चीन में पिछले महीने मोबाइल कंपनियों की ‘प्रोग्रेस रिपोर्ट’ जारी हुई है. अंतरराष्ट्रीय रिसर्च कंपनी आईडीसी द्वारा जारी की गई साल 2016 की इस रिपोर्ट ने सभी को चौंका दिया. चीन में तकनीक के क्षेत्र में पिछले लगभग एक दशक से ऐपल और दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग का बोलबाला था. लेकिन इस रिपोर्ट की मानें तो चीन में इन दोनों का ही एकछत्र राज अब खत्म हो गया है. इसके मुताबिक ऐपल की बिक्री में पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी गिरावट आई है और वह चौथे नंबर पर पहुंच गई है. सैमसंग का हाल तो इससे भी ज्यादा बुरा रहा है. वह शीर्ष की पांच बड़ी मोबाइल कंपनियों में भी जगह नहीं बना पाई है. साल 2014 में चीन में छह करोड़ स्मार्टफोन बेचने वाली और ‘चीन की ऐपल’ कही जाने वाली शाओमी मोबाइल कारपोरेशन का ग्राफ भी तेजी से घटा है. बिक्री के मामले में वह पांचवें स्थान रही है.

इन दिग्गज मोबाइल कंपनियों की बुरी स्थिति ने तो सभी को चौंकाया ही है लेकिन इन्हें पीछे छोड़ पहले पायदान पर काबिज होने वाली कंपनी का नाम भी कम हैरान करने वाला नहीं हैं. पहले पायदान पर चीन की मोबाइल कंपनी ओप्पो है. दूसरे और तीसरे नंबर पर ह्वावे और वीवो मोबाइल ने जगह बनाई है. ओप्पो और वीवो की सफलता चौंकाने वाली इसलिए है क्योंकि दो साल पहले तक ये चीन की शीर्ष पांच कंपनियों में भी शामिल नहीं थीं. आईडीसी की रिपोर्ट के अनुसार चीन में इन दोनों की बिक्री का ग्राफ पिछले करीब डेढ़ साल से तेजी पकड़ रहा था और 2016 के तीसरी और चौथी तिमाही में तो इनकी बिक्री में जबरदस्त उछाल आया है.

रिपोर्ट के मुताबिक ओप्पो और वीवो दोनों की बिक्री को मिलाकर देखें तो इन्होंने बीते साल चीन में बेचे गए कुल स्मार्टफोनों के 35 फीसदी हिस्से पर अपना कब्जा जमाया है. ओप्पो ने साल 2015 में देश में करीब 3.5 करोड़ मोबाइल बेचे थे जबकि, 2016 में यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज करते हुए 7.84 करोड़ तक पहुंच गया. इस दौरान वीवो की बिक्री में भी करीब दोगुने का ही इजाफा हुआ है. आईडीसी के मुताबिक 2015 में चीन में 59 बिलियन डॉलर यानी करीब 3800 अरब रुपए की कुल बिक्री करने वाली ऐपल के आईफोन की बिक्री में 23 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है जिससे 2016 में चीनी बाजार में ऐपल की हिस्सेदारी घटकर 9.6 प्रतिशत रह गई है. सैमसंग मोबाइल के मामले में यह आंकड़ा पांच से सात प्रतिशत के बीच है.

सवाल उठता है कि ओप्पो और वीवो जैसी नई कंपनियां कैसे ऐपल जैसी कंपनी को भी मीलों पीछे छोड़ने में कामयाब हो गईं. भले ही यह रातों रात मिली कामयाबी जैसा दिखता हो लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है.

छोटे शहरों पर सबसे ज्यादा ध्यान

पिछले कुछ सालों में अलीबाबा और अमेजन जैसी ऑनलाइन रीटेलर कंपनियां आने के बाद से लगभग सभी मोबाइल कंपनियों ने अपनी प्राथमिकता में बड़ा बदलाव किया है. ऐपल, मोटोरोला, सैमसंग और शाओमी सहित लगभग सभी कंपनियां केवल ऑनलाइन बिक्री पर ध्यान दे रही हैं. 2011 में आई शाओमी ने चीन में सबसे ज्यादा मोबाइल ऑनलाइन ही बेचे हैं और इसीलिए वह ऐपल जैसी कंपनी को टक्कर देती नजर आई. चीन में मार्केटिंग से जुड़े कुछ जानकार कहते हैं कि ऑनलाइन बिक्री की दौड़ से इन मोबाइल कंपनियों ने बड़े शहरों में तो जगह बना ली लेकिन, इससे छोटे शहरों में उनकी जगह खो गई.

आईडीसी से जुड़ी एक विश्लेषक जिन डी एक साक्षात्कार में बताती हैं कि ओप्पो और वीवो ने इस चीज को सबसे पहले समझ लिया और उन्होंने अपना पूरा ध्यान इस खाली हुई जगह को भरने में लगा दिया. उनके मुताबिक चीन की मशहूर कंपनी बीबीके इलेक्ट्रॉनिक्स की ये दोनों सब्सिडेयरी कंपनियां भी लंबे समय से ऑनलाइन सेल पर ही जोर दे रही थीं. लेकिन, जब इन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए छोटे शहरों और गांवों पर जोर दिया तब ही इन्हें कामयाबी मिली. जानकार बताते हैं कि इन कंपनियों की इस रणनीति के पीछे चीन के बड़े उद्द्योगपति और बीबीके इलेक्ट्रॉनिक्स के फाउंडर सीईओ डोन यंग पिंग का दिमाग है. डोन यंग जिन्हें चीन का वारेन बफ़ेट कहा जाता है, हमेशा कहते रहे हैं, ‘हमें ग्रामीण ग्राहकों के खर्च करने की ताकत को समझने और उसका इस्तेमाल करने की जरूरत है.’

आज ओप्पो के पूरे चीन में करीब ढाई लाख से ज्यादा स्टोर हैं. यह आंकड़ा मशहूर बर्गर कंपनी मैक-डोनाल्ड के पूरी दुनिया में स्थित स्टोर्स से करीब पांच गुना अधिक है. यही स्थिति वीवो की भी है जिसके चीन में करीब डेढ़ लाख स्टोर हैं. वीवो और ओप्पो दोनों के ही अधिकारी कहते हैं कि चीन में उनके 90 फीसदी से ज्यादा मोबाइल इन्हीं लोकल स्टोर्स के द्वारा बेचे जाते हैं. चीन में अगर ऐपल के ऐसे ही स्टोर्स की बात करें तो इनकी संख्या काफी कम (मात्र 40) है और ये भी शंघाई और बीजिंग जैसे बड़े शहरों में हैं.

डीलरों को ज्यादा मुनाफा

चीन के छोटे से एक कस्बे मियोशिया में एक मोबाइल स्टोर की मालिक चेंग शियोनिंग ब्लूमबर्ग डॉट कॉम से बातचीत में कहती हैं कि इस समय सबसे ज्यादा मुनाफा उन्हें ओप्पो और वीवो के मोबाइल बेचने से होता है. साथ ही ये दोनों कंपनियां हर तिमाही में उनके द्वारा की गई कुल बिक्री के आधार पर उन्हें कुछ न कुछ रकम बोनस के रूप में भी देती हैं. वे कहती हैं कि ओप्पो और वीवो के कम कीमत वाले स्मार्टफोन पर मुनाफा 40 युआन (375 रुपए) तक मिलता है और महंगे मोबाइलों के मामले में यह बढ़कर 200 युआन (1800 रुपए) तक पहुंच जाता है. उनके मुताबिक दूसरी कंपनियों ने उन्हें इतना ज्यादा मुनाफा कभी नहीं दिया. शियोनिंग के मुताबिक वे खुद यही चाहती हैं कि उनकी दुकान से सबसे ज्यादा स्मार्टफोन ओप्पो और वीवो के ही बिकें.

ओप्पो की मार्केटिंग टीम के अधिकारी भी मानते हैं कि दुकानदारों को बड़ा मुनाफा देने से कंपनी को बहुत ज्यादा फायदा हो रहा है. आज हर दुकानदार ज्यादा मुनाफा कमाने की वजह से ग्राहक को सबसे पहले ओप्पो का ही मोबाइल दिखाता है और खुद उस पर इसे खरीदने के लिए जोर भी डालता है. ज्यादा मुनाफा मिलने के कारण दुकानदारों को मोल भाव करने में भी आसानी होती है.

जबरदस्त मार्केटिंग

एशिया में मार्केटिंग के विशेषज्ञ निकोल पेंग एक साक्षात्कार में कहते हैं कि भारत और चीन में अगर किसी कंपनी को निचले, मध्यमवर्ग या ग्रामीण इलाकों के ग्राहकों में अपनी पहुंच बनानी है तो उसे मार्केटिंग खासकर टीवी और अखबार के ऐड पर विशेष ध्यान देना होगा. वे कहते हैं कि ये तबके टीवी ऐड से काफी ज्यादा प्रभावित होते हैं और ऐसा करने से इनमें किसी उत्पाद के प्रति विश्वास बनाना काफी आसान हो जाता है. पेंग के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्रों में फोकस कर रही ओप्पो और वीवो दोनों के ही रणनीतिकार इस बात को अच्छे से जानते हैं और इसीलिए उन्होंने टीवी ऐड पर विशेष ध्यान दिया है.

भारत के कुछ व्यवसायिक पत्रकार कहते हैं कि भारत में भी पैर ज़माने की कोशिश में लगी ये दोनों कंपनियां इसी तरह की रणनीति यहां भी अपना रही हैं. ये दोनों छोटे शहरों पर फोकस कर रही हैं और इसीलिए मार्केटिंग पर बड़ी रकम खर्च कर रही हैं. भारत में जहां पिछले साल वीवो ने बड़ी कीमत चुकाकर इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रायोजन अधिकार हासिल किए. वहीँ हाल ही में ओप्पो सभी को चौंकाते हुए भारतीय क्रिकेट टीम की नई प्रायोजक बन गई. करीब साल भर पहले भारत में सक्रिय हुई ओप्पो ने रिकॉर्ड 1079 करोड़ रुपये में पांच साल के लिए ये प्रायोजन अधिकार हासिल किए हैं. गौर करने वाली बात यह भी है कि इस दौड़ में उसका मुकाबला हमवतन कंपनी वीवो से ही था जिसने 768 करोड़ रुपये की दूसरी सबसे बड़ी बोली लगाई थी.

गुणवत्ता पर विशेष ध्यान

चीन में बने उत्पादों की गुणवत्ता हमेशा ही सवालों घेरे में रही है. यही वजह है कि चीन में ही कोई चीनी कंपनी ऐपल और सैमसंग के सामने टिक नहीं पाई. शाओमी ने सबसे पहले इस मोर्चे पर बड़ा बदलाव किया. उसने कम कीमत के साथ आईफोन के स्तर की गुणवत्ता देने पर फोकस किया. जानकार कहते हैं कि ओप्पो और वीवो भी इसी राह पर चल रही हैं.

ये लोग बताते हैं कि ओप्पो तो गुणवत्ता को लेकर इतनी ज्यादा गंभीर है कि वह अपने सबसे सस्ते स्मार्टफोन की टेस्टिंग भी उच्च स्तर पर करवाती है. इनके मुताबिक ऐपल अपने किसी भी आईफोन को बाजार में उतारने से पहले एक विशेष तरह की टेस्टिंग करवाती है जिसमें स्मार्टफोन को आम टेस्टिंग के बाद भी 130 तरह के अलग-अलग टेस्ट गुजरना पड़ता है. ये लोग कहते हैं कि ओप्पो चीन की पहली ऐसी कंपनी है जिसने सस्ते स्मार्टफोन के मामले में भी इस प्रक्रिया को अपनाया है.

ओप्पो में सेल्स विभाग के उप प्रमुख एलेन वू एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘कंपनी नंबर एक पर है या दो पर, वे अभी इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं, इस समय हमारा पूरा ध्यान प्रतिदिन बदलते बाजार, उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाने और लोगों में कंपनी के प्रति और विश्वास कायम करने पर है.’

बिक्री के आंकड़े बता रहे हैं कि उनकी यह कवायद रंग ला रही है.