हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का एक अभिन्न समझा जाने वाला हिस्सा सोमवार देर शाम उससे भिन्न हो गया. कम से कम दुनियावी तौर पर तो. शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर नहीं रहीं. वे 84 साल की थीं और उम्र के इस पड़ाव पर भी संगीत को उन्होंने छोड़ा नहीं था. या यूं कह लें कि संगीत ही उन्हें छोड़ने को राजी नहीं हुआ. इसीलिए आखिरी वक्त तक वे सांगीतिक कर्म में सक्रिय रहीं.

कहने को तो किशोरी अमोनकर जयपुर-अतरौली घराने से ताल्लुक रखती थीं, लेकिन आठ दशक में जो मुकाम उन्होंने हासिल किया, वहां पहुंचने के बाद उनके जैसे किसी कलाकार को घराना या घरानेदारी की हदें कब तक बांध सकती थीं. सो, जाहिर तौर पर उन्हें भी नहीं बांध पाईं और वे अपना अलग ही संसार रचती गईं. ऐसा संसार जिसे समझना कई बार संगीत के बड़े जानकारों के लिए भी मुश्किल हो जाता था.

अपने चाहने वालों के बीच ‘ताई’ के नाम से विख्यात किशोरी अमोनकर ने कुछ समय पहले संगीत से जुड़े तमाम पहलुओं पर ध्रुपद गायक गुंदेचा (उमाकांत-रमाकांत) बंधुओं के साथ लंबी बातचीत की थी. गुंदेचा बंधुओं की लिखी किताब ‘सुनता है गुरु ज्ञानी में’ यह दर्ज है. इस बातचीत से किशोरी अमोनकर के व्यक्तित्व की कई परतों का अंदाजा मिलता है.

जब कालिदास सम्मान ठुकरा दिया

काफी पुरानी बात है. नब्बे के दशक की. किशोरी अमोनकर को मध्य प्रदेश सरकार ने कालिदास सम्मान से नवाजने की घोषणा की थी. लेकिन उन्होंने यह सम्मान लेने से साफ मना कर दिया. ताई से इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा, ‘पहली बार लता मंगेशकर को यह सम्मान मिला था. फिर मुझसे जूनियर कई कलाकारों को यह सम्मान मिल चुका है. मेरी याद इतनी देर में आई उनको? लिहाजा, मुझे अपमानजनक लगा, इसलिए मना कर दिया. अभी और भी कई अवॉर्ड (भारत रत्न की तरफ इशारा) रिफ्यूज करने वाली हूं.’

मान-सम्मान ताई के लिए बहुत मायने रखता था. शायद इसीलिए उनके कार्यक्रमों के आयोजक उनसे खौफ खाते थे. गुंदेचा बंधुओं के साथ बातचीत में उनका कहना था, ‘आयोजक जब मुझे हल्के में लेते हैं या मुझे लगता है कि ज्ञान का अनादर हो रहा है, तो मैं शेरनी हो जाती हूं. आप मुझे कितने भी पैसे दे दो लेकिन ज्ञान का अनादर करने की इजाजत मैं कभी नहीं दे सकती. मैंने ये उसूल इसलिए तैयार किए ताकि मेरा संगीत साफ-सुथरा रहे. मैं दुनिया को देखकर नहीं गाती. मेरा गाना सही हो रहा है या नहीं, इसका जवाब मुझे अंदर से खुद ही मिलता है.’

तानपुरे को बच्चे की तरह मानती थीं

किशोरी ताई की पहली और सबसे बड़ी गुरु उनकी मां मोगूबाई कुर्दीकर थीं. उनका कहना था, ‘मेरी मां से बड़ा कोई कलाकार मुझे दिखाई नहीं देता. मैं जब छह साल की थी तो पिताजी का देहांत हो गया. मेरी मां ने बड़े कष्ट झेलकर हम तीन भाई-बहनों का पालन-पोषण किया. उन्होंने ही संगीत सिखाया. सख्त अनुशासन के साथ रियाज़ कराती थीं. कहतीं थीं- 108 बार ‘सा, रे, ग, म, प, ध, नि, सां’ गाओ. मैं 108 बार गा लेती तो कहती, फिर से गाओ. मैं कहती- गा तो लिया, तो वे कहतीं- ये 108वीं बार वाला सही आया है. इसे फिर 108 बार करो.’

ताई तानपूरे को अपने बच्चे की तरह मानती थीं. इस भाव के लिए भी वे अपनी मां को ही जिम्मेदार ठहराती थीं. उनके शब्दों में ‘बचपन से ही मां हमसे पूछा करती थी, तानपूरे में कितने तार होते हैं. मैं उन्हें बताती- चार. वे फिर पूछतीं- इसमें कितने सुर निकलते हैं- मैं कुछ सोच-समझकर जवाब देती- तीन. षड्ज (सा), पंचम (प) और खरज (मंद्र सप्तक का सा). फिर वे उसके बारे में और बहुत कुछ बतातीं. इस तरह बचपन से ही तानपूरे साथ मेरा लगाव हो गया, जो समय के साथ-साथ और गहराता ही गया.’

एक वाकये को याद करते हुए उन्होंने बताया था, ‘एक बार मैं सूरत, गुजरात में गाने के लिए गई. जिस गेस्ट हाउस में रुकी थी, वहां पहले माले पर बड़ा सा टैरेस था. बरसात हो रही थी, दरवाजा खुला था, तो मैं टैरेस पर चली गई. वहां पहुंची तो देखा तानपूरा पानी में भीग रहा है. बहुत खराब हालत में था. उसे देखते ही लगा, जैसे मेरा बच्चा भीग रहा हो. मैंने तुरंत उसे उठाया और अपने कमरे में ले आई. आयोजक आए तो उनसे पूछा कि ये तानपूरा किसका है. उन्होंने बताया कि ये उनका ही था. खराब हो गया था, इसलिए छत पर रखवा दिया था. मुझे बहुत बुरा लगा. मैंने उनसे कहा- इसे या तो आप जला दें, या ठीक करवा लें. लेकिन ऐसे मत रखें.’

घराने की बंदिशें तो गाईं, लेकिन संगीत का संसार उनका अपना था

किशाेरी अमोनकर ने जयपुर घराने के दिग्गज गायक अल्लादिया खान और आगरा घराने के अनवर हुसैन खां से भी संगीत सीखा. लेकिन वे जो संगीत संसार रचती थीं वह उनका अपना होता था. उस बातचीत में उन्होंने कहा था, ‘मेरी बदनामी बहुत है कि किशोरी समय पर स्टेज नहीं आती. लेकिन जब तानपूरे के सुर, मेरी आत्मा और जो राग मैं गाने वाली हूं, ये सब एकाकार नहीं हो जाते, मैं स्टेज पर नहीं जाती. कभी यह तारतम्य जल्दी बन जाता है और कार्यक्रम शुरू होने का समय नाै बजे होता है, तो लगता है 8.30 पर ही स्टेज पर चली जाऊं. कभी इसमें देर लगती है तो स्टेज पर पहुंचने में नौ से 10 भी बज जाते हैं. बरसात में अक्सर राग मल्हार गाने के लिए कहा जाता है. उसके लिए कार्यक्रम में जाने से कई दिन पहले से मल्हार के वातावरण में जाने की कोशिश करने लगती हूं.’

उनका कहना था, ‘किसी राग का वातावरण तभी तैयार हो सकता है, जब कलाकार खुद उसमें सिर से पांव तक रम चुका हो. यह भी मुझे मेरी मां ने सिखाया था. मैं जब उनसे सीख रही थी, तो एक बार उनसे मैंने पूछ लिया- अमुक राग का नाम क्या है. तो उन्हाेंने गुस्से में कहा- तुम्हें क्या करना है नाम जानकर. इस राग का नाम पत्थर है. फिर समझाइश भी दी कि राग का नाम जानने से बेहतर है, उसके वातावरण को महसूस किया जाए. फिर तब से अब तक मैं यही कर रही हूं. आज भी हम राग नहीं गाते, बल्कि वातावरण प्रकट करते हैं.’

ऐसे ही जयपुर और आगरा घराने के नियमों में बदलाव के बारे में उन्होंने बताया था, ‘जयपुर की गायकी में बोल आलाप नहीं होता. आगरा घराने की गायकी सीखी तो वहां देखा कि लोग बंदिश के स्थायी हिस्से का ही बोल आलाप करते हैं. लेकिन मुझे लगा कि स्थायी और अंतरा दोनों मिलाकर काव्य पूर्ण होता है, तो मैं दोनों का बोल आलाप करने लगी. जयपुर में छोटे आलाप का चलन है. लेकिन मुझे महसूस हुआ कि मुझे उन सुरों की जरूरत है, जिनके सहारे आप संगीत के समंदर में लेट जाएंगे. इसलिए मैने आलाप को बढ़ाया है. मैं मानती हूं कि परंपरा एक प्रवाह है. इस प्रवाह में समय के साथ बदलाव आए हैं और आगे भी आते रहेंगे.’

आठ को अपशकुन मानती थीं

किशोरी अमोनकर को आइसक्रीम बेहद पसंद थी. लेकिन जब भी वे उसे खातीं, तो आवाज खराब हो जाती थी. इसलिए आखिरी के चार-साढ़े चार दशक तक जब भी आइसक्रीम खाई तो गरम हो जाने के बाद. खुद ही कहती थीं, ‘वाे आइसक्रीम नहीं कुछ और हो जाता है. आप उसे हॉट-क्रीम कह सकते हैं.’ आठ के अंक को अपशकुन मानती थीं. न तो कभी उस नंबर के कमरे में ठहरती थीं, न ऐसे नंबर वाली गाड़ी में बैठती थीं. कारण बताते हुए उनका कहना था, ‘जब भी मैंने इसको नहीं माना, मेरा कुछ न कुछ बुरा हुआ है. इसलिए डर गई हूं. जीवन में इतना कुछ खोया है कि और कुछ खोना नहीं चाहती. इसीलिए इस चीज को मानती हूं.’

अपनी मान्यताएं, अपनी सोच लेकर किशोरी अमोनकर तो चली गईं लेकिन उन्होंने संगीत का जो संसार अपनी मेहनत से तैयार किया उसे हमारे बीच छोड़ गईं. विरासत के तौर पर. उनकी यह विरासत संगीत के मुरीदों के बीच उनकी मौजूदगी हमेशा बनाए रखेगी.