धार्मिक आधार पर 1947 में बंगाल का विभाजन हुआ था. तब हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल भारतीय गणराज्य का हिस्सा बन गया और मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का. हालांकि बंगाल इस घटना के दशकों पहले से उस परंपरा का साक्षी रहा है जिसमें हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते आए हैं. विभाजन के बाद भी दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले इस इलाके में यह मिलीजुली संस्कृति खत्म नहीं हुई. और अगर हम आज इस संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक खोजें तो वह देवी बनबीबी के रूप में मिलता है. एक समय सुंदरबन के जंगलों में देवी बनबीबी को दोनों समुदायों के लोग बराबरी से पूजते थे.

बनबीबी का शाब्दिक अर्थ है ‘जंगल की महिला’. देवी के इस नाम में ‘बीबी’ शब्द जुड़ा हुआ है जो मूल रूप से मुस्लिम महिलाओं के नामों में साथ इस्तेमाल किया जाता है. और इस तरह यह किसी भी बंगाली देवी-देवता में सबसे अलग नाम है. जैसी हर देवी-देवता की होती है, बनबीबी की भी एक कहानी है. इसके मुताबिक वे एक फकीर की बेटी थीं और सुंदरबन में उनका सबसे बड़ा दुश्मन था दक्खिन राय (दक्षिण का राजा). राय एक जमींदार था जो शेर का रूप धारण करके सुंदरबन के निवासियों का शिकार किया करता था. दक्खिन राय के आतंक को खत्म करने के लिए अल्लाह ने बनबीबी को चुना. फिर बनबीबी मक्का-मदीना की यात्रा पर जाती हैं. हालांकि यहां से लौटने पर वे राय को मारती नहीं. वे इस शर्त पर उसकी जान बख्शती हैं कि जो कोई उनकी पूजा करेगा वह उनको कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा.

सुंदरबन के घने जंगलों में जहां कोई भरोसा नहीं होता कि मौत किस रूप में आ जाए, वहां इन खतरों से सुरक्षा के लिए बनबीबी सदियों से पूजी जाती रही हैं.

आधुनिकता बनाम समन्वय की संस्कृति

आमतौर पर ऐसा देखा गया है कि आधुनिकता का प्रभाव बढ़ने से स्थानीय देवी-देवता की पूछ-परख कम होने लगती है. सुंदरबन के इन जंगलों से भी बाहरी समाजों या दुनिया का जितना संपर्क बढ़ा है, उस हिसाब से बनबीबी की मान्यता में कमी आती गई है. सुंदरबन के जंगलों में बोक्खाली नाम की जगह है. यहीं समंदर के किनारे बनबीबी मंदिर है. यहां अब बहुत कम लोग आते हैं, बंगाल की प्रसिद्ध दुर्गापूजा के समय भी यहां भीड़-भाड़ नहीं होती.

मन्नत पूरी होने पर बनबीबी के भक्त मंदिर परिसर में लगे बरगद के इस पेड़ में कपड़ा बांधते हैं. यह सूफी दरगाहों से मिलती-जुलती परंपरा है
मन्नत पूरी होने पर बनबीबी के भक्त मंदिर परिसर में लगे बरगद के इस पेड़ में कपड़ा बांधते हैं. यह सूफी दरगाहों से मिलती-जुलती परंपरा है

जैसे-जैसे बनबीबी की मान्यता कम हो रही है, यहां उनके नाम पर जो समन्वय की संस्कृति पनपी थी, उसको भी कमजोर करने की कोशिश हो रही है. स्थानीय बैंक में क्लर्क जादव प्रामाणिक बोक्खाली बनबीबी मंदिर के पुजारी हैं. यह भी एक दिलचस्प बात है कि चूंकि ये देवी परंपरागत देवी नहीं हैं सो इस मंदिर में शायद ही कभी कोई ब्राह्मण पुजारी रहा हो. हालांकि गैर-ब्राह्मण जादव देवी के स्वरूप के मामले में परंपरा पसंद करते हैं और बनबीबी को दो समुदायों का साझा प्रतीक बताए जाने पर उन्हें आपत्ति है. वे चाहते हैं कि बनबीबी का नाम बदलकर बनदेवी किया जाए.

बनबीबी मंदिर के पुजारी जादव प्रामाणिक
बनबीबी मंदिर के पुजारी जादव प्रामाणिक

यह बदलाव मंदिर में भी दिखता है. यहां अब बनबीबी की मूर्ति के साथ परंपरागत देवियों की मूर्ति भी स्थापित हो चुकी हैं (सबसे मुख्य तस्वीर बाएं से दूसरी देवी बनबीबी हैं. बीच में देवी दुर्गा की मूर्ति है). और इसका मतलब है कि अब यहां कोई मुस्लिम अपनी आस्था जताने नहीं आ सकता. यहां तक कि अब मंदिर की मुख्यदेवी दुर्गा हैं और बनबीबी की मूर्ति उनके बाजू में है.

प्रामाणिक की सोच की गूंज इस इलाके के मुस्लिमों में भी सुनाई देती है. यहां एक बड़ा तबका मानने लगा है कि बनबीबी की पूजा करना इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ है. हालांकि साझा संस्कृति के इन विरोधी स्वरों के बीच प्रामाणिक की बात को बोक्खाली कस्बा बिना किसी शोरगुल के खारिज कर देता है. यहां किसी भी व्यक्ति से बात की जाए तो उसके लिए बनदेवी बिलकुल अनजाना नाम है. यहां की प्रमुख मिठाई की दुकान (नीचे) का नाम भी देवी के असली नाम- बनबीबी पर ही है.