इरफान खान पैसे कम खर्च करते हैं. अपनी उपलब्धियों का नगाड़ा बजाने के लिए लाव-लश्कर नहीं रखते, इसलिए दुनिया को विदेश गईं प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण के हर दिन की खबर तो तुरंत लग जाती है, लेकिन विश्व सिनेमा में बहुआयामी किरदारों के दम पर अपनी अलग और दमदार पहचान बनाने में जुटे इरफान खान के कार्यों को वो सराहना नहीं मिलती, जिसके हकदार वे प्रियंका और दीपिका से ज्यादा हैं.

सच है कि हॉलीवुड में प्रियंका और दीपिका ने वह सबकुछ हासिल किया है - या करने जा रही हैं - जो इससे पहले भारतीय कलाकारों के नसीब में नहीं रहा. हॉलीवुड की फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाना. इसीलिए उनकी सफलताओं को उत्सव की तरह हिंदुस्तान में सेलिब्रेट किया जाता है और इस तरह की निरर्थक बातें भी हमारे राष्ट्रीय डिस्कोर्स का हिस्सा बन जाती हैं कि ऑस्कर पुरस्कारों की रात प्रियंका चोपड़ा ने तीन मिलियन डॉलर (एक मिलियन डॉलर यानी तकरीबन साढ़े छह करोड़ रुपये) की पोशाक व पांच मिलियन डॉलर के हीरे के झुमके पहने, और ऑस्कर्स की आफ्टर-पार्टी में दीपिका पादुकोण ने जो ड्रेस पहनी उसे वे 2012 में भी एक बार पहन चुकी थीं!

अमेरिकी धारावाहिक में मुख्य भूमिका निभाने से लेकर वहां की मसाला फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने तक, प्रियंका और दीपिका ने वह सब बेहद तुरत-फुरत पा लिया है जिसको दशकों पहले से विदेशी फिल्मों का हिस्सा रहे सईद जाफरी, रोशन सेठ से लेकर आज के समय के अनुपम खेर, अनिल कपूर व स्वर्गीय ओम पुरी जैसे बेहद प्रतिभाशाली भारतीय कलाकार कभी हासिल नहीं कर पाए. और इसके लिए दोनों का ही गुणगान होना आवश्यक है.

इस गान के समय लेकिन, गुणों के स्तर को भी ध्यान में रखना जरूरी है. यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि ‘ट्रिपल एक्स : द रिटर्न ऑफ जेंडर केज’ और आने वाली ‘बेवॉच’ जैसी फिल्में अमेरिकियों की नजर में भी कायदे का सिनेमा नहीं है. ये ऐसी फिल्में हैं जिसमें नायिकाओं की उपस्थिति (‘बेवॉच’ के संदर्भ में खलनायिका) नगण्य होती है और पारंपरिक दर्शक सिर्फ उन बलिष्ठ भुजाधारी मर्दों के लिए मकई के फूले हुए दानों का स्वाद लेते हुए मनोरंजन लेने थियेटर जाते हैं, जिसके हिंदुस्तानी संस्करण सालों से श्रीमान सलमान खान रहे हैं!

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प्रियंका के ‘क्वांटिको’ को भी अमेरिकी जनता वैसे ही देखती है जैसे टेलीविजन देखने वाले पारंपरिक दर्शक रोजमर्रा के सुस्त धारावाहिकों को देखते हैं. यानी जिस तरह अमेरिकी, ‘अमेरिकन आइडियल’ देखते हैं – या फिर हम सास-बहू, नागिन और इंडियन आइडल देखते हैं – वैसे ही ‘क्वांटिको’ को देखा जाता है. गुणवत्ता की कसौटी पर यह सीरीज नए मिजाज की अनेकों अमेरिकी टेलीविजन या वेब सीरीज के आगे कहीं नहीं ठहरती और ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’, ‘नार्कोस’, ‘ब्लैक मिरर’, ‘द अमेरिकन्स’, ‘द ओए’, ‘द नाइट ऑफ’ जैसी बेहद दर्शनीय सीरीज के दर्शक ‘क्वांटिको’ के पहले एपीसोड से लेकर अब तक उसे सस्ता मनोरंजन ही मानते आए हैं.

और आज के समय में दर्शक अच्छा सिनेमा व टीवी सीरीज छोड़कर सस्ता मनोरंजन देखने को मजबूर हों, इतनी कम इंटरनेट स्पीड अब किसी की रही नहीं है!

‘ट्रिपल एक्स…’ को भी हिंदुस्तानियों ने दीपिका पादुकोण की वजह से ही बर्दाश्त किया था. एक घोर फालतू फिल्म में ढूंढ़-ढूंढ़कर अच्छाइयां निकाली थीं और जब नहीं निकलीं तो दीपिका पादुकोण की प्रभावी स्क्रीन प्रजेंस की ही तारीफों से दिल को समझाया था. यही कि इस बेजान फिल्म से हॉलीवुड में डेब्यू करने के दीपिका के गलत फैसले के पीछे छिपी मंशा सही होगी और आने वाले वक्त में वे भी हॉलीवुड व विश्व सिनेमा में सशक्त किरदारों वाली बेहतरीन फिल्में करेंगी.

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मई में रिलीज होने वाली प्रियंका चोपड़ा की ‘बेवॉच’ के साथ भी यही होगा, जिसमें वे ग्रे-शेड का किरदार निभा रही हैं और आपको पहले से मालूम है कि फिल्म ड्वेन जॉनसन और जैक एफ्रॉन पर ही अपना ज्यादातर ध्यान केंद्रित करने वाली है. तब भी हिंदुस्तान उनकी छिपी हुई ऐसी ही मंशा की वजह से ‘बेवॉच’ देखेगा और जब देखने में तकलीफ होगी तब दिल को समझाएगा कि प्रियंका की अगली हॉलीवुड फिल्म जरूर बेहतरीन होगी.

इरफान खान के साथ अच्छा यह है कि उन्हें लेकर हमें इस तरह के मुगालते पालने की जरूरत नहीं होती. वे बिना ढोल-नगाड़ों की मदद लिए हॉलीवुड और विश्व सिनेमा में आलातरीन काम करते जाते हैं और मुख्य भूमिका हो या कम मुख्य भूमिका, उनका दैदीप्यमान अभिनय हॉलीवुड से लेकर विश्व सिनेमा तक पर अपनी छाप छोड़ता जाता है. ‘नेमसेक’ व ‘लाइफ ऑफ पाई’ के दौरान हम यह देख ही चुके हैं और ‘टोक्यो ट्रायल’ नाम की एक नयी मिनी सीरीज देखते वक्त भी यही देखते हैं.

जापान, नीदरलैंड और कनाडा की कंपनियों का साथ लेकर इंग्लिश भाषी ‘टोक्यो ट्रायल’ का निर्माण नेटफ्लिक्स ने किया है और चार हिस्सों में बंटी यह लघु सीरीज आप नेटफ्लिक्स पर ही देख भी सकते हैं. इरफान खान की इसमें मुख्य भूमिका नहीं है और यह कहानी उन 12 न्यायाधीशों की हैं जिनके जिम्मे उन 28 जापानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों को सजा देने का दायित्व था जिन्होंने जापान को द्वितीय विश्व युद्ध में झोंका और मित्र देशों के खिलाफ तीन दर्जे के खौफनाक वॉर क्राइम्स किए.

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इरफान सहित ये सारे न्यायाधीश 1946 में अलग-अलग मित्र देशों से जापान आए थे और इस ट्रायब्यूनल को छह महीने में अपना फैसला सुनाना था. उनके सामने नाजियों को कड़ी सजा देने वाले न्यूरेमबर्ग ट्रायल्स का उदाहरण था और चूंकि सभी न्यायाधीश हिटलर का विरोध करने वाले मित्र देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, दुनिया को उम्मीद थी कि वे जापानियों को भी कड़ी से कड़ी सजा देंगे. लेकिन मुकदमे के उलझे स्वभाव की वजह से फैसला सुनाने में इस ट्रायब्यूनल को ढाई साल लगे और इस दौरान न्यायाधीशों के बीच कई तरह के फ्रिक्शन पैदा हुए जिसे ‘टोक्यो ट्रायल’ ने उसी सुघड़ता के साथ दिखाया है जैसे एक जमाने में ‘12 एंग्री मैन’ ने दिखाया था. या फिर ‘एक रुका हुआ फैसला’ ने.

इस ट्रायल के दौरान आस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, नीदरलैंड, फिलीपींस जैसे मित्र देशों से आए ज्यादातर न्यायाधीशों ने जापानी नेताओं-अधिकारियों को युद्ध के दौरान मानवता के खिलाफ किए अपराधों (वॉर क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमेनिटी) के लिए सजा-ए-मौत व उम्र कैद जैसी सजा देने का ही मन बनाया था, और अंतत: न्यूरेमबर्ग ट्रायल्स का ही उदाहरण लेते हुए कड़ा फैसला भी सुनाया था. लेकिन इनमें से एक न्यायाधीश ऐसा भी था जो द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र देशों की जगह जर्मनी का साथ देने वाले इन जापानी राजनेताओं के पक्ष में अकेला खड़ा हुआ था. और उस अकेले न्यायाधीश ने जापानी नेताओं-अधिकारियों को वॉर क्राइम्स का दोषी नहीं माना था.

वह जज गुलाम भारत से जापान गए राधाबिनोद पाल थे जिनका किरदार इस लघु सीरीज में इरफान खान ने निभाया है, और उन्होंने ऐसा फैसला किन कानूनी कारणों को ध्यान में रखकर लिया होगा, यह जानने के लिए आप ‘टोक्यो ट्रायल’ जरूर देखें. यह भी याद रखें कि यह न्यायाधीश उस औपनिवेशिक मुल्क से आता था जिसको मित्र देशों के मुखिया ब्रिटेन ने गुलाम बनाया हुआ था और वो द्वितीय विश्व युद्ध को अमेरिकी और इंग्लैंड के नजरिए से नहीं, गुलाम हिंदुस्तान के नजरिए से देखता था. कि युद्ध के दौरान सही कोई नहीं होता. इरफान खान का किरदार इसी अलहदे रंग की वजह से ‘टोक्यो ट्रायल’ में हद आकर्षित करता है और वे जिस आत्मविश्वास के साथ इस रोल को करते हैं, गुरुत्वाकर्षण के केंद्र को जमीन से उठाकर टीवी/लैपटॉप की स्क्रीन पर शिफ्ट कर देते हैं.

उनका अंग्रेजी बोलने का तरीका नितांत भारतीय है और भले ही हम ‘ट्रिपल एक्स…’ में दीपिका द्वारा भारतीय ऐक्सेंट अपनाने पर उनकी तारीफ कर चुके हैं, लेकिन इरफान जिस सुघड़ भारतीय अंदाज में अंग्रेजी संवाद बोलते हैं, लगता है जैसे किसी अंग्रेजी की कविता को भारतीयता दे रहे हों. जिस दृश्य में उन्हें कुछ नहीं करना होता - क्योंकि 12 लोगों से भरे सीन का फोकस किसी और एक्टर पर होता है - उस दृश्य में भी चेयर पर बैठकर इधर-उधर देखने के हावभाव ऐसे अभिनीत करते हैं कि अपनी तरफ नजरें खींच लेते हैं. चाय की चुस्की लेते वक्त भी, और विश्व के सबसे ताकतवर देशों के न्यायाधीशों को गलत साबित करते वक्त तिरछी मुस्कान दिखाते वक्त भी - यह जता देते हैं कि सीन हिंदुस्तान के बीहड़ में शूट हो रहा हो या स्थापित विदेशी अभिनेताओं से पटे पड़े हॉलीवुड के किसी स्टूडियो में, उनकी आलातरीन उपस्थिति को नजरअंदाज कोई नहीं कर सकता.

‘टोक्यो ट्रायल’ में अनगिनत संवाद हैं, और दिमाग लगाकर ही समझ में आने वाला इतिहास और कानूनी भाषा भी, लेकिन इरफान खान की उपस्थिति यह सुनिश्चित कर देती है कि आप इस सीरीज को कतई नजरअंदाज नहीं कर सकते. ‘हासिल’ से लेकर ‘टोक्यो ट्रायल’ तक, इरफान खान की यही तो खासियत रही है - उनका नाम नहीं बोलता, उनका काम बोलता है.

क्या दीपिका और प्रियंका सुन रही हैं?