पंडित रविशंकर. सितार का यह दूसरा नाम है. इससे कौन इनकार कर सकता है कि ऐसे लोग इस दुनिया में एक बार आते हैं तो जाते नहीं. आप उनके रचे हुए संसार में बस एक कदम रखने मात्र से उन्हें अपने आसपास महसूस कर सकते हैं. कैसे? एक प्रयोग कर के देख लीजिए. पंडित रविशंकर के रचना संसार में ऐसी कई चीजें हैं जिनके अहसास मात्र से वे यूं नुमायां होने लगते हैं, जैसे बस सामने ही आपके लिए कुछ प्रस्तुत कर रहे हों.

यह 1948 की बात है. युवा रविशंकर उन दिनों मुंबई में थे. तभी 30 जनवरी को खबर आई कि महात्मा गांधी को गोली मार दी गई है. ऐसे मौके पर रविशंकर से कहा गया कि वे तबले के बिना ही आकाशवाणी के लिए कोई धुन बजाएं जो सुनने वालों को दुख की इस घड़ी में कुछ राहत दे. उन्होंने महात्मा के उपनाम ‘गांधी’ से तीन आखर या कहें कि सुर निकाल लिए- ‘ग’, ‘नि’ और ‘ध’. इन्हें मिलाकर पांच सुरों ‘सा, ग, म, ध, नि’ की संगति से जो संगीत रचा, उसे उन्होंने राग ‘मोहनकौंस’ नाम दिया. इस नाम की दो वजहें थीं. पहली- यह ‘मोहन’दास कर्मचंद गांधी के लिए रचा गया था. दूसरी- यह सुर संगति हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के राग मालकौंस के करीब थी.

इस राग और रूपक ताल में निबद्ध पंडित जी की एक गत...

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इसके एक साल बाद ही 1949 में पंडित रविशंकर आकाशवाणी, दिल्ली में संगीत निदेशक हो गए. इस पद पर वे 1956 तक रहे. आगे चलकर 1982 में जब ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटेनबरो ने कालजयी ‘गांधी’ फिल्म बनाई, तो उसका मूल साउंड ट्रैक भी पंडित रविशंकर से ही तैयार करवाया. इस फिल्म का एक ऐसा ही साउंड ट्रैक सुनिए जो यकीनन बेहद सुकून देगा..

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जाने-माने शायर मोहम्मद इकबाल ने 1904 में जो ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा’ लिखा था, उसकी धुन पहले तक उतनी सुरीली नहीं थी. शायद कविता या आम शायरी की तरह गाया जाता रहा होगा. लेकिन 1945 में उसे पंडित रविशंकर ने उसकी धुन को फिर नए ढंग से रचा. हालांकि इस बारे में बहुत से लोगों को लंबे समय तक पता नहीं था. यहां तक कि लता मंगेशकर की आवाज में देशभक्ति के गीतों का एलबम जारी करने वाली म्यूजिक कंपनी एचएमवी ने इसे एक बार ‘पारंपरिक धुन’ बता दिया था. बहरहाल आज इस धुन को आज भी हमारे संगीतकार वैसे ही बजा रहे हैं जैसे उसे पंडित जी ने रचा था. इस पर आधुनिक प्रयोग की एक झलक...

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पंडित रविशंकर 1920 में बनारस में एक बंगाली परिवार में पैदा हुए थे. इस लिहाज से और एक श्रेष्ठ रचनाकार के नाते भी उनके बंगाली फिल्मकार सत्यजीत रॉय से घनिष्ठ संबंध हुआ करते थे. पंडित जी ने सत्यजीत रॉय की तीन कालजयी फिल्मों में संगीत दिया. इन फिल्मों (पाथेर पांचाली, अपराजितो और अपूर संसार) को फिल्मत्रयी भी कहा जाता है. सो, जाहिर तौर पर जब रॉय का निधन हुआ तो उस वक्त भी पंडित रविशंकर के जरिए अगर कोई सच्ची श्रद्धांजलि होनी थी तो वह सांगीतिक ही होनी थी, जो कि हुई भी. उन्होंने रॉय की याद में एक धुन रची और इसे नाम दिया, ‘फेयरवेल माई फ्रेंड’. इसे आगे चलकर एचएमवी ने जारी किया.

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पंडित रविशंकर को संगीत की दुनिया का प्रतिष्ठित ग्रैमी अवॉर्ड पहली बार 1968 में (उन्हें कुल तीन ग्रैमी अवॉर्ड मिले और एक बार लाइफ टाइम अचीवमैंट अवॉर्ड भी) मिला. जब उन्होंने पश्चिम के जाने-माने संगीतकार यहूदी मेनुहिन के साथ ‘वेस्ट मीट्स ईस्ट’ (म्यूजिक एल्बम-1967) को रचा. उस अद्भुत प्रयोग की एक झलक मात्र ही सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है.

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पंडित रविशंकर ने सिर्फ पूरब और पश्चिम के संगीत को ही एक नहीं किया बल्कि अपनी बांग्ला माटी (पूरब और पश्चिम बंगाल) को भी जोड़ने की कोशिश की. उन्होंने 1971 में बांग्लादेश के जन्म के तुरंत बाद खुद पहल करते हुए वहां एक म्यूजिक कन्सर्ट किया. इसमें उनका साथ पश्चिम के जाने-माने संगीत समूह (बैंड) बीटल्स के गिटारिस्ट और उनके शिष्य जॉर्ज हैरिसन तथा उनके गुरुभाई सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खान (उस्ताद अलाउद्दीन खान के पुत्र) ने दिया.

इस आयोजन का एक बड़ा रोचक किस्सा है. जब ये तीनों संगीतकार कार्यक्रम के शुरूआत में ही अपने साज़ ट्यून करके फ्री हुए तो सुनने वालों को लगा जैसे इन्होंने एक प्रस्तुति दे दी हो. सब तालियां बजाने लगे. तालियां थमने के बाद पंडित जी मुस्कुराकर बोले, ‘अगर आपको हमारी ट्यूनिंग की प्रक्रिया ही इतनी अच्छी लगी, तो उम्मीद है प्रस्तुति और ज्यादा अच्छी लगेगी.’ इस प्रस्तुति में तबले पर उनके साथ उस्ताद अल्लारक्खा खां (उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के पिता) हैं...

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उस्ताद अली अकबर खान के बहाने पंडित रविशंकर के उस दौर का एक किस्सा याद हो आता है, जब वे मैहर में उस्ताद बाबा अलाउद्दीन खान साहब से संगीत सीख रहे थे. यह तब की बात है जब पंडित जी महज 19-20 साल के थे. इससे पहले वे अपने बड़े भाई विख्यात नर्तक और नृत्य निर्देशक उदयशंकर की नृत्य मंडली में रहते थे. बतौर नर्तक ही. लेकिन कोलकाता में एक आयोजन के दौरान अमिय कांति भट्‌टाचार्य को सितार बजाते देख वे मंत्रमुग्ध हो गए. तय कर लिया कि सितार सीखना है और वक्त उन्हें बाबा के संगीत विद्यालय में ले आया. बाबा अपने शागिर्दों पर गुस्सा खूब किया करते थे, खासतौर पर उस वक्त, जब वे उनके बताए हुए पलटों (अलंकार)-तान-आलाप आदि को ठीक से गा-बजा नहीं पाते थे.

सो, ऐसे ही एक मौके पर वे रविशंकर को भी बुरा-भला कह बैठे. बताते हैं कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि ‘बजा नहीं सकते तो लड़कियों की तरह चूड़ियां पहनकर बैठ जाओ.’ रविशंकर को बहुत बुरा लगा और वे वह जगह छोड़कर चले गए. कहा तो यहां तक जाता है कि वे इतने आहत हुए थे कि उन्होंने आत्महत्या करने तक की ठान ली थी. लेकिन किसी जानने वाले ने उन्हें रोक लिया.

किस्से हैं. कितने सच, कहा नहीं जा सकता. लेकिन अगर इसका एक हिस्सा भी सच है, तो पंडित जी को रोकने वाले उस शख्स को फरिश्ता ही कहना चाहिए जिसने उसने संगीत की दुनिया में उस रवि (सूर्य) का उदय सुनिश्चित किया, जो उसके बाद कभी अस्त नहीं हुआ. कहते हैं कि पंडित जी के माता-पिता ने उन्हें रवींद्र शंकर नाम दिया था. लेकिन उन्होंने अपने नाम को छोटा करते हुए इसे ’रवि शंकर’ कर दिया था. ठीक ही तो किया था.