सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद भले ही पश्चिम देशों के निशाने पर हों, लेकिन आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) के खिलाफ लड़ाई में उनकी सेना की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है. सैन्य मामलों का विश्लेषण करने वाले लंदन के एक समूह ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सीरियाई सेना के कमजोर पड़ने पर आईएस को वहां पैर पसारने का मौका मिल सकता है.

आईएचएस जेन नाम के इस समूह के टेरेरिज्म एंड इंसर्जेंसी सेंटर ने यह रिपोर्ट अमेरिका द्वारा सीरिया के एयरपोर्ट पर मिसाइलों से हमला किए जाने के बाद प्रकाशित की है. अमेरिका ने सीरियाई सरकार पर अपने नागरिकों के खिलाफ रासायनिक हथियारों को इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए यह हमला किया था. चार अप्रैल को इदलिब प्रांत में हुए इस हमले में 31 बच्चों सहित 87 लोगों की मौत हो गई थी. हालांकि, सीरिया ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था.

दरअसल, आईएस सीरिया में सीरियाई सेना और अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना से एक साथ लड़ रहा है. इसको लेकर आईएचएस में मध्य-पूर्व मामलों के वरिष्ठ विश्लेषक कोलंब स्ट्रैक का कहना है कि अगर सीरियाई सेना कमजोर पड़ी तो इससे आईएस आतंकियों को ज्यादा आबादी वाले शहरों और कस्बों में घुसने का मौका मिल जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि आईएस को सीरिया और इराक दोनों जगहों पर पीछे हटना पड़ रहा है और ऐसे में सीरियाई सेना के कमजोर पड़ने पर उसे और ज्यादा समय तक टिकने का मौका मिल जाएगा.

कोलंब स्ट्रैक ने यह भी आशंका जताई कि जब अमेरिकी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना और उसके समर्थन वाले लड़ाके आईएस की स्वघोषित राजधानी रक्का को घेरने में लगे हैं तो सीरियाई सेना के कमजोर पड़ने से आईएस पूर्वी सीरिया के सबसे बड़े शहर दीर-अल-जोर में पकड़ बना सकता है. उनका कहना था कि अगर ऐसा होता है तो यह मोसुल और रक्का में हारने के बाद आईएस के लिए जीवनरेखा की तरह काम करेगा.