारडम की इसी कभी न मिटने वाली भूख-प्यास की वजह से हमने राजेश खन्ना जैसे अमर अभिनेता को जिंदगी के अंतिम वर्षों में सिकुड़कर आधे रह गए शरीर और हताश चेहरे के साथ ‘रघुकुल रीत सदा चलि आई’ (2008) जैसे दूरदर्शन पर प्रचारित होने वाले औने धारावाहिक और एक पंखे के पौने विज्ञापन करते देखा था.

Play

यह भी होता है कि कमबैक करने वाला हर भूतपूर्व सितारा अमिताभ बच्चन जैसी दूसरी पारी का ख्वाहिशमंद होता है. लेकिन यह ज्यादा होता है कि इन सितारों को सफलता की जगह ‘बच्चन जैसा पचपन’ मिलता है. यह क्या होता है बताने से पहले बता दें कि इससे जूझने के बाद कमबैक को उत्साहित ज्यादातर सितारे कभी उबर नहीं पाते हैं और लुप्त हो जाने से पहले दोयम दर्जे की फिल्मों का रेला लगा देते हैं.

बच्चन के जीवन को देर से फॉलो करने वालों के लिए - पचपन वह उम्र थी, जब अमिताभ बच्चन ने फिल्मों में कमबैक किया था. ‘मृत्युदाता’ नामक उस फिल्म से जो महाफ्लॉप साबित हुई थी. बात सन् 1997 की है जिस साल उनकी निर्माण कंपनी एबीसीएल पर करोड़ों का कर्जा भी चढ़ा था और बाद के वर्षों में ‘बड़े मियां छोटे मियां’ से लेकर ‘सूर्यवंशम’, ‘लाल बादशाह’ व ‘हिंदुस्तान की कसम’ जैसी बेकार फिल्मों ने उनका कद ऊंचा भी नहीं होने दिया था. सभी जगहों पर बच्चन की वापसी को लेकर हंसी-ठिठोली हुआ करती थी लेकिन लगातार संघर्षों के बाद साल 2000 आया, और केबीसी की टेक लेकर अमिताभ बच्चन ने सभी पूर्वानुमानों को गलत साबित कर दिया. तब से लेकर अब तक वे ऐसे महानायक का रूप धर चुके हैं जिनके तिहत्तर वर्ष का होने पर भी हम उनके वैसे ही गुणगान कर रहे हैं जैसे तब किया करते थे जब हम बच्चे हुआ करते थे!

गोविंदा भी अब पचपन में दो कम के हैं. ‘पार्टनर’ से पहली बार 2007 में कमबैक करने के बाद उन्होंने पिछले ही हफ्ते ‘आ गया हीरो’ नामक उस फिल्म से दूसरी बार कमबैक किया है, जिसने पूरे एक हफ्ते में पूरे एक ही करोड़ कमाए हैं और जो अब तक ज्यादातर सिनेमाघरों से तो उतर गई है, लेकिन हमारे विचलित मन से अभी तक नहीं उतर पाई है. तीसरी डिग्री की तमाम तरह की प्रताड़नाएं देने के अलावा यह फिल्म गुरमीत राम रहीम सिंह जी इंसान के सिनेमा की भी याद दिलाती है और गोविंदा द्वारा खुद अपनी ही की गई एक पैरोडी ज्यादा लगती है. अंग्रेजी में इस प्रकार की आत्ममुग्धता को ‘सेल्फ-पैरोडी’ कहा जाता है और साहित्य से लेकर हॉलीवुड की कई फिल्मों तक की आलोचना करते वक्त इस टर्म को उपयोग होता रहा है. उन लेखकों या कलाकारों के लिए, जो अपने काम को इस कदर दोहराने लगते हैं कि खुद ही खुद का मजाक उड़ाते प्रतीत होते हैं.

‘आ गया हीरो’ में गोविंदा के अभिनय की हर उस मुद्रा को परदा दिया गया है जिसके लिए वे 90 के दशक में मशहूर थे. उनकी संवाद अदायगी से लेकर कॉमिक टायमिंग तक, नाच से लेकर एक्शन तक और मेलोड्रामा से लेकर ऊट-पटांग कहानी तक. लेकिन इन सारी चीजों का आपस में कोई समन्वयन नहीं है और आपके नयन हर क्षण गोविंदा पर ही टिके रहें, चाहे वे कुछ भी करते रहें, यही इस फिल्म की चाहत है. गोविंदा की एक मशहूर उक्ति है जो वे अक्सर अपने गुजरे स्टारडम को याद करते वक्त साक्षात्कारों में बड़े गुरूर के साथ दोहराते हैं, ‘मेरी फिल्मों में कहानी कहां होती थी...जो होता था मैं होता था’. देखने वाले की बदकिस्मती देखिए, ‘आ गया हीरो’ में वो अति का प्रतिभावान ‘मैं’ भी नहीं है. जो मैं है, वो अति की आत्ममुग्धता में डूबा रहने वाला मैं है.

स्टारडम ने गोविंदा को काफी पहले आत्ममुग्ध बना दिया था, यह तथ्य सभी जानते हैं. ठीक वैसे ही जानते हैं, जैसे ये जानते रहे हैं कि राजेश खन्ना को भी इक सैलाब की तरह आकर भिगो देने वाली स्टारडम ने अति का आत्ममुग्ध बनाया था. ‘आ गया हीरो’ में गोविंदा हर फ्रेम में आते हैं, ताबड़तोड़ संवाद बोलते हैं, और हर उस जगह भी बोलते हैं जहां नहीं बोलना जरूरी होता है. अपनी चिरपरिचित शैली में नाचते हैं और इतना ज्यादा नाचते हैं कि आपको नजर आने लगता है - और शायद यही वे चाहते भी हैं - कि सलमान खान जिस तरह के डांस मूव्ज की वजह से आज लोकप्रिय हैं, उस तरह की थिरकन गोविंदा की ही देन हैं. फिल्म में एक गुफा भी है जिसका दरवाजा ऊपर की तरफ खुलता है और एक स्पेशल प्लेन है जो उस गुफा में आता-जाता रहता है. कम्प्यूटर कारीगरी के अलावा कई दूसरे एक्शन-दृश्य भी ऐसे ही हैं कि उन्हें देखकर गुरमीत राम रहीम सिंह जी इंसान की नयी फिल्में याद आती हैं और उनकी ही तरह गोविंदा को भी ‘आ गया हीरो’ में किसी पटकथा और निर्देशक की जरूर पड़ी हो, ऐसा फिल्म में तो नजर नहीं ही आता है.

‘आ गया हीरो’ देखकर यह भी समझ आता है कि गोविंदा अभी भी पुराने वक्त में ही जी रहे हैं. उन्हें अंदाजा ही नहीं है कि इस समय हवा किस ओर बह रही है. उनके लिए तो हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम काल अभी भी 90 का दशक ही है! तभी वर्तमान समय की इस फिल्म में ज्यादातर खलनायक नेता हैं और वे 90 के दशक की फिल्मों की तरह अभी भी सफेद टोपी, सफेद कुर्ता-पाजामा और नेहरू जैकेट पहनते हैं. नेताओं की स्टाइल कब की बदल चुकी है, क्या इसकी खबर गोविंदा को नहीं है? अलग वेशभूषा पहनने वाला निजाम भी आ चुका है, क्या इसकी भी खबर उन्हें नहीं है? फिल्म में संवाद भी 90 के दशक की नाटकीयता लिए हुए हैं और ‘आंखें नीची करके बात कर!’ और ‘जिनके पेट भरे होते हैं…’ वाले स्तर के हैं. पुलिस वाला गुंडा की तर्ज पर नायक अभी भी सारे सिस्टम से अकेला लड़ रहा है और उसकी कहानी में आज भी बलात्कार का महत्वपूर्ण स्थान है और गानों का सौंदर्य रंगीन मटकों के बिना अधूरा है.

फिल्म में लड़कियों को ‘माल’ बोलने वाले खलनायक भी हैं, बालकनियों से कूद कर जान देने वाली अबलाएं भी, और नायिकाओं को लाइन मारने के तुरंत बाद कूल्हे मटकाकर गीत गाने वाला नायक भी. साथ में एक बाइक है, जिसे टशन के साथ गोविंदा चलाते हैं और इस बाइक में सीट नहीं होती, उसकी जगह एक अध-नग्न लड़की का बुत बिछा होता है. इस शर्मनाक सीन के वक्त आप सोचते हैं, और फिल्म खत्म होने के कई दिनों बाद भी, कि सच में गोविंदा को आज के समय की थाह बिलकुल नहीं है. उनकी ही तरह 90 के दशक की फिल्मों में यही सब करके तालियां पाने वाले सुपरस्टार आजकल सोशल मीडिया पर महिला सुरक्षा और नारीवाद से जुड़े प्रवचन देकर अपनी कूल छवियां गढ़ रहे हैं, लेकिन गुजरे वक्त की गिरफ्त में जीवन जीने वाले गोविंदा इतने आत्ममुग्ध हैं कि ये पैंतरे भी नहीं सीख रहे हैं.

अपनी लेगेसी की चिंता करना वे सीख जाएं तो बेहतर होगा. उनका नाम आज भी लोगों के जेहन में अकल्पनीय रूप से प्रतिभाशाली उस अभिनेता की तस्वीर उकेर देता है जिसने दर्जनों फिल्मों में उन्हें पुरजोर हास्य का आनंद दिया था. एक ऐसा अभिनेता जिसकी कॉमिक टाइमिंग की झलक भी अगर दुनिया को किसी नए एक्टर में नजर आने लगती है तो उसे ‘अगला गोविंदा’ घोषित करने की उन्हें आतुरता रहती है. अस्सी-नब्बे के दशक के सिनेमा पर पले-बढ़े दर्शक आज भी उन्हें ससम्मान याद करते हैं और गोविंदा के करिश्मे को नहीं समझ पाने वाले नौजवानों को तफ्सील से बताते हैं कि अगर एक जमाने में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना के दम पर किसी भी तरह की कहानी पर फिल्में चल जाया करतीं थीं और आज ऐसा सिर्फ सलमान खान कर सकते हैं, तो याद रखो बालको, नब्बे के दशक में यह करतब गोविंदा ने अनेकों बार अंजाम दिया था!

गोविंदा को ‘आ गया हीरो’ जैसी फिल्मों से इस लेगेसी पर बट्टा लगाने की जरूरत बिलकुल नहीं है. एक जमाना था जब सफलता उन्हें साष्टांग लेटकर दंडवत करती थी, लेकिन अब जब वो उठकर चली गई है तो गोविंदा को भी उसकी याद में देवदास बने रहने की जरूरत नहीं है!

वजनी केरेक्टर रोल्स ढूंढने की जरूरत है, और चिरयुवा बने रहने वाले हीरो की जगह, मिस्टर बच्चन से सीख लेकर अपनी प्रतिभा को सही दिशा देने की जरूरत है. है कि नहीं?