किसी एक विधानसभा क्षेत्र के चुनाव परिणाम से बड़े निष्कर्ष निकालना और उन्हें संबंधित राज्य के लिए लागू करना बड़ा ही जोखिमभरा काम है. लेकिन जब कोई परिणाम चौंकाता है तो वह कुछ बड़े संकेत तो दे ही देता है. मसलन पिछले शुक्रवार को बंगाल की कांति दक्षिण विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव का नतीजा. यहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की उम्मीदवार को जीत मिली है लेकिन इसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं है. दरअसल यहां के राजनीतिक हल्कों के लिए सबसे हैरानी की बात रही, भाजपा का आसानी से दूसरे स्थान पर आ जाना.

पिछले चुनाव में भाजपा को यहां महज नौ फीसदी वोट मिले थे और इस बार उसका वोट प्रतिशत तकरीबन चार गुना – 31 फीसदी पर पहुंच गया है. वहीं दूसरी तरफ वाम मोर्चा 34 फीसदी से 10 फीसदी पर आ गया है. यह हैरानी इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि यहां बीते मई में ही चुनाव हुए थे.

पिछले कुछ समय से वामपंथी पार्टियां पश्चिम बंगाल में लगातार कमजोर हुई हैं. लेकिन कांति दक्षिण का नतीजा उनके लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है क्योंकि यह बताता है कि वामपंथियों की हालत राज्य में कितनी खराब हो चुकी है. इस नतीजे के बाद इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा अब राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी की तरह खुद को पेश करेगी. यह अलग बात है कि विधानसभा में उसके कुल तीन ही विधायक (कुल 294 में से) हैं.

ममता बनर्जी के सामने वामपंथियों का किला यहीं से दरकना शुरू हुआ था

कांति दक्षिण पूर्वी मिदनापुर जिले के अंतर्गत आता है. दशकों तक बंगाल की सत्ता में रही सीपीएम को पहली बार अपनी कमजोरी के संकेत यहीं से दिखने शुरू हुए थे. नंदीग्राम में भूमि आंदोलन को समर्थन देने वाली तृणमूल कांग्रेस ने यहां 2008 के दौरान हुए पंचायत चुनाव में वामपंथी पार्टियों को हराया था. नंदीग्राम भी इसी जिले में स्थित है. हालांकि 2011 में जब सत्ता परिवर्तन हुए तब तक मिदनापुर के एक बड़े क्षेत्र में वामपंथी पार्टियों का अच्छा-खासा असर था. 2016 के विधानसभा चुनाव में उसे यहां 34 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन पांच महीनों बाद ही इस क्षेत्र में सीपीएम के चेहरा रहे लक्ष्मण सेठ ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए.

मिदनापुर क्षेत्र में जो हुआ और हो रहा है वह पूरे पश्चिम बंगाल के लिए भी काफी हद तक लागू होता है. बीते एक साल के दौरान भाजपा ने हिंदुत्व को मुद्दा बनाकर ममता बनर्जी सरकार पर लगातार हमले किए हैं और इस तरह उसने विपक्ष की भूमिका में अपने को खड़ा कर लिया है. जबकि राज्य में पार्टी का संगठन कहनेभर को ही है. दरअसल इस दौरान भाजपा ने राष्ट्रीय मीडिया का इस्तेमाल कर हिंदुत्व के मुद्दे पर ममता बनर्जी को जमकर घेरा है. और इसके असर से बंगाल भी अछूता नहीं रहा. टीवी के साथ-साथ सोशल मीडिया ने भी बंगाली समुदाय के भीतर अपनी पहुंच बनाने में भाजपा की अच्छी-खासी मदद की है.

वामपंथी विकल्पहीन दिख रहे हैं

जहां तक मीडिया के जरिए लड़ने की बात है तो भाजपा के मुकाबले वामपंथी पार्टियां कहीं नहीं टिकतीं. दूसरी तरफ जमीन पर सीपीएम का संगठन भी ढहने की कगार पर है. सीपीएम का स्थानीय तंत्र या तो तृणमूल कांग्रेस के दबाव का सामना कर रहा है या फिर इससे बचने के लिए खुद ही सत्ताधारी दल में शामिल हो चुका है. इसके अलावा सिंगूर और नंदीग्राम के भू-अधिगृहण के खिलाफ चला आंदोलन भले ही खत्म हो चुका हो लेकिन वामपंथी पार्टियों के खिलाफ लोगों का आक्रोश अभी-भी कम नहीं हुआ है.

इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी पार्टियों की कमजोरी ने यहां सीपीएम को और कमजोर बनाया है. राष्ट्रीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी वामपंथी विचारधारा फीकी पड़ रही है. अब युवा इन पार्टियों से दूरी बना रहे हैं और इसका सबसे बड़ा सबूत ये है कि 2012 में जब पार्टी की 20वीं कांग्रेस आयोजित हुई थी तब उसमें सिर्फ चार फीसदी प्रतिभागी 40 साल से कम उम्र के थे.

ऐसा नहीं है कि भाजपा के लिए अब रास्ता पूरी तरह साफ हो चुका है

वामपंथी पार्टियों के कमजोर होने का सीधा फायदा भाजपा को मिल रहा है. भाजपा के पास कांति दक्षिण में कोई संगठन नहीं है और न ही उसके पास राज्य स्तर पर कोई ऐसा नेता है जिससे जनता जुड़ाव महसूस कर सके, फिर भी उसे यहां 31 फीसदी वोट मिले हैं. पार्टी यहां मूल रूप से लक्ष्मण सेठ के दबदबे पर निर्भर कर रही थी और माना जा सकता है इसका उसे फायदा मिला. सीपीएम के पूर्व सदस्य सेठ के बारे में कहा जाता है कि कथिततौर पर उन्हीं ने 2007 के दौरान नंदीग्राम में हिंसा भड़काई थी.

इस उपचुनाव के नतीजे से ऐसा लग तो रहा है कि भाजपा मुख्य विपक्ष की भूमिका में उभर रही है. लेकिन इसके साथ ही राज्य में उसकी सीमाएं भी उजागर हो रही हैं. इस समय उसे वामपंथी पार्टियों के कमजोर होने का पूरा फायदा मिल रहा है. जैसा कांति दक्षिण में हुआ, वामपंथी पार्टी के नेता उससे जुड़ रहे हैं. लेकिन राज्य में सत्ता हासिल करने या मजबूत विपक्ष बनने के लिए उसे खुद का अपना कैडर तैयार करना पड़ेगा. भाजपा को इस बात का अंदाजा होगा इसलिए पश्चिम बंगाल की राजनीति में अब उसका उभार एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच चुका है.