संजय दुबे सत्याग्रह के संस्थापक और संपादक हैं.


सर्दियों की एक रात थी. हम सब शायद किसी हीटर या तापने वाली किसी और चीज के चारों ओर बैठे हुए थे - मैं मेरी बड़ी बहन, छोटा भाई और मम्मी-पापा. जाड़ों में पानी पीने या ऐसा करने के लिए उठने का मन करता नहीं था. तो शायद हमें उत्साहित करने के लिए माताजी ने एक कहानी सुनाई:

एक आदमी था. एक रात वह प्यासा सो गया. रात को उसे प्यास लगी. आदमी जगा नहीं तो उसके प्राणों ने खुद ही अपनी प्यास बुझाने की सोची. वे मधुमक्खी टाइप कोई चीज बनकर उस आदमी के मुंह के रास्ते उसके शरीर से बाहर निकले और चल पड़े पानी की खोज में. थोड़ी दूर किसी व्यक्ति ने अपनी प्यास बुझाने के लिए घड़े का मुंह खोला था. मधुमक्खी ने इसका फायदा उठाया और घड़े में घुसकर पानी पीने लगी. अभी प्राण ऐसा कर ही रहे थे कि घड़े का ढक्कन बंद हो गया. बदकिस्मती से अगले दिन सुबह तक ढक्कन खुला नहीं, उसमें से प्राण बाहर निकले नहीं तो आदमी को मरा मान लिया गया. जब उस व्यक्ति को श्मशान घाट पर जलाने की तैयारी की जा रही थी तभी किसी ने फिर से घड़े को खोल दिया. बस प्राणों को बाहर आकर फिर से उस व्यक्ति के अंदर जाकर उसे जीवित करने का मौका मिल गया.

इस छोटी सी कहानी से हम सबको यह सीख मिली कि कभी प्यासा नहीं सोना चाहिए, नहीं तो प्राण भटकने के लिए मजबूर होकर हमें मरने को मजबूर कर सकते हैं.

बस, मां की कहानी से डरा मैं, रात को सोने से पहले कम से कम एक लोटा पानी गटक जाता था. अगर सोने के दौरान कभी उठता तो फिर से जितना हो सके उतना पानी पीकर ही फिर से सोता. इसका नतीजा यह हुआ कि करीब 8-10 साल की उम्र में, काफी सालों के बाद, एक बार फिर से मैं बिस्तर पर सूसू करने लगा था. मैं अक्सर सपना देखता कि अपने स्कूल के वॉशरूम में या किसी और जगह सूसू कर रहा हूं और जब तक इस बारे में कुछ समझ या कर पाता तब तक बिस्तर का कबाड़ा हो चुका होता था.

जीवन में हुए इस नये बदलाव ने उसे कई और बहुत बुरी तरह से प्रभावित कर दिया था. अब मेरी हर सुबह की शुरुआत डांट या कभी-कभी मार खाने से होने लगी थी. मैं अक्सर रात को बिस्तर पर सूसू करने के बाद घंटों सो नहीं पाता था. बाद में जब न सोना सभी हदों से बाहर हो गया तो मजबूरी में उसी बिस्तर पर कुछ जगह निकालकर सोने लगा था. लेकिन जब डांट और तानों की मात्रा लगातार बढ़ने लगी तो मैं बिस्तर पर सूसू करने के बाद कभी-कभी उस पर एक जग पानी फैला देता था. मुझे लगता था कि बिस्तर पर पानी फैलाने के लिए पड़ने वाली डांट, सूसू करने के लिए पड़ने वाली डांट से कम बुरी है.

कभी-कभी सूसू की वजह से जब बिस्तर पर सोने की बिलकुल जगह नहीं बचती या फिर सूसू वाली बात छुपाने के लिए, मैं चुपके से आयरन निकालता और बिस्तर को उससे सुखाने की कोशिश करता. लेकिन कई बार चाहने पर भी ऐसा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि हमारे छोटे से शहर में बिजली का अक्सर टोटा लगा रहता था. जब बिजली नहीं होती थी तो एक मुसीबत यह भी होती थी कि कोई न कोई एक कमरे के हमारे घर में जगा ही रहता था. ऐसे में अपन बिस्तर से हिले नहीं कि सामने वाले की समझ में सब आ जाता था.

इस तरह महीनों बीत गये. इस दौरान मुझे होम्योपैथिक से लेकर ऐलोपैथिक, कई तरह की दवाइयां दी गईं. लेकिन पत्ते ढाक के उतने ही रहे थे. पता नहीं क्यों हमारे एक कमरे के घर में भी कोई यह क्यों नहीं समझ पा रहा था कि समस्या की जड़ क्या और कितनी छोटी सी है! उधर एक छोटे से बच्चे के आत्मविश्वास की सारी चूलें हिलकर गिर जाने को हो रही थीं.

अब तक मैं न सिर्फ सोने से डरने लगा था बल्कि किसी मेहमान के आने या किसी के यहां मेहमान बनकर जाने के नाम से ही कांपने लगता था. अगर ऐसा एकाध रात के लिए होता तो मैं उस दौरान ज्यादातर समय सोता ही नहीं था. कभी-कभी ऐसा लगता कि पूरे परिवार के लिए मैं एक अछूत हूं. मेरे गंदे से हो चुके बिस्तर पर अब लेटना तो दूर, कभी कोई बैठता तक नहीं था. न ही मुझे कभी कोई अपने बिस्तर पर अपने साथ ही सुलाता था.

उस वक्त मन में यह सोचकर बहुत डर लगता था कि मेरे पक्के दोस्तों को अगर यह बात पता लगी तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? और मुझसे अक्सर लड़ते रहने वाले संजीव को अगर किसी दिन इसकी भनक लग गई तो वह हिमानी और शेफाली को तो यह बात बताने ही बताने वाला था. फिर उसके बाद तो जीवन का कोई मतलब ही नहीं रह जाना था.

कुछ साल बाद, जब शायद माताजी की सुनाई कहानी स्मृति में कुछ पीछे चली गई, तो एकाध बार मैं ढेर सारा पानी पीने से चूक गया. अब तक थोड़ा बड़ा हो जाने की वजह से अपने ऊपर नियंत्रण भी कुछ बढ़ चुका था और समझ भी. तो, दो-तीन ऐसी रातों में बिस्तर गीला न होने पर मैं समझ गया कि गड़बड़ आखिर है कहां! भर-भर के पानी पीने में? शायद हां!

लेकिन असली गड़बड़ तो वह कहानी थी... हां! लेकिन उसके भी पीछे क्या बड़े लोगों की वह अज्ञानता नहीं थी जिसने उन्हें छोटे से एक बच्चे के दिमाग में बेसिर-पैर के डर को इस कोने से उस कोने तक पसार के चिपकाने दिया था!

इस डर की वजह से खोये आत्मविश्वास और उपजी शर्म के कारण वह बच्चा न जाने कितनी बार अपने घर से भागते-भागते और उसकी छत से कूदते-कूदते रह गया था.