हाल में गोरक्षा के नाम पर कथित गोरक्षकों ने राजस्थान के अलवर जिले में एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर दी. मेवात में नूह इलाके के पहलू खान अपनी डेयरी के लिए जयपुर से गाएं लेकर जा रहे थे कि अलवर के पास कुछ लोगों ने उन्हें और उनके साथियों को घेरकर उन पर हमला कर दिया. गंभीर रूप से घायल पहलू खान की बाद में अस्पताल में मौत हो गई.

यह अपनी तरह का पहला मामला नहीं है. इससे पहले सितंबर 2015 में दिल्ली से सटे दादरी में मोहम्मद अखलाक की भी ऐसे ही हत्या कर दी गई थी. जनवरी 2016 में मध्य प्रदेश के खिड़किया रेलवे स्टेशन पर कथित गौरक्षकों ने एक मुस्लिम दंपत्ति को बुरी तरह पीटा था. मार्च 2016 में ऐसी ही मारपीट पंजाब में कुछ लोगों के साथ हुई थी और झारखण्ड में तो तीन लोगों को पेड़ से बांधकर पीटा गया था. अप्रैल 2016 में हुई सहारनपुर निवासी ताहिर हसन के 27 वर्षीय बेटे की हत्या के आरोप भी ऐसे ही कथित गौरक्षों पर लगे थे. जून 2016 में हरियाणा में दो लोगों को कथित गौरक्षकों ने मार-मार कर गोबर खाने को मजबूर किया था. जुलाई 2016 में गुजरात के ऊना में सात दलित युवकों को कथित गौरक्षकों ने तब बुरी तरह पीटा जब वे एक मरी हुई गाय का चमड़ा उतारने का काम कर रहे थे.

बीते साल राजस्थान की सबसे बड़ी गोशाला - हिंगोनिया गोशाला - में मात्र सात महीनों के भीतर ही कुल 8,122 गायों की मौत हो गई थी. यह सरकारी आंकड़ा था, असल संख्या इससे भी ज्यादा मानी जाती है  

कथित गौरक्षकों द्वारा हिंसा पर उतारू होने की ये तो वे घटनाएं हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बनीं. यदि देशभर में गोरक्षा ने नाम पर होने वाली हिंसक घटनाओं की बात करें तो उनका आंकड़ा कहीं ज्यादा है. आज देशभर में ऐसे हजारों, या शायद लाखों ‘गोरक्षक’ पैदा हो गए हैं जो गोरक्षा के नाम पर सड़कों पर लाठी-डंडे लिए तैनात हैं. लेकिन ऐसे कथित गोरक्षकों का असल में गोसेवा से कुछ लेना-देना है या नहीं, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि देशभर की विभिन्न गोशालाओं में काम या सेवा करने वाले गोसेवकों की भारी किल्लत है.

बीते साल राजस्थान की सबसे बड़ी गोशाला - हिंगोनिया गोशाला - में मात्र सात महीनों के भीतर ही कुल 8,122 गायों की मौत हो गई थी. यह सरकारी आंकड़ा था, असल संख्या इससे भी ज्यादा मानी जाती है. इस गोशाला में हुई गायों की मौत का एक बड़ा कारण यही था कि गोशाला में प्रबंधन बेहद लचर था और यहां काम करने वाले कर्मचारियों को मूलभूत सुविधाएं तक नहीं दी जाती थीं जिसके चलते वे हड़ताल पर चले गए थे. उत्तर भारत की अधिकतर गोशालाओं में स्थिति कमोबेश ऐसी ही है. सड़कों पर हुडदंग करने वाले कथित गोरक्षकों की संख्या भले ही दिनों-दिन बढ़ रही है, लेकिन गोशालाओं में काम करने वाले गोसेवक ढूंढने से भी मिलने मुश्किल हैं.

मेरठ के मोहकमपुर इलाके में करीब 108 साल पुरानी ‘गोपाल गोशाला’ है. इस गोशाला के प्रबंधक उमेश पाण्डेय बताते हैं, ‘हमारे यहां करीब आठ सौ पशु हैं जिनमें से दूध देने वाली गाय सिर्फ सौ के करीब ही हैं. इनकी देखभाल के लिए यहां 60 कर्मचारी (गोसेवक) काम करते हैं. लगभग ये सभी लोग पूर्वांचल के हैं और मजदूरी के लिए यहां आए हैं. इन गोसेवकों को महीने के पांच हजार रूपये मिलते हैं.’ वे आगे कहते हैं, ‘गोशाला में पैसों का संकट बना ही रहता है. ऐसे में अगर कुछ लोग काम छोड़ कर चले जाते हैं तो नए गोसेवक ढूंढने में बड़ी दिक्कत हो जाती है.’ कथित गोरक्षकों के बारे में उमेश पाण्डेय कहते हैं, ‘जो भी लोग गोरक्षा के नाम पर ये मार-पीट कर रहे हैं, ये सभी फिरकापरस्त लोग हैं. इनका गोसेवा से कोई लेना-देना नहीं है. ये लोग सिर्फ राजनीतिक कारणों से और चर्चा में आने के लिए ऐसे काम कर रहे हैं.’

मैं पिछले 22 साल से ये गोशालाएं चला रहा हूं. इतने सालों में कभी एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति मुफ्त में गोसेवा करने हमारे पास आया हो

लगभग यही विचार राजस्थान गोसेवा संघ के अध्यक्ष डॉक्टर डीएस भंडारी के भी हैं. वे बताते हैं, ‘राजस्थान के अलग-अलग जिलों में मेरे पास कुल दस गोशालाएं हैं जिनमें पांच हजार से ज्यादा गोवंश है. मैं पिछले 22 साल से ये गोशालाएं चला रहा हूं. इतने सालों में कभी एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि कोई व्यक्ति मुफ्त में गोसेवा करने हमारे पास आया हो. मुझे आज तक ऐसा कोई नहीं मिला जिसने कहा हो कि मैं गोभक्त होने के नाते कुछ महीने या कुछ दिन भी गोशाला में आकर गोसेवा करना चाहता हूं. जो लोग खुद को गोरक्षक कह रहे हैं वे सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़का रहे हैं और अपनी राजनीति चमका रहे हैं.’

हरियाणा के हिसार जिले में ‘श्री लाडवा गोशाला’ नाम की एक गोशाला है. यहां गोवंश के करीब 1100 पशु हैं जिनमें से सिर्फ 70-80 ही दुधारू गाय हैं. इस गोशाला से जुड़े मोहन शर्मा बताते हैं, ‘चूंकि गोशाला में अधिकतर पशु दूध नहीं देते इसलिए गोशाला चलाना कोई मुनाफे का सौदा नहीं बल्कि बहुत मेहनत का और कठिन काम है. इसलिए गायों को चारा डालने से लेकर गोबर उठाने और साफ-सफाई करने वालों तक की दिहाड़ी जुटाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यह काम करने के लिए कोई गोभक्त कभी श्रमदान करने आगे नहीं आता.’

मोहन शर्मा आगे कहते हैं, ‘जितने लोग आज गोरक्षक बने सड़क पर घूम रहे हैं, ये लोग अगर एक-एक गाय अपने घरों पर ही पाल लें तो देश में गोशाला बनाने की ही जरूरत नहीं रहेगी. साफ है कि इन लोगों का गोसेवा से कोई लेना-देना नहीं है, ये सिर्फ गाय के नाम पर अपनी राजनीति साध रहे हैं. निस्वार्थ भाव से गोसेवा करने वाले तो ढूंढे नहीं मिलते और कथित गोरक्षकों की देश में बाढ़ आ गई है.’