चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा में हैं. बीती 10 अप्रैल को पटना में 50 से अधिक जाने-माने गांधीवादी विचारकों की मौजूदगी में एक साल तक चलने वाले इस आयोजन की भव्य शुरुआत की गई. 10 अप्रैल, 1917 को महात्मा गांधी ने चंपारण में नील की खेती करने वाले तंगहाल किसानों के लिए बिहार की जमीन पर पहली बार अपने कदम रखे थे. साल भर चलने वाले इस आयोजन के जरिये राष्ट्रपिता के संदेश को राज्य के लोगों तक पहुंचाने की बात कही गई है. चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह की शुरुआत करते हुए नीतीश कुमार का कहना था, ‘हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत गांधी जी का विचार है.’

महात्मा गांधी ने सौ साल पहले मोतिहारी (पूर्वी चंपारण) से भारत में अपने सत्याग्रह की नींव रखकर किसानों को अंग्रेजों के दमन से मुक्ति दिलाई थी. लेकिन यह भी एक विरोधाभास ही है कि एक ओर राज्य सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर इस सत्याग्रह की याद में भव्य आयोजन कर रही है तो दूसरी तरफ उसी मोतिहारी में दो मजदूर नेताओं को अपनी मांगों को लेकर आत्मदाह करने पर मजबूर होना पड़ा है.

वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने इस मामले को लेकर नीतीश सरकार को निशाने पर लिया है. उन्होंने कहा कि मजदूरों ने सरकार की दमनकारी नीतियों की वजह से आत्मदाह किया है.   

यह घटना मोतिहारी की एक चीनी मिल से जुड़ी है. यहां का मजदूर संघ कई साल से बंद पड़ी चीनी मिल को खुलवाने और कई वर्षों से बकाया रकम के भुगतान सहित कई मांगों को लेकर सात अप्रैल से धरने पर बैठा था. स्थानीय मीडिया के मुताबिक मजदूरों ने प्रशासन को चेतावनी दी थी कि यदि नौ अप्रैल तक उनकी मांगें नहीं सुनी गईं तो वे आत्मदाह कर लेंगे. नौ अप्रैल को यूनियन की स्थानीय प्रशासन के साथ बातचीत हुई लेकिन, यह किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई. इसके बाद 10 अप्रैल को खबर आई कि यूनियन के महामंत्री नरेश श्रीवास्तव और उपसचिव सूरज बैठा ने आत्मदाह कर लिया. नरेश की बाद में मौत हो गई जबकि सूरज की स्थिति गंभीर बताई गई है.

मृतक के परिवार वाले इसे साजिश के तहत हत्या का मामला बता रहे हैं. उन्होंने इसकी सीबीआई जांच कराने की मांग की है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं. उधर, विपक्षी भाजपा ने नीतीश सरकार पर इस मामले को लेकर हमला तेज कर दिया है. वरिष्ठ भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने इस मामले को लेकर नीतीश सरकार को निशाने पर लिया है. उन्होंने कहा कि मजदूरों ने सरकार की दमनकारी नीतियों की वजह से आत्मदाह किया है. उनका यह भी कहना था कि मजदूरों को बकाया रकम समय पर मिल जाती तो यह घटना नहीं होती.

साल 2015 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार के कार्यकाल पर नजर डालें तो उन्होंने पहले भी कई बड़े अभियान चलाए हैं. इनके लिए एक तरफ उनकी तारीफें हुई हैं तो दूसरी ओर कइयों ने उन पर जनता की गाढ़ी कमाई को फिजूलखर्जी में उड़ाने के आरोप भी लगाए हैं. इस बार भी स्थिति कुछ अलग नहीं है.

राजधानी पटना में कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में देश में बढ़ रही असहिष्णुता का जिक्र करते हुए कहा, ‘आज देश और पूरी दुनिया में एक विचित्र माहौल है. असहिष्णुता का माहौल है. टकराव का माहौल है. ऐसी स्थिति में गांधीजी के विचारों पर लोग एकत्रित होकर सार्थक बहस करें तो इसका जो नतीजा निकलेगा वह देश के लिए महत्वपूर्ण होगा.’ नीतीश कुमार के अलावा अधिकांश गांधीवादी विचारकों ने भी अपना पूरा ध्यान देश में राजनीतिक परिस्थितियों और असहिष्णुता पर ही केंद्रित रखा.

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में राजकुमार शुक्ल के परिवार को इस आयोजन में आमंत्रित नहीं किया जाना भी विवाद का एक और कारण बन गया है  

राजनीतिक मामलों के जानकारों के मुताबिक असहिष्णुता पर नीतीश कुमार का ज्यादा जोर इसलिए है कि यह मुद्दा उनके राजनीतिक एजेंडे में फिट बैठता है और नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में उन्हें आगे करता है. पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल स्टडीज के पूर्व निदेशक और गांधीवादी डॉ डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘नेताओं की कोशिश इन आयोजनों के जरिये जनता में अपनी भ्रम वाली छवि पैदा करना है. इसके जरिये वे सत्ता हासिल करते हैं और फिर इसे बनाए रखने की कोशिश करते हैं.’ हालांकि, इसके साथ वे इस तरह के आयोजनों को इस मायने में महत्वपूर्ण बताते हैं कि इनके जरिये गांधीवादी विचारधारा की मूल बातों को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है.

सवाल इस ताम-झाम पर होने वाले खर्च को लेकर भी हैं. बहुत से जानकार इस तरह के आयोजनों गांधीजी के विचारों के उलट मानते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘चंपारण सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने के मौके पर किसानों और मजदूरों से जुड़े मुद्दों पर बात होनी चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. यह एक खास तरह के लोगों का खाओ-पीओ टाइप आयोजन है.’

हालांकि पटना स्थित गांधी संग्रहालय के सचिव और गांधीवादी डॉ रजी अहमद महेंद्र सुमन की बातों से सहमत नहीं दिखते. वे कहते हैं, ‘इस आयोजन के बहाने गांधीवादी विचारधारा के लोग एक बार फिर गांधीजी के सिद्धांतों पर चर्चा कर रहे हैं और लोगों के बीच इसे लेकर जागरुकता फैलाने की बात की जा रही है.’ आयोजन में गांधीवादी विचारकों के सरकारी पैसे से महंगे होटल में रहने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘यह किसी की व्यक्तिगत जीवनशैली की बात है और इस पर सवाल उठाना सही नहीं है.’

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में राजकुमार शुक्ल के परिवार को इस आयोजन में आमंत्रित नहीं किया जाना भी विवाद का एक और कारण बन गया है. चंपारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने ही अपनी लगातार कोशिशों के बल पर महात्मा गांधी को चंपारण आने पर विवश कर दिया था. उनके परिवार ने सरकार पर उनकी विरासत की अनदेखी किए जाने का आरोप भी लगाया है. राजकुमार शुक्ल के साथ नीतीश सरकार ने भाजपा को भी समारोह के लिए आमंत्रित नहीं किया गया. इसके बाद भाजपा ने अलग से अपना कार्यक्रम करने की बात कही है.

तामझाम से भरे चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह आयोजन के बीच मोतिहारी के मजदूरों की व्यथा देखते हुए एक सहज सवाल उठता है कि इस वक्त गांधीजी होते तो कहां होते? इस सवाल के जवाब का अंदाजा उनके आखिरी दिनों से मिल सकता है जब आजादी का जश्न बनाने के बजाय वे अपनी जान जोखिम में डालकर हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच सद्भाव पैदा करने की कोशिशों में लगे थे. इसीलिए कई मानते हैं कि आज के कथित गांधीवादियों के उलट वे इस खर्चीले आयोजन की आलोचना करते हुए मोतिहारी के मजदूरों के साथ खड़े होते.