हिंदुस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश यानी लगभग पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में पोर्न फिल्मों के लिए ‘ब्लू फिल्म’ टर्म ही इस्तेमाल की जाती है. लेकिन यह शब्दावली इन फिल्मों को न परिभाषित करती है और न इनसे संबंधित दिखती है. ऐसे में सवाल उठता है कि पोर्न फिल्मों को ब्लू फिल्म क्यों कहा जाता है? जैसा अक्सर इस तरह के सवालों के जवाब दिए जाते हैं, इस सवाल के जवाब में भी कह दिया जाता है कि सबसे पहले जो पोर्न फिल्म बनाई गई उसका टाइटल ‘ब्लू’ था, जिसके बाद इन्हें ब्लू फिल्में कहा जाने लगा. हालांकि फिल्मों के या कहें पोर्न फिल्मों के देसी-विदेशी इतिहास में इस तरह के टाइटल का कोई जिक्र नहीं मिलता.

‘ब्लू फिल्म’ नामकरण के पीछे पहली वजह यह बताई जाती है कि इन फिल्मों के पोस्टर ब्लू यानी आसमानी-नीले बैकग्राउंड के साथ बनाए जाते हैं. सच में ऐसा है तो फिर एक और सवाल कि यही रंग क्यों चुना जाता है? इसका जवाब कुछ यूं मिलता है कि फिल्मी पोस्टरों की भीड़ में ब्लू रंग के पोस्टर आसानी से ध्यान खींच लेते हैं. हालांकि यह तर्क सही नहीं है क्योंकि विज्ञान के अनुसार सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाला रंग लाल है. ऐसे में पोस्टर बनाते हुए नीला रंग सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया भी जाता है तो इसकी वजह यह जरूर हो सकती है कि इस रंग के साथ बाकी रंगों के इस्तेमाल करने की गुंजाइश सबसे ज्यादा होती है.

अब एक दूसरे कारण पर आते हैं. फिल्मों का वर्गीकरण भी पोर्न फिल्मों को ब्लू फिल्म कहे जाने की वजह हो सकता है. बताया जाता है कि एक समय सभी बी ग्रेड फिल्मों की पैकिंग नीले रंग के कवर में होती थी. पोर्न फिल्में भी इसी श्रेणी में शामिल होती थीं, इसलिए उनके पैकेट भी नीले रंग के हुआ करते थे. हालांकि इस कारण में भी कोई तुक नजर नहीं आता क्योंकि बी ग्रेड में आमतौर पर कम बजट की फिल्में आती हैं. इनमें अभिनय और फिल्मांकन की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती. फिल्मों के इतिहास और चलन पर ध्यान दें तो बी के साथ ही सी, डी और ई ग्रेड की फिल्में भी बनती हैं लेकिन इन फिल्मों में पोर्नोग्रॉफी शामिल नहीं है. हालांकि यह संभव है कि बी ग्रेड फिल्मों की पैकिंग नीले रंग के पैकेट में की जाती रही हो. और हो सकता है कि इन्हीं फिल्मों की आड़ में वीडियो कैसेट्स या सीडी की दुकानों पर पोर्न फिल्मों को रखने के लिए नीले रंग का पैकेट इस्तेमाल किया जाने लगा हो और इस तरह इन्हें ब्लू फिल्म नाम मिल गया हो.

शुरुआत में ऐसी फिल्में बहुत ही सीमित बजट के साथ दबे-छिपे ढंग से बनाई जाती थीं. इनको ब्लू फिल्म कहे जाने की तीसरी वजह इन परिस्थितियों की उपज भी हो सकती है. तब इन फिल्मों में पिक्चराइजेशन की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती थी. रंगीन फिल्मों का दौर आने के बाद भी ये फिल्में काली-सफेद ही दिखाई देती रहीं क्योंकि ब्लैक एंड वाइट रील सस्ती होती थी. ऐसा माना जाता है कि बाद में पोर्न फिल्म निर्माताओं के ऊपर भी इन्हें रंगीन करने का दबाव आया होगा. अब चूंकि उनके पास पर्याप्त बजट होता नहीं था तो इसलिए कुछ फिल्मकारों ने ब्लैक एंड वाइट रील के साथ ही कुछ प्रयोग कर उसे रंगीन बनाने की कोशिश की. और इस कोशिश में वे दर्शकों को काले और सफेद के साथ नीला रंग दिखाने में सफल हुए. यह एक सस्ता और कामचलाऊ उपाय था. बहुत हद तक यह कारण फिल्मों के इस नाम की एक तार्किक वजह लगता है. इसी क्रम में इससे मिलता-जुलता एक और अंदाजा यह भी लगाया जाता है कि इन फिल्मों में नीले रंग की स्पॉटलाइट का इस्तेमाल होता था इसलिए ये फिल्में ब्लू फिल्में कही जाने लगीं.

ब्लू फिल्मों के इस नाम का सबसे सटीक कारण ब्लू लॉ में मिलता है. करीब एक सदी पहले पश्चिमी देशों में ब्लू लॉ एक धार्मिक कानून था. चर्च के आदेश से इतवार के दिन कुछ विशेष गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी गई थी. इसमें कुछ चीजों के व्यापार, नाच-गाने या वे काम जो सीधी तरह से ईश्वर या चर्च से जुड़े नहीं होते थे, उन पर पाबंदी थी. उदाहरण के लिए इतवार को शराब और नशे से जुड़े व्यापार बंद रहते थे. यह वह दौर था जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, इसलिए हमारे देश का प्रबुद्ध और शहरी तबका ब्लू लॉ और इसके प्रतिबंधों से परिचित थे. इस नियम के प्रभाव के चलते कोई भी काम जो प्रतिबंधित या वर्जित समझा जाता था उसे ब्लू एक्टिविटी कह दिया जाता था. पोर्नोग्राफी भी समाज में वर्जित समझी जाती थी (हालांकि अब भी इस राय में बहुत बदलाव नहीं आया है). संभव है ब्लू लॉ के विरुद्ध होने के चलते ही इन्हें ब्लू फिल्म कहा जाने लगा होगा. समय के साथ ब्लू लॉ का अस्तित्व तो खत्म हो गया लेकिन पोर्न फिल्मों को मिला यह नाम अब भी चलन में है.