इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में छेड़छाड़ के आरोपों के बाद उठी बहस थमने का नाम नहीं ले रही. यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद शुरू हुआ. सबसे पहले बसपा अध्यक्ष मायावती ने आरोप लगाए कि ईवीएम में छेड़छाड़ की गई है. इसके बाद आम आदमी पार्टी (आप) के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने मुद्दा लपक लिया. उन्होंने पहले कहा कि पंजाब में ईवीएम की गड़बड़ी की वजह से आप के 20-25 फीसदी वोट कांग्रेस को चले गए, जिससे उसे वहां हार का सामना करना पड़ा. अब आप ने एमसीडी (दिल्ली के नगर निगम) चुनाव में भी इस्तेमाल हुईं वोटिंग मशीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. उसने दिल्ली विधानसभा में एक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को हैक करने का प्रदर्शन करते हुए यह दावा किया कि प्रत्येक वोटिंग मशीन को हैक किया जा सकता है.

इस पूरे विवाद को हवा देने का काम किया एक खबर ने जो एक अप्रैल को मध्य प्रदेश के भिंड से आई. कई अखबारों ने बताया कि भिंड जिले के अटेर में हो रहे उपचुनाव के लिए जो ईवीएम लाई गईं हैं, उनसे सिर्फ भाजपा के चुनाव चिन्ह की पर्चियां ही निकली हैं. यही मशीनें उमरिया जिले की बांधवगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के लिए इस्तेमाल में लाई जानी थीं. तिस पर जब पता चला कि मशीनें उत्तर प्रदेश से लाई गई हैं तो और बवाल हो गया. विपक्षी पार्टियों को अपने आरोपों के पक्ष में आधार मिल गया.

सो, जैसे ही घटना सामने आई चुनाव आयोग ने तुरंत ही इसके जिम्मेदार 19 अधिकारियों को निलंबित कर दिया. इनमें एक जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक भी थे. मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई गई. उसने पाया कि एक गफलत की वजह से यह घटना हुई थी. लेकिन यह समिति चूंकि आयोग ने बनाई थी इसलिए रिपोर्ट पर सबको भरोसा नहीं हुआ. लिहाजा, सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल ने इसकी जमीनी पड़ताल करने का फैसला किया. उससे जो सच सामने निकलकर आया, उसे विस्तार से समझते हैं.

31 मार्च को असल में हुआ क्या था?

उस रोज दोपहर का वक्त था. मध्य प्रदेश की मुख्य निर्वाचन अधिकारी सलीना सिंह ने भिंड जिला परिषद की इमारत में मीडिया से बातचीत आयोजित की थी. इसमें अटेर में चुनाव तैयारियों के बारे में बात होनी थी. इस दौरान जिला कलेक्टर इलियाराजा टी, पुलिस अधीक्षक अनिल सिंह कुशवाह और जिला परिषद के वरिष्ठ अधिकारी भी वहां थे. बातचीत के दौरान सलीना सिंह वोटर वैरीफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) के बारे में बता रही थीं. उन्होंने यह बताने के लिए कि पर्ची कैसे ली जाती है, एक मशीन पर प्रयोग करके दिखाया.

वीवीपीएटी पर हर वोटर का रिकॉर्ड दर्ज होता है. यानी इस पर्ची के जरिए मतदाता पुष्टि कर सकता है कि उसका वोट उसी उम्मीदवार को गया या नहीं जिसे वह देना चाहता था. चुने हुए पार्टी के चुनाव चिन्ह के हिसाब से यह पर्ची मशीन के डिस्प्ले पर नजर आती है. करीब सात सेकंड बाद यह अपने आप मशीन में चली जाती है. सलीना सिंह यह प्रदर्शित कर रही थीं. उन्होंने जैसे ही एक बटन दबाया तो उसमें से भाजपा के चुनाव चिन्ह वाली पर्ची निकल आई. यह कानपुर के गोविंदनगर विधानसभा क्षेत्र से जीते भाजपा प्रत्याशी सत्यदेव पचौरी से संबंधित थी. कानपुर, जहां कि 11 मार्च को चुनाव परिणाम भी घोषित हो चुका था.

बस यहीं से एक के बाद एक गड़बड़ी शुरू होती गई. ईवीएम के डिस्प्ले पर भाजपा का चुनाव चिन्ह नजर आते ही कुछ संवाददाता अतिउत्साह में कहने लगे कि ईवीएम में पहले से ही भाजपा के पक्ष में डेटा फीड है. सलीना सिंह हंसीं और हंसते हुए ही चेतावनी भी दी कि ऐसी कोई खबर न दिखाएं नहीं तो उनको थाने में बिठा देंगी. कुछ पत्रकारों ने उनकी इस टिप्पणी पर एतराज जताया और इसके बाद अधिकारियों ने दो अन्य बटन दबाकर दिखाए.

यह तक सब ठीक था. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उससे गलतफहमी बढ़ती गई. मसलन, इस बातचीत का एक वीडियो खूब प्रसारित हुआ. इसमें सलीना सिंह की पत्रकारों से बातचीत तो दिखाई गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि मतदाता पर्ची का नतीजा आखिर क्या हुआ.

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लगातार आक्रामक रिपोर्टिंग

भिंड में मध्य प्रदेश के तीनों बड़े अखबारों- दैनिक भास्कर, पत्रिका और नई दुनिया के दफ्तर हैं. इन तीनों अखबारों के ही संवाददाता इस पत्रकार वार्ता में मौजूद थे. दो समाचार एजेंसियों और राष्ट्रीय हिंदी चैनल ‘आज तक’ के स्थानीय प्रतिनिधि भी वहां थे. उन्होंने किस तरह से रिपोर्टिंग की, यह देखते हैं.

एक अप्रैल को पत्रिका का शीर्षक था, ‘डेमो में पहली पर्ची निकली भाजपा की, कांग्रेस ने कहा- मतपत्र से हो चुनाव.’

पहले पन्ने पर यह खबर छपी. इसमें यह बताया गया कि पत्रकारों ने जब इस पर सवाल उठाए तो प्रदेश की मुख्य चुनाव अधिकारी सलीना सिंह ने उन्हें थाने में बिठाने की धमकी दी थी. खबर में प्रदेश कांग्रेस के नेता गोविंद सिंह का बयान भी था. इसमें उन्होंने कहा था कि ईवीएम से छेड़छाड़ हुई थी इसलिए चुनाव मतपत्रों के जरिए कराए जाएं. इस खबर में भी यह नहीं बताया गया कि ईवीएम पर जब दो बार और बटन दबाया गया तब मतदाता पर्ची का असली नतीजा क्या था. इसके बजाय इसी खबर के साथ जो दूसरी सबहेडिंग थी उसका गोविंद सिंह के हवाले से शीर्षक था, ‘लोकतंत्र की हत्या का प्रयास.’ दूसरे पन्ने पर इसी खबर में आगे गोविंद सिंह के हवाले से ही यह बताया गया कि बाद वाली दो पर्चियां भी भाजपा की ही निकलीं. इस तरह विवाद को हवा मिलनी शुरू हुई.

इस बारे में जब पत्रिका के भिंड ब्यूरो चीफ रामानंद सोनी से संपर्क किया गया तो उनका कहना था, ‘हमने तो सही खबर दी थी. दो बार भाजपा की पर्चियां नहीं निकली थीं.’ खबर लिखने वाले संवाददाता सुभाष त्रिपाठी ने भी अपनी खबर को सही बताया.

नई दुनिया का एक अप्रैल को शीर्षक था, ‘मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी हंसकर बोलीं- प्रेस में दिया तो थाने में बैठाएंगे.’

इस खबर के मुताबिक मतदाता पर्चियां निकलने का क्रम यह था. पहली पर्ची- भाजपा की, दूसरी- राष्ट्रीय लोकदल की और तीसरी- कांग्रेस के चुनाव चिन्ह की निकली थी. इसमें यह भी बताया गया कि निर्वाचन अधिकारी ने इस खबर को प्रकाशित न करने के लिए कहा था. स्क्रोल से बातचीत करते हुए रिपोर्टर अब्बास अहमद अपनी खबर को अधिक प्रामाणिक बताते हैं.

मौके पर मौजूद रहे जिला कलेक्ट्रेट के एक अधिकारी भी पर्चियों के निकलने का यही क्रम बताते हैं. हालांकि वे अपना नाम न छापने की गुजारिश भी करते हैं.

एक अप्रैल को ही दैनिक भास्कर का शीर्षक था, ‘ईवीएम का दो बार बटन दबाया तो प्रिंट हुआ कमल का चिन्ह’

इसमें भी यही बताया गया कि दो बार ईवीएम का बटन दबाने से भाजपा के चुनाव चिन्ह की पर्चियां निकलीं. जब दैनिक भास्कर के संवाददाता लाजपत अग्रवाल से पूछा गया कि दूसरे अखबार में तो कुछ और खबर छपी तो उन्होंने शुरू में कहा, ‘मुझे साफ-साफ कुछ दिखा नहीं था. लेकिन यह जरूर देखा था कि चुनाव अधिकारी ने कुल चार बटन दबाए थे.’ उनका कहना था, ‘भाजपा के चुनाव चिन्ह की पर्ची जरूर निकली थी. लेकिन मैं यह नहीं बता सकता कि चुनाव अधिकारी ने कमल वाला बटन दबाया, तब ही वह निकली या कोई और.’

यानी उन्हें मतदाता पर्ची के बारे में ठीक-ठीक कुछ पता नहीं था. उसके बाद वे सलीना सिंह की चेतावनी वाली बात पर जोर देने लगे. फिर जब उन्हें नई दुनिया की खबर के बारे में बताया गया तो वे बचाव की स्थिति में आ गए. कहने लगे कि हां, यही सही स्थिति है. तो उनसे फिर पूछा गया कि उन्होंने गलत खबर क्यों लिखी तो उनका जवाब था, ‘मैंने कमल के फूल वाली दो पर्चियां ईवीएम के बगल में पड़ी देखी थीं.’

यहीं उनकी पोल खुल जाती है क्योंकि ईवीएम की पर्ची सीधे ईवीएम से जुड़े बॉक्स में चली जाती है, न कि बाहर निकलती है.

दैनिक भास्कर ग्वालियर के समाचार संपादक भी अपने संवाददाता का बचाव करते नजर आए. उन्होंने तो यहां तक दावा किया कि दैनिक भास्कर इकलौता अखबार था, जिसने सही रिपोर्ट छापी. उल्टा सवाल दागते हुए उनका कहना था, ‘अगर ईवीएम में गड़बड़ी नहीं थी और दो बार भाजपा की पर्ची नहीं निकली तो, सलीना सिंह ने धमकी क्यों दी. चुनाव आयोग अब अपनी रिपोर्ट के जरिए मुद्दा दबाना चाहता है.’

ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि चुनाव आयोग ने क्या पाया था.

चुनाव आयोग की रिपोर्ट

चुनाव आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट में बताया कि घटना के वक्त ईवीएम के चार बटन दबाए गए थे. इसमें चार अलग-अलग पर्चियां निकली थीं. इसमें उन पर्चियों का क्रम भी बताया गया- हैंड पंप (राष्ट्रीय लोकदल), कमल (भाजपा), हैंड पंप (राष्ट्रीय लोकदल), हाथ (कांग्रेस). इसमें यह भी बताया गया कि किसी भी पत्रकार ने आयोग से पर्चियों की असलियत जानने के बारे में संपर्क तक नहीं किया. न ही किसी ने यह ध्यान दिया कि पहली पर्ची ही राष्ट्रीय लोकदल की निकली थी.

चुनाव आयोग ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक टीम भिंड भेजी थी. उसकी जांच रिपोर्ट में ये तथ्य निकलकर सामने आए. इस बारे में शुक्रवार को नई दिल्ली में मीडिया को जानकारी दी गई. इसमें यह भी बताया गया, ‘जिस मशीन पर मतदाता पर्ची का प्रदर्शन किया गया, वह उत्तर प्रदेश से नहीं लाई गई थी बल्कि मतदाता पर्चियां उत्तर प्रदेश से आई थीं.’

राष्ट्रीय मीडिया ने क्या लिखा?

राष्ट्रीय मीडिया में यह कहानी अगले दिन यानी दो अप्रैल को सुर्खी बनी. द इंडियन एक्सप्रेस का भिंड में कोई रिपोर्टर नहीं है. इसलिए उसने स्थानीय अखबारों में छपी खबरों पर ही भरोसा किया. उसकी खबर का शीर्षक था, ‘मध्य प्रदेश में ईवीएम के परीक्षण ने मशीनों से छेड़खानी से जुड़े विवाद को हवा दी, चुनाव आयोग ने रिपोर्ट मंगवाई.’ इस खबर में यही लिखा गया कि ईवीएम से सिर्फ भाजपा के चुनाव चिन्ह वाली पर्चियां ही निकलीं. हालांकि इसमें यह भी बताया गया कि खबरों में भ्रम की स्थिति है. कुछ खबरों में कहा जा रहा है कि सिर्फ भाजपा के चुनाव चिन्ह की पर्चियां निकलीं. कुछ में बताया जा रहा है कि दो पर्चियां भाजपा की थीं. जबकि कुछ अन्य रिपोर्टों में बताया गया कि अलग-अलग बटन दबाने से अलग-अलग पर्चियां निकलीं.

द टाइम्स ऑफ इंडिया ने हालांकि थोड़ी सावधानी बरतते हुए खबर छापी. इसमें ईवीएम को ‘गफलतभरा’ बताया गया. इसमें तीन अप्रैल को खबर प्रकाशित हुई. इसमें लिखा गया, ‘देशव्यापी विवाद खड़ा करने वाली मशीन उत्तर प्रदेश के कानपुर से भिंड लाई गई थी. चुनाव आयोग ने रविवार को इसकी जांच के बाद यह जानकारी दी है.’

एनडीटीवी ने दिखाया कि ईवीएम से सिर्फ भाजपा की ही पर्चियां निकली हैं, लेकिन उसने हवाला स्थानीय खबरों का दिया.

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ऐसी ही रिपोर्ट आज तक ने भी दिखाई. इसमें कहा गया, ‘मध्य प्रदेश के भिंड में ईवीएम परीक्षण में असफल रहीं. जैसे ही इसका एक बटन दबाया गया तो भाजपा के चुनाव चिन्ह वाली पर्ची निकली. चुनाव आयोग ने रिपोर्ट तलब की.’ आज तक के भिंड संवाददाता ने स्क्रोल से बातचीत में माना कि दो बार भाजपा की पर्चियां नहीं निकलीं. लेकिन यह बताने से मना कर दिया कि उन्होंने वास्तव में अपने दफ्तर को क्या जानकारी दी थी.

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एबीपी न्यूज ने भी अपनी खबर में दावा किया कि दो बार ईवीएम से भाजपा की पर्चियां निकलीं. चैनल के भोपाल में मौजूद संवाददाता बृजेश राजपूत ने यह खबर खुद कैमरे पर दी थी. हालांकि चैनल के स्थानीय संवाददाता के मुताबिक, 31 मार्च को वे मौके पर भिंड में थे ही नहीं. जब उनसे संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया, ‘ईवीएम का चौथे नंबर का बटन दो बार दबाया गया. इससे भाजपा की पर्ची दो बार निकली. लेकिन असल विवाद तो इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि सलीना सिंह ने मीडिया के लोगों को चेतावनी दी थी.’ उन्होंने माना कि वे मौके पर नहीं थे लेकिन यह भी जोड़ा कि उनके पास जो खबर थी वह विश्वसनीय सूत्रों से मिली थी.

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हालांकि बृजेश के बयान और खबर में भी गफलत साफ झलकती है क्योंकि न्यूज बुलेटिन के दौरान फोन पर हुई बातचीत में वे साफ कह रहे हैं कि दो अलग-अलग बटन दबाने से भाजपा की पर्चियां निकलीं. जबकि बयान में वे एक ही बटन को दो बार दबाने पर ये पर्चियां निकलने की बात कह रहे हैं.

यानी पर्चियों से ज्यादा बड़ा मसला सलीना सिंह की चेतावनी थी

मतलब साफ है कि ईवीएम से पर्चियां तो सही क्रम में निकलीं लेकिन, विवाद की असल जड़ सलीना सिंह की चेतावनी थी. अगर वे मीडिया वालों को थाने में बिठाने की बात न कहती (भले मजाक में कही गई हो) तो शायद बात इतनी न बढ़ती. इस बारे में जब सलीना सिंह ने संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई. उनकी जगह उनके दफ्तर में राज्य स्तरीय नोडल अधिकारी संजय सिंह बघेल से बात हुई. उनका कहना था ‘मीडिया में जिस बयान (सलीना सिंह के) को बार-बार हवा दी जा रही है वह अनौपचारिक था. हालांकि तकनीकी रूप से सही भी था. पहली बात तो ये कि ईवीएम से गलत पर्चियां निकली ही नहीं. दूसरी बात- इन पर्चियों के बारे में गलत खबर देना चुनाव आचार अधिनियम-1961 के नियम-49एमए के तहत दंडनीय अपराध है. इसके तहत दोषी को सजा या जुर्माना या दोनों सजा एक साथ दी जा सकती है. इसीलिए उन्होंने मीडिया के लोगों को चेताया था.’

बघेल आगे कहते हैं, ‘विवाद तब ज्यादा बढ़ा जब कुछ राजनीतिक दलों ने इसे सोशल मीडिया के जरिए बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश की. हालांकि कुछ अखबारों ने पहले ही दिन से सही रिपोर्ट भी दिखाई. इस बात को भी मानना होगा.’

तो असल में दिक्कत कहां हुई थी?

अधिकारी बताते हैं कि 31 मार्च को ईवीएम के प्रदर्शन का कार्यक्रम बहुत आनन-फानन में बना था. उसकी पहले से कोई तैयारी नहीं की गई थी. मशीनों के प्रदर्शन की निर्धारित प्रक्रिया यह है कि उनमें कोई अन्य चुनाव चिन्ह फीड किए जाते हैं, न भाजपा, कांग्रेस या चुनाव लड़ रही अन्य किसी पार्टी के. इस बारे में द हिंदू की रिपोर्ट बताती है, ‘जो मशीन प्रदर्शन के लिए भिंड लाई गई थी, वह उत्तर प्रदेश में चुनाव के दौरान आरक्षित रखी हुई थी. उसमें वहां प्रदर्शन और चुनाव के हिसाब से चुनाव चिन्ह फीड किए गए थे. लेकिन उसे मध्य प्रदेश लाने से पहले उन चुनाव चिन्हों को हटाया जाना चाहिए था जो कि नहीं किया गया.’

यानी इस तरह कुछ चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों की लापरवाही तथा कुछ मीडिया रिपोर्टों की कारस्तानी से इस मसले ने एक विवाद की शक्ल ले ली.