मौसम विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन के मसले पर बीते तीन दशकों से चिंता जताते आ रहे हैं. हालिया सालों में उन्होंने यह कहना भी शुरू कर दिया है कि ग्लोबल वॉर्मिंग इस समय दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती है. यह संकट इतना बड़ा हो चुका है कि इससे निपटने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो मानवजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. इसमें कोई दोराय नहीं कि ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते पूरी दुनिया के मौसम में बदलाव आ रहा है. इन दिनों भारतीय मॉनसून की अनियमितता के लिए भी इसे जिम्मेदार ठहराया जा रहा है लेकिन इसके बावजूद दुनिया की बड़ी आबादी इस मसले पर गंभीर नहीं दिखती. शायद इसलिए कि वह ग्लोबल वॉर्मिंग का तात्कालिक असर महसूस नहीं कर पा रही है.

ऐसे लोगों के लिए कनाडा की यह घटना आंखें खोलने वाली साबित हो सकती है. शोधकर्ताओं की एक टीम के मुताबिक पिछले साल कनाडा की एक नदी सिर्फ चार दिनों के भीतर पूरी तरह सूख गई थी. और ऐसा इसलिए हुआ था कि यह नदी जिस ग्लेशियर से निकलती है वह इन दिनों में तेजी से पिघला और इसका पानी दूसरी तरफ बह गया था. द गार्डियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना पिछले साल 26 से 29 मई के बीच की है.

कनाडा के युकॉन क्षेत्र में बहने वाली नदी स्लिम्स, कास्कावुल्श ग्लेशियर से निकलती है. यह ग्लेशियर तब तेजी से पिघलने लगा था और इससे निकले पानी की दिशा भी बदल गई थी. अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन टकोमा ने इस घटना का अध्ययन किया है, जो वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में सोमवार को प्रकाशित हुआ है. इसके मुताबिक कास्कावुल्श का पानी स्लिम्स के बजाय एक दूसरी नदी में बह गया था.

वैज्ञानिक इस घटना को अपनी तरह का पहला ‘नदी की चोरी’ का मामला बता रहे हैं. साथ ही इनके मुताबिक यह घटना बताती है कि वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी किस तरह अचानक बड़े बदलाव की वजह बन सकती है. इस अध्ययन को दर्ज करने वाली टीम के प्रमुख डैन शूगर का कहना है, ‘भू-वैज्ञानिकों ने एक नदी की चोरी देखी है, और हमारी जानकारी में ऐसा कोई इंसान नहीं है जो अपने जीवन में कभी ऐसी किसी घटना का साक्षी रहा हो. भूविज्ञान से जुड़े अध्ययन बताते हैं कि हजारों साल के दौरान कभी ऐसा नहीं हुआ.’

स्लिम्स नदी ग्लेशियर का पानी लेकर उत्तर की तरफ क्लूएन नदी में मिलती है और फिर आगे ये सारा पानी यूकॉन नदी में मिलकर बेरिंग समुद्र में मिल जाता है. लेकिन पिछले साल ग्लेशियर इस तेजी से पिघला कि सारा का सारा पानी दक्षिण की तरफ बहते हुए अलास्का की खाड़ी में मिल गया.

भूवैज्ञानिकों की टीम सालों से इस ग्लेशियर का अध्ययन कर रही है. यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनॉयस के भूवैज्ञानिक जेम्स बेस्ट पिछले साल की घटना के बारे में बताते हैं, ‘उन दिनों हम स्लिम्स नदी की लंबाई-चौड़ाई दर्ज करने पहुंचे थे. लेकिन जब वहां पहुंचे तो नदी का प्रवाह क्षेत्र तकरीबन सूखा पड़ा था.’ ग्लेशियर से निकला हुआ पानी जहां एक जगह इकट्ठा होता है वहां तो धूल भरी हवाओं के सिवाय कुछ नहीं था. जेम्स अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ‘यह बदलाव बिलकुल नाटकीय था.’

जहां स्लिम नदी सूख चुकी थी वहीं ग्लेशियर के दक्षिण में पहने वाली एल्सेक नदी में पानी की मात्रा अचानक बढ़ गई थी. 2015 तक ये दोनों नदियां तकरीबन एक बराबर ही लंबी और बड़ी थीं. लेकिन अब एल्सेक में स्लिम्स की तुलना में 60 से 70 गुना तक ज्यादा पानी आ गया है. फिलहाल स्लिम्स में पानी तो आ गया है लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते यह भविष्य में लंबे अरसे या हमेशा के लिए ही गायब हो जाए तो किसी को हैरानी नहीं होगी.

यह घटना भारत के लिए भी चिंता का सबब है. हमारे यहां हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों से कई नदियां, उनमें भी सबसे महत्वपूर्ण गंगा निकलती है. यह घटना बताती है कि ये नदियां भी भविष्य में ऐसे संकट से दो-चार हो सकती हैं. अमेरिका की ओहियो यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लोनी थॉम्प्सन भी यह आशंका जताते हैं. द गार्जियन की एक रिपोर्ट में वे कहते हैं, ‘मेरे ख्याल से पूरे हिमालय क्षेत्र में ऐसी घटनाएं हो सकती हैं... अक्सर ये घटनाएं दूर-दराज के इलाकों में होती हैं इसलिए इनपर किसी का ध्यान नहीं जाता लेकिन तराई के इलाकों में जहां कई लोगों की जिंदगियां इन नदियों पर निर्भर होती है, वे इससे अछूते नहीं रह सकते.’