एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2016 के बीच केरल को छोड़ कर दक्षिण भारत के अन्य राज्यों के बाल लिंग अनुपात में ‘नाटकीय गिरावट’ देखने को मिली है. बाल लिंग अनुपात से मतलब प्रति एक हजार बालकों पर बालिकाओं की संख्या से है. ज्यादातर राज्यों में यह राष्ट्रीय औसत से भी नीचे आ गया है. इससे पहले हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय राज्यों से ही लड़कियों की तादाद कम होने और इससे लिंग अनुपात बिगड़ने की ख़बरें आती रही हैं.

इस सामाजिक बुराई से निपटने की दिशा में पहला सवाल यही उठता है कि क्या किया जाए ताकि लड़कियां ज़्यादा पैदा हों. पुराने ज़माने से यह माना जाता है कि लड़का ही वंश चलाता है इसलिए निश्चित रूप से लड़का पैदा होने के उपायों के दावे तो बहुत मिलते हैं लेकिन, लड़की पैदा होने का उपाय बताने वाला कोई नहीं मिलता.

अब विज्ञान ने एक उपाय बताया है जिससे लड़कियां पैदा होने की संभावना बढ़ सकती है. उपाय बहुत आसान है. कुछ वक़्त पहले अफ़्रीका में हुए एक अध्ययन में पता चला है कि अगर गर्भधारण के वक़्त महिला कुपोषित हो तो लड़की पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है. तो क्या हम हरियाणा जैसे राज्यों में महिलाओं को कुपोषित रखने का अभियान चला सकते हैं? एक तरह से यह आसान भी है क्योंकि किसी को बेहतर पोषण देना मुश्किल है, कुपोषित रखने के लिए किसी अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत नहीं है.

ख़ैर आख़िरी बात थोड़ी मज़ाक़ में कही गई है क्योंकि हम जानते हैं कि भारत में लड़कियां कम होने की वजह यह नहीं है कि प्रकृति कोई अन्याय कर रही है, बल्कि यह काम इंसानों का किया-धरा है. लेकिन यह सच है कि कुपोषित गर्भवती महिलाओं के बेटी पैदा करने की संभावना ज़्यादा होती है. यह क्या मसला है इसे समझने के लिए कुछ बुनियादी वैज्ञानिक तथ्यों की बात कर ली जाए.

सामान्य समझ यह कहती है कि दुनिया में बराबर संख्या में लड़के और लड़कियां पैदा होनी चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है. अमूमन पैदा होने वाली सौ लड़कियों के मुक़ाबले लगभग 106 -107 लड़के पैदा होते हैं. प्रकृति ऐसा क्यों करती है यह जानने की कोशिश में यह समझ में आया कि शायद ऐसा इसलिए है कि पुरुषों के जल्दी मरने की आशंका ज़्यादा होती है.

दुनिया के तमाम आंकड़े बताते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ महिलाओं की पुरुषों के मुक़ाबले जनसंख्या बढ़ने लगती है क्योंकि महिलाएं पुरूषों के मुक़ाबले दीर्घजीवी होती हैं. विकसित देशों में 65 की उम्र से ज़्यादा के स्त्री पुरुषों का अनुपात 100 स्त्रियों के मुक़ाबले 91 से लेकर 75 पुरुषों तक होता है. भारत और चीन जैसे देशों मे जहां महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है, वहां यह अनुपात 101 पुरुषों के मुक़ाबले 100 महिलाओं का होता है. महिलाएं दीर्घजीवी क्यों होती हैं यह चर्चा आगे करेंगे, फ़िलहाल यह सवाल कि कुपोषित महिलाओं के बेटियां पैदा होने की संभावना ज़्यादा क्यों होती है?

प्रकृति की बुनियादी कोशिश यह होती है कि हर प्रजाति बनी रहे और इसलिए हर प्रजाति की जैविक संरचना में उसने प्रजाति को आगे बढ़ाने के तत्व शामिल किए हैं. जब कोई महिला कुपोषित होती है तो प्रकृति को यह संदेश जाता है कि भोजन की कमी है, यानी प्रजाति का जीवन ख़तरे में है. इस स्थिति का एक उपाय प्रकृति के पास यह है कि ज़्यादा संतानें पैदा हों ताकि प्रजाति के बने रहने की संभावना बढ़ जाए. ज़्यादा संतानों के लिए ज़रूरी है कि स्त्रियां ज़्यादा संख्या में हों क्योंकि संतानें तो वे ही पैदा कर सकती हैं. इसी वजह से कुपोषित महिलाएं बेटियां ज़्यादा पैदा करती हैं. कुपोषण से गर्भपात होने की भी आशंका बढ़ती है, और यह देखा गया है कि कुपोषण या अकाल की स्थिति में नर भ्रूणों के गर्भपात की आशंका ज़्यादा होती है.

अब सवाल यह कि महिलाएं दीर्घजीवी क्यों होती हैं? पहले यह माना जाता था कि शायद पुरुषों की जीवनशैली ऐसी होती है जिससे उनके जल्दी मरने की आशंका होती है. पुरुष युद्धों, दुर्घटनाओं में ज़्यादा मरते हैं, नशे जैसी सेहत के लिए नुक़सानदेह आदतें भी उन्हें ज़्यादा होती हैं. कुछ हद तक तो यह सही है लेकिन यह देखा गया कि जिन विकसित देशों मे पुरुष और महिलाओं की जीवनशैली में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं बचा है वहां भी स्थिति यही है. चिंपांजी जैसे इंसान के क़रीबी वानरों में भी मादाएं ज़्यादा जीती हैं.

दरअसल प्रकृति ने ही महिलाओं को ज़्यादा दीर्घजीवी बनाया है. विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि स्त्री कोशिकाओं मे दो एक्स क्रोमोजोम होते हैं और पुरुष कोशिकाओं में एक्स-वाई क्रोमोजोम होते हैं. इसका अर्थ यह है कि स्त्रियों के पास हर जीन के दो सेट होते हैं. इससे किसी जीन में गड़बड़ी होने पर एक स्टेपनी पहले से मौजूद होती है. पुरुषों को यह सुविधा नहीं मिलती. स्त्रियों के शरीर में रोगों से लड़ने वाली कोशिकाओं की तादाद भी ज़्यादा होती है. इसके अलावा पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरॉन पुरुषों को ज़्यादा ताक़त और आक्रामकता तो देता है पर एक वक़्त बाद वह शरीर की टूट-फूट और कैंसर, धमनियों के कड़े होने जैसी समस्याओं की आशंका बढ़ाता है. इसके बरक्स स्त्री हार्मोन इस्ट्रोजन एंटी ऑक्सिडेंट होता है जो शरीर को टूट-फूट से बचाता है.

प्रकृति की महिलाओं पर इस मेहरबानी की वजह वैज्ञानिक यह बताते हैं कि प्रकृति के नज़रिये से मानव प्रजाति के फलने-फूलने में पुरुषों की भूमिका महिलाओं के मुक़ाबले में सीमित होती है. भावी पीढ़ियों के पालन पोषण में महिलाओं की भूमिका ज़्यादा होती है और वे बड़ी उम्र तक भावी पीढ़ियों के पालन पोषण मे मददगार होती हैं, जब कि उम्र बढ़ने के साथ इस नज़रिये से पुरुषों की उपयोगिता तेज़ी से कम होती जाती है. समाज भले ही यह माने कि पुरुष वंश को आगे बढ़ाते हैं लेकिन प्रकृति के लिए मानववंश को आगे बढ़ाने में महिलाओं की भूमिका बड़ी है.

तो ऐसे में क्या यह बेहतर नहीं है कि हम भी प्रकृति के संदेश को मानें और कम से कम अपने स्तर पर महिलाओं को बराबरी दर्जा देने-दिलाने की कोशिश करें!