बाबा साहेब अंबेडकर और महात्मा गांधी, दोनों का ही मानना था कि छुआछूत खत्म करने के लिए ऊंची जाति के लोगों को आगे बढ़कर वे सारे काम करने चाहिए जो केवल नीची समझी जाने वाली जातियों के जिम्मे हैं. हाल ही में स्वच्छ भारत मिशन ने भी गांधी और अंबेडकर के दिखाए रास्ते की तरफ अपना रुख किया है.

बीते हफ्ते, केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के साथ फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार मध्य प्रदेश के खरगौन पहुंचे थे. जिले के रेगवां गांव में उन्होंने डबल पिट टॉयलेट के एक गड्ढे में खाद बन चुके मल को साफ किया था. गड्ढा साफ करते हुए अक्षय कुमार की तस्वीरों के साथ यह खबर उस दिन और बाद में भी सोशल मीडिया से लेकर तमाम न्यूज वेबसाइटों पर चर्चा का विषय रही. लेकिन जितना खबरों में दिखाया गया था इस बात की अहमियत उससे कई गुना ज्यादा है.

शोधकर्ता, सरकारी नीतिकार और सामाजिक विशेषज्ञ इस बात पर सहमत दिखते हैं कि देश में खुले शौच की आदत को जिंदा रखने में छुआछूत एक बहुत बड़ा कारण है. सरकारी खर्च से जिस तरह की लैट्रिन गांव के लोग बना सकते हैं, उसके गड्ढे को करीब तीन-चार साल में एक बार साफ़ करना पड़ता है.

अब सवाल है कि यह काम करेगा कौन? कई सामाजिक अध्ययनों के मुताबिक भारत में लोगों को लगता है कि लैट्रिन का गड्ढा सिर्फ एक विशेष जाति-तबके के लोग, जैसे कि वाल्मीकि, ही साफ़ कर सकते है. उनका मानना है कि भारतीय समाज में इस बिरादरी का यही काम है और अगर किसी दूसरी बिरादरी का कोई इंसान यह काम करता है, फिर चाहे वह अपने ही घर के लिए क्यों न हो, तो उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना होगा. इस कारण गैरवाल्मीकि बिरादरी के लोग खुद अपने घर की लैट्रिन का गड्ढा साफ नहीं करते.

लेकिन किसी दूसरे इंसान से लैट्रिन का गढ्ढा साफ़ करवाने में अच्छे-खासे पैसे खर्च हो सकते हैं. यही नहीं ऐसे लोग अब गावों में मिलते भी बहुत मुश्किल से हैं जो आपके शौचालय के गड्ढे में से मल-मूत्र साफ़ करने को तैयार हों. कुछ सरकारी प्रयासों और दलितों में आई चेतना के चलते ‘मैला ढोने वाली जातियां’ बीते सालों में इस काम से दूर होती गई हैं.

इसका एक हल यह हो सकता है कि ऐसी लैट्रिन बनवाई जाएं जिनके गड्ढों को बरसों तक साफ़ न करना पड़े. लेकिन छोटे गड्ढे वाली लैट्रिन को साफ कराने के लिए पैसों की जरूरत होती है तो बड़े गड्ढे वाली लैट्रिन को बनाने में ही लगभग 40 हज़ार रुपये का खर्च आता है. नतीजतन या तो लोग इसे बनवाते ही नहीं या फिर छोटे गड्ढे वाली लैट्रिन होने के बावजूद बाहर खुले में शौच के लिए जाते हैं. इस तरह से वे गंदगी और तरह-तरह की बीमारियों की वजह बनते हैं.

यह एक तरह से काफी उलझी हुई परिस्थिति है. न ही सरकार के पास इतनी सामर्थ्य है कि अतिरिक्त पैसा देकर वह सबके लिए बड़े गडढे वाली लैट्रिन बनवा सके और न ही ज्यादातर लोग ही ऐसा कर सकते है. इस उलझन को सुलझाने का बस एक ही तरीका है कि देश में ज़्यादातर लोग सस्ती, छोटे गड्ढे वाली लैट्रिन बनवाएं, उसका इस्तेमाल करें और उसे खुद ही साफ करें.

यही वजह है कि केंद्रीय मंत्री और अक्षय कुमार की डबल पिट टॉयलेट को खुद साफ करने के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिश काबिले तारीफ है. हालांकि इसका जमीन पर प्रभाव कितना होगा यह इस पर निर्भर करेगा कि ऐसी कोशिशें आगे भी होती हैं या नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में स्वच्छ भारत अभियान तभी सफल होगा जब ‘सारे 125 करोड़ देशवासी इसे एक आदत बना लें.’

प्रधानमंत्री ने दो अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत, वाल्मीकि बस्ती में झाड़ू लगाकर, महात्मा गांधी के लिए एक भेंट के तौर पर की थी. लेकिन अगर वे सच में गांधी को कुछ भेंट देना चाहते हैं तो उन्हें इस अभियान को छुआछूत और मैला ढोने के खिलाफ छिड़ी जंग के साथ आगे बढ़ाना होगा.

(निखिल श्रीवास्तव रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर कम्पैशनेट इकॉनॉमिक्स (रईस) में पॉलिसी और रिसर्च मैनेजर हैं)